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समीक्षा : खो गया गांव / पूनम गुप्ता

“खो गया गाँव”: पुस्तक समीक्षा

‘खो गया गाँव’ (कहानी संग्रह), डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा, माउण्ट बुक्स, दिल्ली, संस्करण-2011, पृष्ठ 112, मूल्य रू0 220/-

द्वारा - पूनम गुप्ता

बहुत दिनों बाद लघु कहानियों का एक अच्छा संग्रह पढ़ा। यह कहानी संग्रह एक महिला द्वारा, महिलाओं के लिए लिखा गया सार्थक व सराहनीय प्रयास है।

“झाड़ू” कहानी के माध्यम से लेखिका ने एकल परिवारों की मानसिकता को दर्शाया है। जब परिवार में रहने के लिये बाल-बच्चे व सदस्य ही नहीं हैं तो किसके लिये झाड़ू लगायी जाये। मालती का अकेलापन साफ़ दिखायी देता है। पैसा कमाने के लिये विदेश चले जाना, आजकल आम हो गया है संयुक्त परिवार से एकल परिवार में परिवर्तित हो कर अकले रहना त्रासदीदायक है।

“खाने पे नजर” कहानी ने मुझे महादेवी वर्माजी की “सती” कहानी के याद दिला दी । ट्रेनों मे भले बन कर लूटपाट करना पुराने जमाने से चला आ रहा है।

भगत जैसे लोग कम ही दिखायी देते हैं । अब आज के युग में ऐसे पात्र कल्पना में ही दिखायी देते हैं, वास्तविक जिन्दगी में कम ही दृष्टिगोचर होते हैं । फिर भी “भगत” कहानी से एक संदेश मिलता है -- कम में ही सुखी रहने का, जितना भगवान ने दिया है उसी में सुखी रहने का।

“आखिर कब तक” कहानी ने मुझे झिंझोड़ दिया, क्योकिं बिना बताये ही ताई सरिता की बातें समझ गयीं। यदि किसी लड़की के साथ ऐसा होता है तो लड़कियां घर आ कर ये बातें किसी को बताती नहीं हैं और रिश्ते-नातेदार शरीफ व इज्ज्तदार ही बने रहते हैं । लड़कियां इस कहानी से कुछ समझने की कोशिश करेंगी, जो बातें शायद उनकी माँ ना समझ सकी हों। अपर्णा जी की कोशिश सराहनीय है।

अभी कुछ समय पहले हम भी उस स्थान को देखने गये थे, जहाँ 22 वर्ष पूर्व हमने अपने गृहस्थी की शुरूआत की थी और मुझे भी वैसा ही अनुभव हुआ था जैसा कि लेखिका ने अपनी कहानी “खो गया गाँव” में वर्णित किया है। हम भी उजड़े हुए मकान, खण्डहरों व अपरिचित लोगों को देख कर स्वयं ही बहुत दुखी मन से लौटे थे। मधुर स्मृतियों का गाँव उजड़ गया था। फिर वहाँ जाने का साहस अब शेष नहीं रहा ।

अपनी कहानियों के माध्यम से, अपर्णाजी ने भौतिकता से दूर ग्रामीण अंचल व महिलाओं की साफ सुथरी छवि को दर्शाया है। उनके महिला पात्र संवेदनीय है, नाटकीय नहीं । उनके भाव स्पष्ट हैं । छोटे-छोटे वाक्यों ने उनकी पूरी कथा को अपने अन्दर समा लिया है। अपर्णा जी की ज्यादातर कहानियों का ताना-बाना महिलाओं को केन्द्र में रख कर बुना गया है। चाहे वह “समर्थ” की बड़ी बहन हो या “फिर चक्कर एडवांस” का। उनकी कहानियों में नारी पात्र बहू के रूप में अधिकता में दर्शाये गए हैं जो आजकल सिर्फ संयुक्त परिवारों में ही देखने को मिलता है। उनकी भाषा आम बोल चाल की सीधी स्पष्ट, छोटे-छोटे वाक्यों में गठित है।

(पूनम गुप्ता)

डायरेक्टर,

टॉपर्स चॉइस केमिस्ट्री कोचिंग इंस्टिट्यूट,

रुद्रपुर, जिला उधमसिंहनगर, उत्तराखंड ।

मो.

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