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ढलता सूरज / कहानी / डॉ. विजय लक्ष्मी राय

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कहानी
ढलता सूरज
रश्मि का शरीर ज्वर से तप रहा था । वह तेज बुखार में बार-बार करवटें बदल रही थी । आँखों में बेहोशी का नशा चढ़ता जा रहा था । इतने में दरवाजे की घंटी बजी । आँखें खोलकर दरवाजे की तरफ देखा । पलकें खुलने को तैयार नहीं थीं । मुश्किल से पलंग की पट्टी पकड़कर वह उठी, दीवार का सहारा लेते हुए दरवाजे की सिटकनी खोली । देखा पड़ोसिन शीतल थी । बिना कुछ उससे बात किए वह लड़खड़ाते कदमों से वापिस पलंग पर जाकर लुढ़क गई । शीतल घबड़ाकर रश्मि के पलंग के पास आई । क्या बात है रश्मि?' रश्मि बुखार की तीव्रता के कारण बोलना चाहकर भी नहीं बोल पायी ।

' घर में कोई नहीं है, क्या? ' भाई साहब कहाँ हैं? रश्मि, रश्मि, रश्मि. । ' पर रश्मि तो बेहोश हो चुकी थी ।
शीतल दौड़कर घर गई और अपने पति दिनेश को बुला लाई । दिनेश ने रश्मि की हालत देखी तो वह शीतल को वहीं रुकने का संकेत कर डॉक्टर को बुलाने चला गया । दिनेश के जाते ही शीतल की निगाह दीवाल घड़ी पर टिक गई जिसने अभी-अभी रात्रि के आठ बजने की सूचना दी थी । शीतल को समझ नहीं आ रहा था कि अचानक रश्मि को क्या हो गया, सुबह तो बिलकुल स्वस्थ थी । फिर अचानक घर में उसके पति का न होना और उसका तेज बुखार में तपना । शीतल काफी माथा-पच्ची करने पर भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पायी तो दिमाग को ढीला छोड़ पति दिनेश एवं डॉक्टर के आने की राह देखने लगी ।

रश्मि झाँसी में पंजाब नेशनल बैंक में क्लर्क के पद पर कार्यरत थी । उसका पूरा परिवार बबीना में रहता था जिसमें सास, ससुर, देवर और ननद सभी थे । पति आलोक इंजीनियर थे उनकी पोस्टिंग भी झाँसी में थी । लेकिन वह अक्सर बबीना जाते रहते थे, कई बार वहीं रुक जाते थे । रश्मि के चार साल की बेटी और दो साल का बेटा था । अभी चार- छह दिन पहले ही वह बच्चों को दादा-दादी के पास झाँसी छोड्कर आई थी ।
दरवाजे पर आहट होते ही शीतल ने दरवाजा खोला । दिनेश डॉक्टर के साथ सामने खड़ा था । वह बोली-   आईये डॉ. साहब जल्दी आईये । देखिये रश्मि को क्या हो गया । यह बोलती भी नहीं बेहोश पड़ी है । डॉ. ने कहा- ' आप घबड़ाईये मत, मैं अभी देखता हूँ क्या बात है । ' डॉ. ने रश्मि का चैकअप किया और कहा- ' कोई विशेष बात नहीं है, यह तेज बुखार के कारण बेहोश हैं । इन्हें कब से बुखार आ रहा है?

' सुबह 1 ०- 11 बजे तो यह बिलकुल ठीक थीं ।
' आप इनकी. । '
' मैं इनकी मित्र हूँ पड़ोस में रहती हूँ । यह मेरे पति दिनेश हैं ।
' फिर इनके घर में इस समय ' कोई नहीं है । सुबह इनके पति थे । लेकिन अभी नहीं हैं । रश्मि से भी कोई बात नहीं हो पाई कि उससे कुछ पूछ सकूं । '
' चिंता की कोई बात नहीं है । आप अनके सर पर ठंडे पानी की पट्टियां रखिये, थोड़ा बुखार कम होगा, जिससे यह होश में आ जायेंगी । मैं दवा लिख देता हूं होश में आते ही इन्हें खिला दीजियेगा । '
एक इंजेक्शन लगाकर डॉ. साहब चले गये ।

शीतल ने दिनेश की ओर देखा, आँखों में एक ही सवाल था अब क्या करें? दिनेश समझ गया बोला- ' देखो शीतल इन्हें अकेला छोड़ना ठीक नहीं, तुम यहीं बैठकर इनके सिर पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रखो, मैं दवा लेकर आता हूं । '

शीतल को रश्मि के सर पर पानी की पट्टियां रखते हुए करीब दो घंटे हो गये लेकिन रश्मि के बुखार में कोई अंतर नहीं आ रहा था । केवल दो मिनिट के लिए रश्मि को होश आया तो उसने शीतल से टूटे-फूटे शब्दों में केवल इतना बताया कि उसका उसके पति से झगड़ा हो गया था और वह बबीना चले गए हैं । इतना कहकर वह फिर बेहोश हो गई ।

शीतल यह तो जानती थी रश्मि और आलोक का आपस में झगड़ा तो होता रहता है, पर आज ऐसी क्या बात हो गई कि रश्मि की हालत इतनी खराब हो गई ।

शीतल के पति उसे दवा देकर अपने घर जा चुके थे । शीतल रश्मि की अंतरंग सहेली थी, अत : उसे इस हालत में छोड्कर वह अपने घर न जा सकी और वहीं सोफे पर लेट गई । शहर के बीचों बीच बने घंटाघर ने 12 बजे के 12 घंटे बजाये । शीतल की आँख खुल गई । हड़बड़ाकर उठकर उसने रश्मि के माथे को छुआ । बुखार में कोई कमी नहीं हुई थी बल्कि कुछ और बढ़ गया था । उसने अपने पति दिनेश को फोन किया । दिनेश ने आँखें मलते हुए फोन उठाया । शीतल ने रश्मि की स्थिति के बारे में उसे बताया । दिनेश बोला- ' एक काम करता हूँ बगल वाले शर्मा जी को भी उठा लेता हूँ फिर सोचते हैं क्या करना   थोड़ी ही देर में शर्मा जी, उनकी पली और दिनेश रश्मि के घर जा पहुंचे 1 सभी की सहमति से एक बार फिर से डाक्टर को बुलाने का विचार बनाया गया । शर्मा जी और दिनेश डॉ. को लेने चले गये ।

थोड़ी ही देर बाद डॉ. गुप्ता आ गए । उन्होंने रश्मि का पुन परीक्षण किया । वह बोले-लगता है यह किसी बात को लेकर परेशान हैं । उस बात के दिमाग पर गहरा असर डालने के कारण ही इन्हें तेज बुखार चढ़ा हुआ है । एक काम करिये इन्हें अस्पताल में भर्ती कर दीजिये । दिनेश ने अपनी गाड़ी निकाली । शीतल ने सहारा देकर गाड़ी में बिठाया और रात में ही रश्मि को अस्पताल में भर्ती करा दिया । सुबह होते ही शर्मा जी को अस्पताल में रश्मि के पास छोड़ शीतल और दिनेश घर वापिस आ गए क्योंकि वह लोग रात भर से जागे हुए थे ।
अब परेशानी यह थी कि रश्मि के पति आलोक को खबर कैसे भेजी जाए? उसका कोई फोन नम्बर भी नहीं है । पर ईश्वर कृपा से उनकी यह समस्या अपने आप हल हो गई । आलोक 11 बजे के करीब घर आए तो घर में ताला पड़ा हुआ था । वह शीतल के यहां गए वह रसोई में खाना बनाने में व्यस्त थी । दिनेश फिर से अस्पताल रश्मि की खबर लेने गया था ।

' शीतल जी रश्मि कहाँ है? घर में ताला पड़ा है ।

शीतल चूंकि रश्मि से छोटी थी अत : रश्मि और आलोक दोनों ही उसे नाम लेकर पुकारते थे । शीतल आलोक को देखते ही भड़क उठी- ' अब पूछ रहे हो रश्मि को, कल दोपहर से कहाँ गायब हो गये थे । पता भी है रश्मि का क्या हाल हुआ है?
' क्या हो गया, रश्मि को? कहाँ है? '
' अस्पताल में । '
' अस्पताल में. क्या हो गया?

' ये मुझसे पूछ रहे हो, क्या हो गया, यह तो मुझे आप से पूछना चाहिये । डॉक्टर का कहना है कि वह दिमागी तौर पर बहुत परेशान है । उसके मन को गहरी ठेस लगी है । इस कारण उसे बहुत तेज बुखार है वह कल शाम से ही बेहोश पड़ी है ।
अब आलोक से रुका नहीं गया, वह भागता हुआ अस्पताल पहुँचा । दिनेश बाहर ही मिल गया, वह उसे रश्मि के पास ले गया । रश्मि का बुखार कम हो चुका था वह होश में आ चुकी थी । आलोक ने रश्मि का हाथ थामते हुए कहा- ' रश्मि क्या बात है? क्या हो गया है तुम्हें?'  
रश्मि ने गुस्से में आकर हाथ छुड़ाकर कहा- आलोक तुम. तुम. सभ्य लोगों की श्रेणी में आते हो इसलिए तुम्हें असभ्य लोगों के पास बैठना, उन्हें छूना और बात करना शोभा नहीं देता । तुम यहाँ से जाओ । '
उसी समय डॉ. गुप्ता अंदर आये उन्होंने रश्मि की बात सुन ली थी अत : उन्होंने आलोक से कहा- ' आप कृपया अभी बाहर चले जाएं ।

लेकिन डॉक्टर. ये मेरी. पत्नी हैं ।
जानता हूँ चूंकि यह कई घंटों बाद मुश्किल से होश में आई हैं अतः इन्हें डिस्टर्व न करें । अन्यथा यह फिर से अपने होश खो सकती है । । आलोक डॉ. एवं रश्मि के ऊपर एक गहरी नजर डालकर बाहर चला गया ।
कल वह रश्मि के साथ कुछ ज्यादा सख्ती कर गया था । कुछ अपशब्द भी बोल गया था । वैसे तो उन दोनों के बीच अक्सर झगड़ा होता रहता था । लेकिन झगड़ा यह रूप ले लेगा उसने सोचा नहीं था ।

दो-तीन दिन बाद रश्मि स्वस्थ होकर घर आ गई । इस बीच बबीना से कोई भी नहीं आया । वह बच्चों को लेने बबीना चली गई । वहां सास-ससुर या घर के किसी भी सदस्य ने उससे उसकी तबीयत खराब होने की चर्चा नहीं की । वह समझ गई आलोक ने घर में उसकी बीमारी की कोई बात नहीं की है अत: वह भी चुप रही और किसी को इस बात की भनक भी नहीं होने दी कि आलोक और उसका झगड़ा हो गया है । सबके सामने वह आलोक से औपचारिक बात करती रही । दो-तीन दिन बाद बच्चों को लेकर उसे झाँसी आना था । उसने किसी से भी साथ में चलने को नहीं कहा आलोक ने कहा- ' किसी को साथ में ले जाओ, बच्चों को लेकर जा रही हो । ' रश्मि ने किसी को भी साथ लाने से मना कर दिया । आलोक इस बात से नाराज हो गया और बोला- ' तो फिर तुम अकेली चली जाओ बच्चे तुम्हारे साथ नहीं जायेंगे । '

पर रश्मि नहीं मानी । दोनों के बीच काफी झगड़ा बढ़ गया । सास-ससुर भी अपने बेटे की ही तरफदारी करने लगे । आखिर आलोक रश्मि ओर बच्चों को झाँसी छोड्कर फिर से बबीना लौट गया ।

अब रश्मि के समक्ष बैंक जाने और बच्चों को घर में अकेले छोड़ने की समस्या खड़ी हो गई । कई बार इच्छा हुई कि ससुराल से किसी को बुला ले या आलोक से समझौता कर ले लेकिन उसके स्वाभिमान ने उसे ऐसा करने से मना कर दिया । आखिर उसने शीतल और दिनेश की मदद से बच्चों के लिए एक आया का बंदोबस्त किया और एक माह की छुट्टी ले ली । बजे जब आया को ठीक से पहचानने लगे उसके साथ घुल   मिल गये तब उसने बेंक जाना प्रारंभ किया ।

इस बीच आलोक ने रश्मि और बच्चों की कोई खबर नहीं ली । धीरे- धीरे आलोक का घर आना कम से कम होता गया । रश्मि ने भी अकेले रहते हुए भी अपने आपको बच्चों में लगा लिया । उन्हीं के साथ वह खुश रहने लगीं । आलोक कभी-कभी बच्चों से मिलने आ जाता है । क्योंकि उसका तलाक नहीं हुआ है । आलोक से रश्मि की केवल औपचारिक बात होती है । ऐसा लगता है जैसे रश्मि ने अपने अकेले पन से हमेशा के लिए समझौता कर लिया है ।
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लेखक परिचय
जन्म 15 मार्च 196०
शिक्षा एम. ए., पी-एच .डी. ( हिन्दी)
सम्प्रति - प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, म.ल.बा.
शास. कन्या स्नातकोत्तर ( स्वाशासी) महाविद्यालय
भोपाल ( म. प्र.)

सम्पर्क सूत्र : एफ- 113/23, शिवाजी नगर, भोपाल ।
प्रकाशन लगभग 3० शोध - पत्र एवं आलेख प्रकाशित विभिन्न
पत्रिकाओं में कविताएं एवं पुस्तक समीक्षाएं प्रकाशित ।
आकाशवाणी भोपाल से कविताओं का प्रसारण, वर्तमान
में स्त्री विमर्श ' विषय पर ' लघुशोध  '  ।

सम्मान : अम्बेडकर फैलोशिप सम्मान दलित साहित्य अकादमी,
नई दिल्ली ।

अम्बेडकर आदित्य सम्मान उज्जैन
मानद उपााधि- हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग
सारस्वत सम्मान हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग,
इलाहाबाद













































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