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समीक्षा : खो गया गांव / प्रमोद कुमार मिश्र

“खो गया गाँव”: पुस्तक समीक्षा

लोक जीवन की सत्यानुभूति एवं सहज मन की सहज अभिव्यक्ति

प्रमोद कुमार मिश्र

“खो गया गाँव” डा. श्रीमती अपर्णा शर्मा का पहला कहानी संग्रह है। इसमें कुल 15 कहानियाँ संग्रहीत हैं। इन कहानियों की अन्तर्यात्रा में ऐसा अहसास होता है कि कोई संवेदना पर रन्दा चला रहा है। शब्द, स्मृति और संवेदना की दावाग्नि में जलने के बाद उभरे हुये छाले फूट-फूट कर कल्लाहट उत्पन्न करते हैं। ग्रामीण जीवन जगत के कसकते- कसकते अनुभवों से स्त्रियों के जीवन की अथाह मौन-व्यथा का चित्रण इन कहानियों में हुआ है। प्रसिद्ध समीक्षक टी. एस. इलियट जिसे ‘टेक्निकल इंटरेंस’ कहते थे वह शिल्प रस इन कहानियों में इस तरह जुड़ा हुआ है जैसे तितली के पंखो से उड़ान और लय के साथ रंग- बिरंगापन। इस उठान भरी उड़न में गति-लय का रूप रंग एकाग्र एवं आकर्षक है। इन कहानियों मे यथार्थ की आड़ मे होने वाली बकबक बहुत कम है यही कारण है कि इनमें आंतरिक एकालाप और संवाद का संयम है। यहाँ किसी विचारधारा की रूढ़ प्रतिबद्धता नहीं दिखायी पड़ती यदि प्रबिद्धता है तो वह मनुष्य की चिंताओं एवं समाज की समस्याओं के प्रति इस दृष्टि से कहीं से भी यह नहीं लगता कि लेखिका का यह पहला ही कहानी संग्रह है। कहानियों के पात्र सजीव हैं -- पाठक को कहीं न कहीं यह एहसास होता है कि यह चरित्र उसके अगल-बगल के ही हैं। उत्तर आधुनिक समाज को अपने जिस भौतिकवादी विकास पर घमंड है वह कामयाबी उसे किन कीमतों पर मिली है यह भी ध्यान रखना आवश्यक है। रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी के शब्दों में “जिसे कहती दुनिया कामयाबी वाय नादानी उसे किन क़ीमतों पर कामयाब इंसान लेते हैं।”

संग्रह की पहली कहानी ही पाठक का ध्यान बरबस अपनी ओर आकृष्ट कर लेती है। प्रथमदृष्टया तो ‘दीदी की शादी’ शीर्षक पाठक को एक सामान्य ही लगता है किन्तु पूरी कहानी पढ़ जाने के बाद पाठक का तादात्म्य ‘दीदी’ के चरित्र से हो जाता है और चरित्र को पाठक की सहानुभूति प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार कहानी संप्रेषण की दृष्टि से खरी उतरती है । नीलू बचपन से ही दीदी को माँ के रूप में देखती है निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार की विडंबना और आर्थिक समस्याओं से दो चार होते हुये दीदी खुद परिवार की जिम्मेदारी संभालती हैं। माता-पिता और दादी का ख्वाब तो मीनाक्षी दीदी को दुल्हन के जोड़े में देखना था किन्तु मध्यवर्गीय आर्थिक त्रासदी का शिकार परिवार अपने को नियति के सहारे छोड़ देता है। कहानी के अंत में छोटी बहन नीलू की शादी होने से माँ-बाप-दादी का ख्वाब तो नहीं पूरा होता परन्तु मीनाक्षी दीदी का ख्वाब जरूर पूरा हो जाता है। कहानी चरम पर पहुँच कर अपने उद्देश्य में सफल रहती है।

‘पगली की वापसी’ कहानी में मनुष्यता एवं सामाजिक समस्याओं के प्रति कहानीकार की चिन्ता साफ दृष्टिगोचर होती है। कहानी की नायिका विमला शराबी पति की कमजोरियों को सहते हुये और उफ तक न करते हुये स्वयं चिड़चिड़ी और असंयत हो जाती है। वही पति जिसके लिये वह सब कुछ करने को तैयार रहती थी उसे अस्पताल ले जाने के बहाने पागलखाने छोड़ आता है। यह समस्या वर्तमान समय में किसी न किसी रूप में समाज के सामने सुरसा की भाँति मुंह फैलाये खड़ी है । अपनों के द्वारा ठुकराये जाने की पीड़ा ‘अनाथ आश्रम’ और ‘वृद्धाश्रम’ जैसी व्यवस्थाएं जो पहले पश्चिम में ही दिखती थीं वह आज भारत में भी ‘आम’ होती जा रही हैं क्योकि सामाजिक मूल्यों में गिरावट का सिलसिला नितांत भौतिकता के उभार ने और तेज कर दिया है। पुनः अपने पुत्र के द्वारा घर वापस लाये जाने के बाद विमला कहती है, “तब से हर दिन मैने अपने परिवार की याद में और अपने जैसी मजबूर औरतों की जिन्दगी संवारने में लगाया है ... आज जो सुख मिला है अतीत के दुःखों को जीतने के लिये काफी है।” वास्तव में समाज को विमला जैसी महिला की आवश्यकता है जो अपने पाँव के छालों के साथ प्रत्येक महिला के उद्धार का काम कर सके।

एक अच्छी रचना देश और काल में निरंतर बदलते हुये मानवीय व्यक्तित्व को परिभाषित करती है । ‘टक्कर’ कहानी का यथार्थ और एकाग्र सच पाठक का चीर कर रख देता है, एक असहनीय यथार्थ ! कवि सुदामा पांडे ‘धूमिल’ के शब्दों में “लोहे का स्वाद लुहार से मत पूछो, उस घोड़े से पूछो जिसके मुहँ में लगाम है।” “आज मैं तुम्हें वह सत्य बतलाता हूँ, जिसके आगे हर सच्चाई छोटी है, इस दुनिया में भूखे आदमी का सबसे बड़ा तर्क रोटी है।” राधे बाबू जैसे लोग अपनी लक्जरी गाडि़यों से गरीबों का टक्कर मारने के बाद तमाम अंर्तद्वन्दों से गुजरते हुये अंत में घायल गरीब को एक हजार और पाँच सौ की नोटों की गड्डियों में से सौ का नोट खोजकर उसे देकर चलते बनते हैं यह घटना पाठक के मन, हृदय को बेध कर रख देती है। राधे बाबू की मानवीय संवेदना मर जाती है क्योंकि उन्हें इस बात का भय है कि सुबह-सुबह मुफ्त का मरीज बेटे के क्लीनिक पर लेकर जाने से बेटे की झिड़की ही मिलेगी। फैशनेबल पाश्चात्य रंग में रंगी बीबी का चेहरा याद आते ही उनकी सारी मानवीय संवेदना पल भर में ही तिरोहित हो जाती है।

किसी भी लेखक की सफलता उसके लेखन में समकालीनता के बोध से निर्धारित होती है। इधर पिछले चालीस पचास वर्षो में तेजी से बदलती मानवीय मानसिकता एवं भौतिकता के चरम रूप ने जो मानवीय मूल्य तोड़े हैं वे बदलाव इन कहानियों में सूक्ष्मता से अंकित हुये है। ‘झाड़ू’ कहानी में प्रतीकात्मकता के साथ गहरी संवेदना भी है। बदलते सामाजिक परिवेश की प्रतिध्वनि इस कहानी में स्पष्ट दिखलायी पड़ती है। कथा की नायिका मालती सोचती भी है- “मैं झाड़ू क्यों लगाऊँ, किसके लिये लगाऊँ यहां कौन मेरे बाल-बच्चे हैं? एक फ्रांस में तो एक अमेरिका में।” मालती विचार करती है कि उससे अधिक सम्पन्न तो उसकी मां थी क्योंकि उनके पास रहने के लिये कम से कम एक बेटा तो था, दादी तो और सम्पन्न थीं उनके पास तो अंत समय तक सबकुछ था और मालती के पास “न बच्चे न कूड़ा, न झाड़ू ... बदलाव की इस बयार ने अपनों को अपनों से हजारों मील दूर ले जा कर पटका है”, यही कहानी का मूल कथ्य है।

‘मेरी बेटी’ कहानी में कहानीकार ने नायिका कुसुम के माध्यम से बेटी के प्रति माँ की संवेदना को रेखांकित किया है। कुसुम अपनी बेटी के प्रति तो लगाव रखती है किन्तु वह ये भूल जाती है कि उसकी बहू

भी किसी की बेटी है और वह बहू को विदा करने से मना कर देती है। किन्तु बहू की उदासी देखकर उसे अपनी भूल का अहसास हो जाता है और तुरंत अपनी गलती सुधार लेती है। यह कहानी सास-बहू बेटी के बीच के अंतर्सम्बन्धों पर लिखी गयी है और अपने उद्देश्य मे पूर्णतः सफल है।

भारतीय जीवन मूल्यों पर चलने वाली नारी और पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित नारी के बीच का अंतर कहानीकार ने ‘हरी मिर्च’ कहानी में दो पात्रों रीता और नेहा के माध्यम से उजागर किया है। रीता आदर्श भारतीय नारी की प्रतीक है तो नेहा पाश्चात्य भौतिक सभ्यता से प्रभावित नारी की प्रतीक। नेहा ऊँची आवाज में कहती है, “आप क्या समझते हैं मैं सुबह से नौकरानी की तरह जुट जाया करूँ ... नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकती ... नहीं जी, मेरी भी कोई लाइफ है। मैं अपने दोस्तों, क्लब और किट्टी पार्टियों को नहीं छोड़ सकती। आप किसी घरेलू नौकर का इंतजाम कर लीजिये।” कहानी का अंत मर्मांतक है जो हृदय को बेध कर रख देता है ।

‘खाने पे नज़र’ रेलगाड़ी से यात्रा के दौरान अनजान महिला सहयात्री के द्वारा लेखिका एवं अन्य यात्रियों के ठगे जाने की कहानी है। कहानी पढ़कर पाठक को ऐसा प्रतीत होता है कि घटना जैसे उसके आस-पास की ही हो। ‘चक्कर एडवांस का’ कहानी में आंचलिक तत्व उभर कर सामने आया है। कहानी की नायिका गुड्डो अपने अंचल की भाषा का प्रयोग करती है यद्यपि अंग्रेजी भाषा के भी एकाध शब्द जो कि बोलचाल में सामान्यतः प्रयुक्त होते हैं उसकी भाषा में आ गये है। एक उदाहरण दृष्टव्य है- “उई दिना हम सबसे एडवांस मांगत रहे। वो अस्पताल में भर्ती रहा, मर गवा। इस प्रकार की भाषा के प्रयोग से गुड्डो का चरित्र और जीवंत हो उठा है। यह एक संवेदनशील कहानी है जो पाठक को अंदर तक द्रवित कर देती है। ‘लंबी चोटी’ परम्पराओं के आधुनिकता में बदल जाने की कहानी है तो ‘भगत’ छोटी, लघुकथा का बोध कराती मर्मस्पर्शी कहानी है। पशु-पक्षियों के प्रति भगत के प्रेम को लेखिका ने संवेदनशील ढंग से रेखाचित्रों के माध्यम से दर्शाया है। परंपरागत विश्वास एवं इलाज के पुराने नुस्खे भी कम कारगर नहीं होते यह ‘भगवती’ कहानी में दिखाया गया है। गंगा मैया के प्रति भगवती का लगाव देखते ही बनता है। भगवती नदियों में नालों को गिराने की सख्त विरोधी है जो कि वर्तमान समय में भी गंगा जैसी नदियों की प्रमुख समस्या है और समाज को भगवती जैसे किरदार की महती आवश्यकता है। महिलाओं के प्रति अभद्रता एवं छेड़खानी की बढ़ती कुप्रवृत्तियां ‘आखिर कब तक’ नामक कहानी में अभिव्यक्त हुयी है। वर्तमान समय में चर्चित दिव्या कांड या शीलू वास्तव में इन्ही मानसिक विकृतियों के कारण हुए है। कहानीकार ने इस कहानी के माध्यम से इस ज्वलन्त मुद्दे को उठाया है। स्त्री विमर्श की दृष्टि से भी यह कहानी उल्लेखनीय है। पुत्र के प्रति माँ की ममता का मर्मस्पर्शी चित्रण ‘समर्थ’ कहानी में हुआ है। रिश्तों में टूटन व्यकितगत स्वार्थ के वशीभूत होकर छाटी बहन के प्रति बड़ी बहन की संवेदनहीनता फलस्वरूप सम्बन्धों में बिखराव का हृदयस्पर्शी चित्रण ‘बड़ी बहन’ में हुआ है।

इस कहानी संग्रह की सबसे लम्बी एवं अंतिम कहानी है ‘खो गया गाँव’ । इसमें वर्तमान ग्रामीण परिवेश में हो रहे परिर्वनों एवं टूटते जीवन मूल्यों को रेखांकित किया गया है। भारतीय गाँव किस प्रकार उत्तर आधुनिक भौतिकवाद के शिकार हो रहे हैं, कहानीकार ने इस कहानी में दर्शाया है। लोभ और द्वेष ने आदमी को आदमी से किस प्रकार दूर किया है, बेतरतीब ढंग से हुआ ग्राम्य विकास इस कहानी का मुख्य मुद्दा है। नायक प्रताप सिंह की स्मृतियों का गाँव खो गया, “किसानों के लोभ और खेती के नये औजारों ने सड़क को फिट भर अन्दर तक खोद लिया है ... इनका बस चले तो सड़क पर भी गेहूं बो दें।”

अंत में “खो गया गाँव” संग्रह की कहानियों को पढ़कर कहा जा सकता हैं कि इन कहानियों में लोक जीवन की सत्यानुभूति एवं सहज मन की सहज अव्यिक्ति मुखरित हयी है। उत्पीड़न, शोषण एवं पाखंड व्यापक रूप में और पूरी तफसील से साथ चित्रित हुये हैं। मानव संबंधों की प्रवंचना, जीवन की कृत्रिमता, संत्रास, घुटन, कुंठा, दिशाहीनता को रूपायित करना ही कहानीकार का मुख्य उद्देश्य है। स्थानीय रंग, संवादों की व्यंजकता मनोभावों का चित्रण, सामाजिक अवस्था तथा यथर्थवादी चित्रण कहानी में प्रतिष्ठित हुआ है। वर्तमान परिस्थितियों में स्त्री-पुरूष के संबंधों में परिवर्तन, परिवार के अंतर्विरोध, व्यक्तिगत कुंठायें मध्यवर्गीय जीवन की कटुताएं, सामयिक परिस्थितियों का उद्घाटन इन कहानियों का मुख्य लक्ष्य है। उत्तर आधुनिक साहित्यिक विमर्श की दृष्टि से भी ये कहानियाँ महत्वपूर्ण हैं, खासकर स्त्री विमर्श की दृष्टि से। इन कहानियों का कथ्य एवं शिल्प अन्य स्त्री लेखिकाओं से भिन्न है इनमें नवीनता है, भाषा सरल, सुव्यवस्थित, सुसंगठित एवं बोधगम्य है जो साधारण से साधारण पाठक को भी संप्रेषित करने की क्षमता रखती है।

समीक्षित कृति: ‘खो गया गाँव’ (कहानी संग्रह), डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा, माउण्ट बुक्स, दिल्ली-110053, संस्करण-2011, पृष्ठ 112, मूल्य: रू. 220/-

(प्रमोद कुमार मिश्र)

शोध छात्र

हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग

इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद - 211002 ।

मो. 8563033709

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