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कहानी / शहर में गाँव / गोविन्द सेन

‘कहो गुरु कैसे आये ?’ स्वागत में हरि भैया ने प्रश्न दागा. कुशल-क्षेम के स्थान पर आने का प्रयोजन पूछना शायद उन्हें अधिक जरूरी लगा था.

संतोष पहले पटवारी था, लेकिन वहाँ के भ्रष्टाचार से घबराकर उसने इस्तीफा देकर मास्टरी कर ली थी. तब से वह भैया की नजर में ‘सिरफिरा’ सिध्द हो चुका था. ‘गुरु’ सम्बोधन के मूल में वही सन्दर्भ था.

‘आकाशवाणी से कविताओं का प्रसारण है.’ उसने सपाट स्वर में आने का प्रयोजन बताया.

‘अच्छा तो अब कवि बनेगा ?’ उन्होंने ‘कवि’ शब्द को लम्बा खींचते हुए कहा. इससे बेहतर प्रतिक्रिया की उम्मीद तो उसे भैया से थी भी नहीं. उनकी नजर में यह उसका अगला फितूर ही था.

‘घी नहीं लाया ?’ भाभी ने अब तक उसके झोले की जाँच कर ली थी. उन्होंने मुँह फुला लिया. जैसे घी न लाकर उसने कोई गंभीर अपराध कर दिया हो.

‘हम तो पैसे दे देते.’ उनके मुख से दूसरा वाक्य भी फूटे बिना न रह सका. संतोष के जी में आया कि भाभी को खरी-खरी सुना दे. यदि पैसे ही देना है तो यहाँ शहर में घी की कौनसी कमी है. पैसे हों तो शहर में हर चीज मिल जाती है. फिर आज तक उन्होंने कभी पैसे दिए है? या उसने कभी माँगे हैं? आज फिर अचानक बीच में ये पैसे कहाँ से आ गए? वह खिन्न हो उठा. जी में आया की उठ कर चल दे. लेकिन भीतर ही भीतर उफनता हुआ बैठा रहा.

एक घंटा पूर्व संतोष आकाशवाणी के लिए रवाना हो गया. रास्ते भर मन ही मन प्रसारित होने वाली कविताएँ दोहराता रहा.

उद्घोषक उसे प्रसारण कक्ष में ले गए. जब उसे माइक्रोफोन के सामने बैठाया गया तो वह कुछ क्षणों के लिए कल्पनाशील हो उठा. उसकी आवाज सुदूर गाँवों तक जाएगी. कितने परिचित-अपरिचित उसे सुनेंगे. बई-बाबू जी के पल्ले तो कुछ पड़ेगा नहीं. हाँ, राजू जरूर सुनेगा. आते वक्त उसने रेडियो में सेल भी डलवा दिए थे ताकि बिजली बंद होने पर भी राजू कार्यक्रम सुनने से वंचित न रह जाए. राजू उसका भाई ही नहीं पक्का श्रोता भी था. भाभी तो कविता की शौक़ीन हैं. सुनेंगी ही. संतोष को विश्वास था. आकाशवाणी से मुक्त हो, वह सीधे कॉलोनी आया.

‘सुनीं कविताएँ.’ उसने भाभी से उत्साह-पूर्वक पूछा.

‘अरे, मैं तो भूल ही गयी.’ भाभी ने भूलने की भंगिमा बनाकर कहा तो उसे लगा कि उसका मन पूरी तरह बुझ गया है. उसे तो उम्मीद थी कि केवल सुनेंगी ही नहीं टेप भी कर लेंगी. कविताओं के कई कैसेट उन्होंने भरवा रखे थे. उनकी डायरी शेरो-शायरी से सराबोर थी. इसलिए उसने भाभी को कविता की शौक़ीन मन लिया था. दरअसल वे हल्की-फुल्की हास्य-रस की कवि-सम्मेलनी कविताओं के कैसेट थे और शेरो-शायरी ‍‌शृंगार-रस से पगी हुई. उनकी रुचि काफी सतही और छिछली थी. उन्हें संतोष की यथार्थपरक कविताओं से कोई सरोकार नहीं था.

भाभी को लेकर उसकी स्वयं की उम्मीदें निराधार एवं बचकाना लगीं. उसने आईने में खुद का देखा. बाल बिखरे हुए थे. चेहरा मनहूस लग रहा था. खिन्न और क्लांत. खाली-खाली. खंडहर हो चुकी इमारत जैसा.

संतोष को बरबस उस दिन की याद हो आयी जिस दिन उसे आकाशवाणी से लेटर मिला था. मारे ख़ुशी के उसके पाँव धरती पर टिक नहीं पा रहे थे. अगवाड़े से पिछवाड़े तक उसने निरुद्देश्य ही घर कई चक्कर लगा डाले थे. अब उसे वह अपनी हद दर्जे की मूर्खता लगने लगी थी.

आकाशवाणी का पूरा खुमार उतर चुका था. अब था तो एक खालीपन, खिन्नता और अपमानबोध. भीतर ही भीतर चुभता हुआ. यदि राजू के कपड़े न लेने होते तो वह रात की गाड़ी से रवाना हो जाता.

संतोष सुबह दैनिक क्रियाओं से निवृत्त हो बैठा ही था कि भाभी ने पड़ोस से अखबार लाकर उसके हाथ में पकड़ा दिया. वह भाभी की मंशा समझ गया. अख़बार में पढ़ने को था ही क्या! एक से एक मनहूस खबरें. दंगा, बलात्कार, हत्या, घोटाले, मंत्रिमंडल में फेर-बदल आदि-इत्यादि. निकट भविष्य में उसे किसी प्रतियोगी परीक्षा में भी नहीं बैठना था जो सामान्य ज्ञान बढ़ाने की जरूरत हो. दरअसल उसे मनोरंजन वाले कॉलम में शहर में चल रही फिल्मों का अवलोकन करना था. उसे कॉलम में डूबा पाकर सुमधुर स्वर में भाभी ने पूछा--‘कौनसी फिल्म दिखायेगा.’ उसे कहना पड़ा—‘जो आप चाहें.’ उन्होंने एक धाँसू फिल्म का नाम सुझाया. शहर में एक ‘कला’ फिल्म भी चल रही थी. लेकिन भाभी की धाँसू फिल्म के आगे उसने अपनी कला फिल्म को दबा लिया. क्योंकि यदि वह कला फिल्म की बात करता तो यक़ीनन उनका चेहरा मनहूस हो जाता.

भाभी ने चौका-बर्तन से निपटने में काफी फुर्ती दिखाई, फिर भी ग्यारह तो बज ही गए. वह तो तैयार था ही लेकिन भाभी को बनने-संवरने में काफी वक्त लगा. घने काले बालों के लिए भीनी-भीनी महक वाला डाबर आँवला लगाया गया. चेहरे पर पौंड्स लेपन हुआ. होठों का लिपिस्टीकरण हुआ. फिर अमेरिकन जार्जेट की साड़ी पहनी गई. अंतिम बार उन्होंने आईने के सामने स्वयं को खड़ा कर जाँचा कि कहीं कोई कोर-कसर तो नहीं रह गई. संतोष बैठे-बैठे उकता गया. ‘चलें’ उसने उठने का उपक्रम करते हुए कहा. ‘हाँ...हाँ...चलो.’ और चलते-चलते उन्होंने मुँह में इलाइची डाक ली ताकि पायरिया कि गंध दब जाए.

ऑटो से ‘देवश्री’ पहुँचना पड़ा. थोड़ी जल्दी कर ली होती तो टेम्पो से जाकर पैसे बचाए जा सकते थे. ऑटो से उतरे तो भाभी ने ब्लाउज में हाथ डालकर देर तक पैसे टटोले. तब तक संतोष ने भाड़ा चुका दिया. ‘अरे, संतू जल्दी में मैं तो पैसे ही भूल गई रे.’ भाभी ने बताया तो संतोष चौंका नहीं. यह तो जैसे तय था ही. वह भाभी की व्यवहार कुशलता से परिचित था.

सिनेमाघर से निकले तो संतोष का सिर भन्ना रहा था. बे-सिरपैर की कहानी. स्तरहीन गानें. कानफोडू संगीत. लेकिन भाभी को कहानी बहुत पसंद आयी थी.

क्लॉथ मार्किट में संतोष ने ने राजू के लिए पेंट और शर्ट पीस का कपड़ा पसंद किया तो भाभी भी ब्लाउज पीस देखने लगी. संतोष ने राजू के कपड़ों के साथ भाभी का ब्लाउज पीस भी पैक करवा लिया.

किराना मार्केट से सामान खरीदते वक्त उन्हें कोई अंतरंग सहेली मिल गयी. वे दोनों बातों में मशगूल हो गयीं. घर की बात. बाहर की बातें. बस बातें ही बातें. बातों की शाखाएँ फूटती चली गयीं. भाभी ने तो ताजा देखी फिल्म की स्टोरी तक सुना मारी. संतोष उन दोनों से अलग फालतू-सा खड़ा था. जब भाभी का ध्यान उधर गया, तब कहीं उन्होंने-‘आना दरी! कालोनी.’ कहकर अपनी ‘अंतरंग सहेली’ से विदा ली.

सब्जी मार्केट तक भाभी अपनी आर्थिक तंगी का रोना रोती रही. उसके भैया अक्सर बीमार रहते हैं. उनका खुद का भी ब्लड प्रेशर अक्सर बढ़ जाया करता है. सारा पैसा बीमारी में चला जाता है. ‘ऐसे जीने से तो भगवान मौत दे दे.’ उनके शब्द-शब्द से नैराश्य टपक रहा था. कोई अपरिचित उन्हें देखे तो समझे कि संसार में उस जैसी दुखी औरत दूसरी नहीं हो सकती. दरअसल वे संतोष पर अपनी आर्थिक तंगी और मुसीबतों का दुख लादकर सहानुभूति अर्जित कर लेना चाहती थी ताकि उसके द्वारा पैसे माँगने की संभावना न रहे जो उसने ब्लाउज पीस, किराना सामान और सब्जी खरीदने के लिए दिए थे.

कालोनी लौटते वक्त संतोष ने मन ही मन हिसाब लगाया तो अब तक भाभी की खरीददारी में अच्छी-खासी राशि खर्च हो चुकी थी जिससे उसका बजट गड़बड़ हो गया था.

रात की गाड़ी से ही संतोष ने लौटना तय कर लिया. विदाई का वातावरण निर्मित हुआ. उसने बगल में झोला टाँगा. श्रध्दारहित मन से भैया-भाभी के पाँव छुए.

‘अब के घी नहीं लाए तो आना भी मत.’ भैया बोले तो कमरे में कुछ क्षणों तक सन्नाटा खिंच गया.

‘अरे...अरे...आना...आना...जरूर आना...मैं तो यूँ ही मजाक कर रहा था.’ भैया ने संतोष का गंभीर चेहरा देख अपनी बात को काटा. दरअसल उन्हें जो कहना था, मजाक की ओट में कह दिया था.

‘और सुन...अबके मूँगफली जरूर लाना.’ भाभी ने जाते-जाते एक फरमाइश और लाद दी.

भैया-भाभी का पूर्णरूपेण शहरीकरण हो चुका था. हरि भैया उसके सगे भाई तो नहीं लेकिन सगे ताऊ के लड़के तो हैं ही. पुराने समय में लोगों में कितनी आत्मीयता होती थी. संतोष का मन गहरी वितृष्णा से भर गया. यहाँ ठहरने से बेहतर था वह किसी धर्मशाला या होटल में ठहरा होता!

कुछ देर बाद वह बस स्टैंड पर भीड़ में अपने गाँव की ओर जाने वाली बस तलाश रहा था.

-राधारमण कॉलोनी, मनावर, जिला-धार म.प्र. पिन-454446 ईमेल-govindsen2011@gmail.com

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