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बढ़ते जा रहे हैं बवाली और मवाली - डॉ. दीपक आचार्य

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लोगों की जीवनीशक्ति और कर्तव्य परायणता अब खत्म होती जा रही है। इस वजह से अब कोई काम या सेवा करना नहीं चाहता। जिन लोगों को भरपूर मेहनताना मिल रहा है वे भी काम नहीं करना चाहते, और दूसरे लोग भी परिश्रम से जी चुराते हैं।

जिन्हें आवश्यकता है वे भी चाहते हैं कि पकी पकायी मिल जाए, और जिन्हें पूरी मिल रही है उनके लिए तो यह सुविधा है कि कुछ करें या न करें, बंधी-बंधायी तो महीना पूरा होते ही खाते में डल ही जाएगी। 

जब से कामचोरों, दरिद्रियों, आलसियों, प्रमादियों और भोगी-विलासियों को मुफत की मिलने लगी है तभी से कर्म क्षेत्र में यह धारणा पनपती जा रही है कि बिना किए भी बहुत कुछ मिल सकता है, इसलिए प्राप्ति प्रधान हो गई है और कर्म गौण।

जिन लोगों में मेहनत की कमाई की आदत थी वे भी अब निकम्मों को देखकर खुद भी वैसे ही होकर उनका अनुकरण करने लगे हैं। भेड़ों की रेवड़ों की तरह सारी भीड़ उस दिशा में बढ़ चली है जहाँ बिना कुछ अधिक मेहनत किए प्राप्ति की गारंटी हो, कोई रोक-टोक करने वाला न हो, सारे हमारे ही सरीखे हों और अधिकांश उसी प्रमादी और आरामलबी जिन्दगी को अंगीकार करने वाले हों, जैसे कि हम हो गए हैं। 

समाज और राष्ट्र के पिछड़ेपन के लिए यही मानसिकता घातक सिद्ध हो रही है। पुरुषार्थहीनता के वर्तमान दौर में कुछ फीसदी ही बचे हैं जिनका सिद्धान्त है कि मेहनत की कमायी पाएं, परिश्रम का खाएं और पसीना बहाकर अर्जित करें।

कर्म का क्षेत्र कोई सा हो, काफी सारे लोग ऎसे देखने को मिल ही जाया करते हैं कि जिनके बारे में साफ कहा जाता है कि ये लोग किसी काम-काज के नहीं हैं फिर भी साण्ड हुए जा रहे हैं और खूब जमा कर रहे हैं। पेट से लेकर पिटारियों और बोरियों से लेकर बैंक लॉकरों तक को भरने की सारी कलाओं में माहिर हैं।

असल में देश उन ईमानदार व मेहनतकश गरीबों और कठोर परिश्रमी लोगों की वजह से ही चल रहा है जो कि घण्टों पसीना बहाते हैं, हाड़तोड़ काम करते हैं और देश को आगे बढ़ा रहे हैं। इनकी मेहनत और समर्पण की तुलना हम लोगों के कामों और दैनिक जीवनचर्या से की जाए तो शर्मिन्दगी का अहसास हमें ही होगा।

बहुत सारा अपनी झोली में भर लेने के बावजूद हम संतुष्ट नहीं हैं। अधिक से अधिक पाने की सुरसा भूख के आगे हमारी ईमानदारी, सिद्धान्त और संस्कार भी पानी भरने लगे हैं। इतना सब कुछ पा रहे हैं वह किस काम का। न समाज के काम आ रहा है न देश के।

शाश्वत सत्य तो यह भी है कि जो कमाई ईमानदारी की नहीं है वह न हमारे काम आ पाती है न देश के। लगता यों है कि हम दूसरों के भाग्य से दिन-रात कमाने की आपाधापी में गलत-सलत रास्तों को अपना रहे हैं, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और जमाखोरी को बढ़ावा दे रहे हैं और जो कुछ जमा कर रहे हैं उसमें से हमारे काम कितना आ रहा है, इसका सही-सही जवाब दे पाना हर किसी के बूते में नहीं है।

परिश्रम से जी चुराने वाली संस्कृति को अपनाते हुए हम सभी चाहते हैं कि चमत्कार हो जाए, हम सभी को बड़े-बड़े ओहदे मिल जाएं, जीवन विलास के सारे संसाधन हाजिर हो जाएं, हमारी सेवा-चाकरी के लिए लोग जमा रहें, हम सब उन्मुक्त मौज-मस्ती और धींगामस्ती करते हुए खाने-पीने-घूमने से लेकर दूसरे सारे आनंद पाते रहें।

इस चक्कर में हमने अपने वंश परंपरा से सहेज कर रखे संस्कारों को ही नहीं बल्कि अपने हुनर को भुला दिया है। हम किसी काम के नहीं रहे। जो काम हमारे बाप-दादा और पुरखे करते चले आए हैं उन हुनरों को हम हीन मानते हैं, उनसे नफरत करते हैं। जबकि ये हमारी पीढ़ियों तक की आजीविका के आधार रहे हैं।

जो जिस हुनर में माहिर है उसके प्रयोग में जुटना ही कर्मयोग है न कि जड़ों से कटकर पराश्रित जीवन पाने के लिए भटकना। यह भटकाव ही है जिसकी वजह से हम कहीं के नहीं रहे हैं। हम सारे त्रिशंकु बने हुए हैं जहां न हमें पुराने ठौर-ठिकाने नज़र आते हैं न भविष्य का कोई सुख-चैन।

जब हमारे पास काम नहीं रहा, तब हम क्या करें, यही आज का यक्ष प्रश्न है जो सभी से जवाब मांग रहा है। बहुत सारे लोग हैं जो अपनी शक्तियों और क्षमताओं का उपयोग करते हुए बहुत कुछ कर सकते हैं लेकिन ऎसा करने की बजाय कहीं न कहीं बवाल मचाने में ज्यादा रस ले रहे हैं।

यह बवाल भरपूर पब्लिसिटी भी देता है और नए-नए आकाओं से समृद्धि और लोकप्रियता पाने के हर तरह के आशीर्वाद के रास्ते भी खोलता है। कुछ लोगों ने तो देश में बवाल मचाने का धंधा ही अपना लिया है। आए दिन कुछ न कुछ बवाल मचाते हुए अपने वजूद को सिद्ध करने में जुटे हुए हैं। 

अब देश में बवाली और मवाली कल्चर ने जन्म ले लिया है जहाँ राई को पहाड़ और चूहे को हाथी दिखाने का तिलस्म आजमाने का गोरखधंधा बहुत से लोगों को निहाल कर रहा है। पता नहीं ये मवाली और बवाली देश को कहां ले जाना चाहते हैं।

 

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

www.drdeepakacharya.com

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