तबादला / कहानी / अंकिता भार्गव

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तबादला

बानी का उतरा चेहरा देख कर मैं और उर्मिला समझ गए वह उदास है। उसकी उदासी का कारण था ऋषभ का तबादला। वह काफी संवेदनशील है, अपने हाथों से सजाया-संवारा घर संसार छोड़ कर दूसरे शहर चल देना उसके लिए सदा तकलीफदेह रहा है। वहीं तबादला सरकारी कर्मचारी के जीवन में बार बार घटने वाली एक अनिवार्य प्रक्रिया है, यह भी मैं जानता था इसलिए ऋषभ को भी दोष नहीं दे सकता था।

वह मुझे चाय देने आई तो मैंने उसका सर हल्के थपक दिया, ”बानी बेटे ऐसे घबराते नहीं। तुम जानती हो कि ऋषभ नौकरी में तबादला होता रहता है। तुमने हमेशा इस समस्या का सामना हिम्मत से किया है, इस बार भी सब आसानी से हो जाएगा। हम हैं ना सब मिल कर संभाल लेंगे। देखना कोई मुश्किल नहीं आएगी। ऐसा करो तुम ऋषभ के साथ जोधपुर चली जाओ जाओ और घर की तलाश करो। बच्चों को यहां हमारे पास छोड़ जाओ। तब तक हम यहां थोड़ा थोड़ा करके सामान बांध लेंगे। जब तुम्हें लगे कि वहां सब व्यवस्था ठीक से हो गई है तो हमें फोन कर देना हम बच्चों और सामान के साथ चले आएंगे। क्यों ऋषभ ठीक है ना?“

नहीं पापा मैं आप लोगों को यहां अकेला छोड़ कर नहीं जाऊंगा। एक तो आप लोगों की तबियत ठीक नहीं रहती, आपसे इतना काम भी नहीं होगा। फिर बच्चों इतने शैतान हैं कि हमारे ही काबू में नहीं आते, आप दोनों के तो ये नाक में दम कर देंगे। हम सब एकसाथ ही चलेंगे। मैंने विवेक को पहले ही मकान ढूंढने के लिए कह दिया था। उसने मकान देख लिया है बस हमें तो वहां जा कर सामान ही रखना है। कोई समस्या नहीं आएगी, मैं बता चुका हूं बानी को फिर भी पता नहीं क्यों रोनी सूरत बना कर बैठी है।“

मेरी सभी सहेलियां यहीं छूट जाएंगी।“ बानी के आंसू आंखों की सीा पार कर गालों पर बिखरने लगे।

क्यों छूट जाएंगी? इंटरनेट के जमाने में कोई किसी से दूर होता है भला, सोशल साइट पर उनसे हमेशा दोस्ती बनाए रखना। बल्कि जोधपुर में और नई दोस्त बनाना।”

दादाजी पापा हमें शैतान कह रहे हैं। क्या हम आपको और दादी को परेशान करते हैं?“ मेरे पोते ध्रुव ने पूछा।

नहीं मेरे बच्चों तुम लोग हमें कहां परेशान करते हो। तुम तो बस हमें अपने पीछे दौड़ाते हो।“ मैंने उसके गुस्से से फूले हुए गालों को सहला दिया।

वाह, आज तो मां और बच्चे सभी, मुझसे दो दो हाथ करने के मूड में हैं।“ ऋषभ ने मजाकिया अंदाज में कहा तो गुमसुम बैठी बानी भी मुस्कुरा दी और घर का माहौल खुशनुमा हो गया।

जोधपुर में सबसे पहले हम ऋषभ के मित्र विवेक के घर गए। विवेक और उसकी पत्नि ने हमें रात को उनके घर पर ही आराम करने की आग्रह किया, किन्तु हमारी अनिच्छा देख उन्होंने हमें चाय नाश्ते के बाद घर दिखा दिया। घर अच्छा था, किन्तु काफी समय तक बंद रहने के कारण थोड़ी गंदगी फैली हुई थी। उस दिन सफर की थकान थी फिर रात भी काफी हो चली थी अतः घर की साफ सफाई का काम अगले दिन पर छोड़ हम सोने की तैयारी करने लगे। बानी ने एक कमरे में थोड़ी झाड़ पोंछ कर बिस्तर लगा दिए। खाना ऋषभ होटल से ले आया।

सुबह जब नींद खुली तो दिन चढ़ आया था। साढ़े आठ बज रहे थे। सच में देर हो गई थी। थकान के कारण किसी भी नींद नहीं खुली। नए शहर की पहली सुबह अपने साथ समस्या लेकर आई, घर में पानी ही नहीं था। अपनी आदत से मजबूर बानी घबरा गई। उसे इस तरह घबराते देख ऋषभ को गुस्सा आ गया, उसने बानी को डांट दिया तो वह रोने जैसी हो गई। उर्मिला ने उसे और बानी को शांत किया।

समस्या बेहद विकट थी। बिना पानी के दैनिक कार्य भी नहीं हो सकते थे, फिर हम वहां बिल्कुल नए थे, किससे मदद मांगने जाएं समझ ही नहीं आ रहा था। हम अभी इस समस्या का हल सोच ही रहे थे कि दरवाजे की घंटी बज उठी, कोई आया था। दरवाजे पर लगातार दस्तक हो रही थी, शायद कोई हमसे मिलने को उतावला हुआ जा रहा था।

ऋषभ ने दरवाजा खोला। दरवाजे पर एक भद्र महिला खड़ी थी जो ऋषभ को लगभग ठेलते हुए घर के अंदर घुसने को आमादा थी। ”कौन है ऋषभ?“ उर्मिला के इतना पूछते ही वह महिला घर के अंदर प्रवेश कर गई। उसके इस तरह आने से हम काफी असहज महसूस कर रहे थे, किन्तु उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पडा़।

नमस्कार आंटिजी मेरा नाम रोमा है। मैं आप लोगों की नई पड़ोसन हूं। आपके साथ वाले घर में ही रहती हूं। मैं तो कल ही आना चाहती थी आप लोगों से मिलने, पर चीकू के पापा ने कहा कि आज वो लोग थके हुए होंगे, कल चली जाना।“ आगंतुका ने आते ही एक सांस में अपना परिचय दे डाला। उसकी बातों से मुझे एक तसल्ली मिली कि यह किसी की तो सुनती है। ये चीकू और उसके पापा कौन हैं यह अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं था। खैर उर्मिला ने उसका स्वागत किया।

बानी को रूआंसा सा देख आगंतुका रोमा फिर बोली, “भाभीजी मैं जानती हूं आपके घर इस वक्त पानी नहीं है। इतने दिनों से घर बंद पड़ा था पानी आएगा भी कहां से। पर आप चिन्ता मत करो, मैं अपनी काम वाली से कह कर आई हूं वो हमारी टंकी से पाइप लगा कर यहां आती ही होगी, आप फटाफट से उससे घर की सफाई करवा लो, तब तक मैं नाश्ता लगा देती हूं, फिर सामान जमा लेंगे। सब हो जाएगा आप चिन्ता मत करो।” इसके साथ ही रोमा ने अपने साथ लाई ट्रे से सबके लिए नाश्ता परोसना भी षुरू कर दिया।

रोमा जितनी बातूनी थी, हाथ भी उतनी ही फुर्ती से चला रही थी। हम तो उसे आश्चर्य से देखते ही रह गए और उसने हमें नाश्ता भी करवा दिया। काफी अनौपचारिक सा व्यवहार था उसका। उसे देख कर लग ही नहीं रहा था कि वह आज हमसे पहली बार मिल रही है। ऐसा लग रहा था जैसे हम उसके रिश्तेदार या कोई अपने हों और वह बरसों से हमारे यहां आती जाती रही हो।

ऋषभ-बानी ने रोमा और उसकी नौकरानी के साथ मिलकर कुछ ही देर में घर जमा लिया, इतना ही नहीं रोमा और विवेक की पत्नी ने लगभग हर कदम पर बानी और ऋषभ की मदद की, बच्चों के स्कूल, उनके ट्यूशन, हमारे लिए बाई ढूंढने में उन दोनों का पूरा-पूरा सहयोग रहा। उन दोनों ने बानी को अपनी अपनी किट्टी में भी शामिल कर लिया, वहां बानी की कुछ और सहेलियां भी बन गईं। अब वह उदास और अकेली सी नहीं रहती थी।

एक दिन मैं बाहर बारामदे में बैठा अखबार पढ़ रहा था। दोनों बच्चे अपने पापा के साथ लान में फुटबाल खेल रहे थे, और सास बहू मिल कर सब्जी काट रही थीं। साथ ही दोनों के बीच बातचीत भी चल रही थी। दोनों किसी बात पर हंस रहीं थी।

बानी की हंसी ने मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। उसकी यह खिलखिलाहट मुझे सुकून दे गई। कई दिनों के बाद उसे ऐसे बेफिक्री से हंसते देखा था। मैंने ऋषभ की ओर देखा, वह भी अपनी पत्नी को प्रसन्न देख कर खुश था। मेरी और ऋषभ की नजरें मिलीं हम दोनों ही मुस्कुरा दिए। इस बार का तबादला प्रकरण सम्पन्न हो चुका था जो कि हमारे लिए राहत की बात थी।

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लेखिका परिचय

नाम -- अंकिता भार्गव

शिक्षा -- एम. ए. (लोक प्रशासन)

रूचियां -- अध्ययन एवं लेखन

पिता का नाम -- वीये लाल भार्गव

माता का नाम -- कांता देवी

विशेष -- अस्थि रोग ग्रस्त

अनुभव -- दिल्ली प्रेस द्वारा एक कहानी ‘फादर्स

डे’ व राजस्थान पत्रिका में कहानी ‘नाम करेगा रोशन’ प्रकाशनार्थ स्वीकार की जा चुकी हैं तथा राजस्थान पत्रिका में एक कविता ‘अक्स जाने पहचाने से नजर आए’ प्रकाशित हो चुकी है

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