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लेखन में अपनाएँ मौलिकता और सच्चाई - डॉ. दीपक आचार्य

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बहुत कुछ छपता है जो उनका नहीं होता जिनके नाम से छपा है। लिखने वाले भी हैं और लिखवाने वाले भी बहुत हैं।  नगण्य होंगे जो भलमनसाहत में किसी के भी आग्रह को टाल नहीं पाते, किसी के लिए भी जो सामने वाले चाहते हैं, वैसा लिख डालते हैं।

अधिकांश लिखने-लिखवाने वाले हैं जिनमें दोनों पक्षों में चतुर भी हैं, शातिर भी और किसी न किसी मामले में स्वार्थ प्रभावित या मोहग्रस्त भी। लिखने और लिखवाने वालों की कहीं कोई कमी नहीं है।

इस संसार में हर इंसान किसी न किसी स्वार्थ, जायज -नाजायज रिश्तों और कामों के मोहपाश से इस कदर जकड़ा हुआ है कि इन्टरनेट का नेटवर्क भी इसके आगे बौना है।

लिखने और लिखवाने के मामले में कई सारे भ्रम, शंकाएं और संदिग्ध तर्क विचार समाहित हैं। कई लोग हैं जो लेखन में सिद्धहस्त होते हैं। वे अच्छे बाबू और मुंशी से लेकर स्थापित लेखक तक की सारी भूमिकाओं का निर्वाह कर लिया करते हैं।

कई लोगों के लिए उनका अपना लेखन किसी धारदार हथियार या कामदेव के पंचबाणों से कम नहीं होता। लच्छेदार और झूठी प्रशस्तियों भरा ऎसा लुभावना और मुग्धकारी लेखन कर डालते हैं कि सामने वाले अपने आपको खुदा मान लिया करते हैं।

स्वाभाविक रूप से इन ईश्वरों के लिए वही इंसान दुनिया में सबसे अधिक योग्यतम और पात्र होता है जो उनका महिमागान करता है, प्रशस्तिगान करता है चाहे वह कितना ही फीसदी झूठ ही क्यों न हो। आजकल झूठ के सहारे ही अवधिपार चवन्नियां चल रही हैं, सड़े हुए कुत्ते अपने आपको ऎरावत बताने लगे हैं और भौंदुओं की जमात खुद को दुनिया के महानतम बुद्धिजीवियों का प्रतीक मानने लगी है।

हम कितने ही नंगे, भूखे और प्यासे हों, झूठे-लफ्फाज और लंपट हों, शोषक और अमानवीय हों, पर हमें अच्छा यही लगता है कि हर कोई हमारे बारे में अच्छा ही अच्छा कहे और ऎसा लिखे कि लोग हमें ईश्वर की तरह पूजते रहें। हर कोई इसी भ्रम में जीता रहे कि हम महान हैं, औरों की अपेक्षा श्रेष्ठतम हैं व अपनी-अपनी गलियों के शेर होने से लेकर अपने क्षेत्र के लोकप्रिय महारथी के रूप में लोक स्वीकार्य हों।

इसके लिए सबसे सहज, सस्ता और सर्वसुलभ है अपने बारे में अच्छा ही अच्छा लिखवाते रहना। यह जमाना झूठ की बुनियाद पर प्रतिष्ठा के महल खड़े करने का है, लोगों को भ्रम में रखकर आगे बढ़ने का है और यही कारण है कि हममें से बहुत सारे लोग उन सभी लोगों के बारे में हमेशा भ्रम में जीते हैं जिन्हें हम अपने आदर्श या रोल मॉडल के रूप में स्वीकारते हैं। अंधे होकर उनका अनुकरण करते हैं।

हमारे लिए वह हर व्यक्ति महान और पूजनीय है जो हमारे काम निकालता है, स्वार्थ पूरे करता है और हमें अभयदान प्रदान करता है चाहे हमारे कर्म खोटे ही खोटे क्यों न हों। हमें उन सभी लोगों से कोई मतलब नहीं रहता जो लोग सज्जन हैं क्योंकि सज्जनों की खासियत होती है कि वे अपने-पराये, फरेब, झूठे कामों और उल्टे-सीधे काम निकालने के लिए अपनायी जाने वाली गलियों और हथकण्डों से दूर रहा करते हैं।

कुछ फीसदी सिद्धान्तवादी लेखकों और जुगाड़ू लिखाडूओं को छोड़ दिया जाए तो हम सभी लोग आजकल किसी न किसी के लिए लिखकर अपने आपको धन्य मान रहे हैं। झूठा प्रशस्तिगान और महिमा मण्डन भी इतना विस्मयकारी कि हमारी आत्मा भी गवाही न दे। मगर सामने वालों को खुश रखने के लिए हम लेखन को इतना अधिक व्यभिचारी और वैश्याई बना चुके हैं कि शर्म भी आती है और कभी-कभार ग्लानि के भाव भी।

लेकिन जिन पर लिखा जा रहा है अथवा जो हमसे लिखवाते रहे हैं उनका कद-पद और मद इतना अधिक बड़ा और व्यापक होता है कि हम चाहते हुए भी ना-नुकुर नहीं कर पाते। समाज और देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि हमारे यहां प्रलोभन, संबंध और दबावों की रणनीति में आम इंसान इस कदर फंसा हुआ है कि उसे हर क्षण यही अहसास होता है कि वह स्वतंत्र होकर भी कितना अधिक नज़रबंद और दास बना हुआ है।

बहुत से लोग हैं जिनकी आत्मीय रुचि लेखन में होती है। इन लोगों को हरसंभव प्रोत्साहन देना हमारा फर्ज है। इन लोगों से कहें कि वे अपने विचारों को लिखें, इसके बाद इनमें सुधार की कोई गुंजाइश हो तो सहयोग करें।  बहुत से लोग ऎसे आते हैं जो किसी न किसी विषय पर लेखन प्रतियोगिता में बाजी जीतने के लिए लिखवाने आ जाते हैं।

इन लोगों के नाम से लिखना भी अपराध है क्योंकि ये प्रतियोगिताएं होती ही इसलिए हैं ताकि प्रतिभाओं को उभार कर आगे लाया जा सके। दूसरों से लिखवाकर प्रतिस्पर्धा में बाजी मारने वाली प्रतिभाएं देश में किसी जिम्मेदार पद पर पहुंच गई तब भी पराश्रित ही रहेंगी। और यह स्थिति देश के लिए कितनी खराब होगी, इसकी कल्पना अभी नहीं की गई तो आने वाला कल हमारे लिए बुरा होगा ही, दोष किसी ओर का नहीं बल्कि हमारा ही होगा। 

जो कुछ लिखें, जो कुछ बोलें वह सत्य पर आधारित हो, झूठी महिमा न हो, वास्तविक के करीब हो तथा सबसे बड़ी बात यह है कि उसी के लिए लिखा जाए जो समाज और देश के लिए हितकारी हो, लुच्चों-टुच्चों, लफंगों और गच्चा देने वालों पर लिखना अपने आप में अधर्म है जिसके पाप से कोई नहीं बच सकता।

हमारा लेखन जगत के लिए हितकारी, सज्जनों को आगे बढ़ाने वाला तथा देश को कल्याणकारी दिशा देने वाला होना चाहिए।  जो लोग झूठ लिखते हैं, उनका लेखन तात्कालिक आनंद भले ही दे सकता है मगर यह लेखन कालजयी कभी नहीं हो सकता।

लेखन कर्म को मात्र पेन चलाकर, की बोर्ड के बटन दबाकर और माउस हिलाकर लिखना ही न समझें, यह सरस्वती का वरदान है जिसका दुरुपयोग न करें, रचनात्मक अभिव्यक्ति, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय उन्नति में योगदान देने वाला लेखन आत्मसात करें। अन्यथा उन हाथों को लकवा मार ही जाएगा जो झूठा ही झूठा लिखने में माहिर हैं। उस मुँह को भी लकवा होना ही है जो असत्य ही असत्य बोलता रहता है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

www.drdeepakacharya.com

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