शनिवार, 9 अप्रैल 2016

रचना और रचनाकार (२१) - समकालीन हिंदी कविता में रहस्यवाद की दस्तक / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

समकालीन हिंदी कविता छायावाद-रहस्यवाद के अवसान से आरम्भ होती है. प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और अब नई-कविता- इन सभी आंदोलनों ने अपने-अपने ढंग से रहस्यवाद को निष्कासित करने में महत्यपूर्ण योगदान दिया है. आज भी समकालीन कविता की मुख्य धारा ग़ैर-रहस्यवादी ही कही जाएगी, किंतु यह एक विडम्बना ही है कि रहस्यवादी धारा समय-समय पर क्षीर्ण भले ही हो गई हो पूरी तरह सूखकर समाप्त कभी नहीं हुई और आज भी उसकी उपस्थिति हिंदी कविता में हमारा ध्यान आकृष्ट करती है.

वस्तुतः इस चराचर विश्व का नियमन करने वाली एक व्यक्त और अज्ञात सत्ता की खोज में मनुष्य चिर काल से अभिरुचि लेता रहा है. उसे इस बात का आभास तो बराबर रहा है कि ऐसी एक सत्ता जो अन्य सभी अस्तित्ववान जीव-अजीवों का अभिष्ठान रही है, होना तो अवश्य चाहिए किंतु उसकी निश्चित रूप से प्रकृति क्या है, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है. इसी अज्ञात सत्ता को जानने के लिए वह प्रयत्नशील रहा है. समकालीन कविता के प्रसिद्ध गीतकार रमानाथ अवस्थी कहते हैं, ‘एक आवाज़ सरेआम से उभरती है/ पूछ मत दिल में वह किस तरह उतरती है/ मैंने चाहा कई बार इसे तो जानूं /सोचता हूं मगर कामयाब नहीं होता/ रोने क़ाबिल है ज़िंदगी मगर नहीं रोता/ चांदनी झूम-झूम रात भर संवरती है/ एक आवाज़ सरेआम से उभरती है.’ (साहित्य अमृत,मार्च९९)

रहस्य वह है जिसके बारे में हम जानते हैं कि वह है, लेकिन कैसा है, क्या है, यह नहीं जानते. ‘केशव कहि न जाय का कहिए’. रहस्य हमेशा अव्याख्यायित रह जाता है. उसकी व्याख्या शायद सम्भव भी नहीं है. उसे केवल संकेत से समझा जा सकता है और यह संकेत कवि को प्रकृति के व्यापार में, मनुष्य की संवेदनशीलता में और प्रेमानुभूति में मिलते हैं. नई कविता के महत्व पूर्णहस्ताक्षर लक्ष्मीकांत वर्मा कहते हैं –

इस सघन चंदन वन तीर्थ तट पर

मैं केवल तुम्हें ढूंढने आया हूं

अपने थके बोझल पंख खोले

मरुस्थलों से घिरे इस नीली झील

के विस्तार को मैं पी रहा हूं

इस निलय के संपुटों में कहीं कोई

एक मुक्ता है अनामिल

मैं उसी को ढूंढता हूं

आवाज़ देता हूं – उबरो

सघन चंदन-वन-तीर्थ तट पर

मैं तुम्हें ही ढूंढता हूं (स.अ.,मार्च, 1999)

यह जो परम सत्ता की तलाश है, एक भव्य तलाश है क्योंकि यह कोई ऐसी खोज नहीं है जिसे सांसारिक उपयोगिता के दायरे में क़ैद किया जा सके. इसमे पथ, पथिक और गंतव्य, कर्ता कर्म और करण, ज्ञाता ज्ञेय और ज्ञान, के मध्य का अंतर पूरी तरह समाप्त हो जाता है. इसीलिए दयाकृष्ण विजयवर्गीय कहते हैं –

हे अनया तूम्हें प्रणाम

तुम्ही हो पथ

तुम्हीं पथिक

तुम्ही गंतव्य

तुम्हीं सर्वस्व

हे सर्व

हे अनाम

तुम्हें प्रणाम (स.अ.मार्च, 2004)

यह एक अद्वैत अनुभूति है. एक ऐसी अनुभूति है जिसमें आत्मा स्वयं आत्मा का दर्शन करती है, जिसमें आत्मा और प्रकृति का एकात्म हो जाता है. यह कोई बौद्धिक या इंद्रियानुभव नहीं है. यह बुद्धि से परे अति-ऐंद्रिक अनुभूति है. बहुत कुछ प्रेमानुभूति की तरह, जहां सारा का सारा द्वैतभाव विघटित हो जाता है, आज इस अनुभूति का मानों अकाल सा पड़ गया है. सीतेश आलोक आश्चर्य करते हैं –

कैसी होगी... कहां रही होगी

वह संकरी गली

जिसमें दो नहीं समाते थे

कोई दूसरा जाता

तो एक होकर रह जाता था...

भविष्य की ओर दौड़ते

चौड़े राजमार्ग पर रुककर

कौन है जो उस गली के विषय में सिर खपाए

फिर भला

आज के विशाल सागर में ढाई आखर वाली

उस गली का उल्लेख कैसे आए (स.अ., सित. 1999)

लेकिन उल्लेख तो हो ही जाता है, यह कहकर भी कि उल्लेख कैसे हो !

रहस्यवाद कोई जादू नहीं है, और न हीं कोई गुप्त विद्या है. यह कोई रहस्यमय संवृत्ति भी नहीं है. यह तो अपरोक्ष, अव्यवहित अनुभूति है जिसका मौन आस्वादन किया जा सकता है. यह अनिर्वचनीय है, अकथनीय है. जैन ग्रंथ ‘आचारांग’ में कहा गया है ‘सब्बे सरा णिपद्वन्ति’ -

सब स्वर लौट आते हैं

वहां बुद्धि काम नहीं करती

और सारे तर्क धरे के धरे रह जाते हैं

(वह) सम्पन्न सम्पूर्ण है

तभी तो वहां से अपंग

सब स्वर लौट आते हैं

ज़ाहिर है ऐसी अनुभूति के लिए पहली शर्त तो यही है कि व्यक्ति अपने अहं को, अपने ‘मैं’ को पूरी तरह समाप्त कर दे. जहां ‘मैं’ है वहां ‘तू’ भी है और ऐसे में द्वैत की उपस्थिति अनिवार्य है. तू और मैं की खाई बनी रहना स्वाभाविक है. रहस्य की अद्वैतानुभूति के लिए पूर्ण समर्पण- जिसमें मैं का कण भर भी न हो – ज़रूरी होता है. समर्पण का यह गीत कीर्ति चौधरी गाती हैं –

झर जाते हैं शब्द हृदय से /पंखुरियों से

उन्हें समेटूं, तुमको दे दूं/ मन करता है

गहरे नीले नरम गुलाबी /पीले सुर्ख लाल

कितने ही रंग हृदय में/ झलक रहे हैं

उन्हें सजाकर तुम्हें दिखाऊं /मन करता है

खुशबू की लहरें उठती हैं /जल तरंग सी

बजती है रागनी हृदय में /उसे सुनूं मैं साथ तुम्हारे

मन करता है /कितनी बातें /कितनी यादें /भाव भरी

झर जाते हैं शब्द /हृदय की पंखुरियों से

उन्हें समेटूं, तुमको दे दूं /मन करता है. (सा.अ.,फर.,2004)

यह समर्पण और आत्म-निवेदन जिसमें अहं पिघल कर अपना अस्तित्व ही गवां दे सरल नहीं होता. यह तभी सम्भव है जब अज्ञात के प्रति पूर्ण श्रद्धा हो, जब अनाम प्रणम्य हो. जब उसके प्रतिपल अभिनव सृष्टि संसार को देखकर मन उसके एकात्म के लिए तड़प उठे. जब ऐसा लगे कि –

चतुर्दिक एक आह्वान है/ मैं बर्फ में पिघलता हूं

नदी में बहता हूं /झरनों में आलोड़ित

पक्षियों में गाता हूं /क्षितिज तक फैला हुआ

धरती से आकाश हो जाता हूं. (सा.अ., सित. 2003)

और ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि वह अव्यक्त चित्रकार ,

नित नई कल्पनाओं से रंग जाता है

सुबह और सांझ का आसमान

हर बार विलग और मौलिक

सृजन की अनंत कल्पनाएं

विविध रंगावलियों और दृश्य

कहीं पुनरावृत्ति, आवृत्ति नहीं… (वही)

कैसे-कैसे संकेतों से कैसी-कैसी चेष्टाओं से, कैसे-कैसे सूचक चिह्नों से अव्यक्त स्वयं को व्यक्त करता है, यह देखते ही बनता है. कभी समुद्र का अगाध जल ज़ो कभी फूलों के रंग, कभी लहरों की रागनी, कभी पंखरियों की कोमलता, कभी बाढ और कभी ज़लज़लों का डरावना स्वरूप, व्यक्ति को आश्चर्य से भर देता है और उसे मजबूर करता है कि वह उस अनाम, रहस्यमय सत्ता पर अपनी आस्था टिकाए. बेशक बुद्धि कौशल और इंद्रिय-बोध से वह उसे जान नहीं सकता, लेकिन अपनी उपस्थिति के अनेकानेक संकेत उसे निरंतर मिलते रहते हैं. वह उसके स्वभाव को उसके सृजन में ही तलाशता है. स्वदेश भारती अपनी समुद्र गाथा में कहते हैं-

हे समुद्र! एक दिन मेरे कान में धीरे से कहा था-

स्तुतेय, प्रातः स्मरणीय/अगाध का नमन ही

हमें ले जाता है अनंत के द्वार तक

जहां कहने के लिए/ कुछ बचा नहीं रहता

वहां हमारी इच्छाओं का प्रवाह नहीं रहता

सब कुछ स्थिर शांत हो जाता है/ हे समुद्र!

तुम्हें अगाध अनंत पाकर

मैं नमन करता हूं/ अपना अंतरतम भरता हूं

समकालीन कविता में इस प्रकार (नव)रहस्यवाद की यह दस्तक स्पष्ट सुनी जा सकती है. इसे अनदेखा करना आज की काव्यधारा की एक दिशा को नकारना है. ज़रूरत है कि हम यथार्थवाद के दायरे से बाहर आकर अपने अंतर को भी टटोलें.

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(हिंदुस्तानी ज़बान)

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