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धरती माँ की छाती / कविता / क़ैस जौनपुरी


धरती माँ की छाती

यहाँ ज़मीन पर किसान
भूखे बच्चे की तरह
धरती माँ की छाती
निचोड़-निचोड़ कर थक गया है
लेकिन धरती माँ की
सूखी छातियों में दूध उतर नहीं रहा
ज़मीन के कई हिस्सों में पानी बरस नहीं रहा

वहाँ ऊपर भगवान
किसी लापरवाह बाप की तरह
पाप और पुण्य की नई-नई धाराएँ
लिखने में व्यस्त है

कैसा लापरवाह बाप है
इसे अपने रोते बिलखते
बच्चे भी दिखाई नहीं देते
जो मशरूफ़ है दफ़ाएँ लिखने में
कि किसको कौन सी सज़ा देगा
मरने के बाद

पिछले बीस सालों में गिनती
तीन लाख़ हो चुकी है
अब तो आँखें खोलो
और अपने बड़े बेटों से कुछ बोलो
जिनके हाथ ने तुमने घर की
ज़िम्मेदारी दे रखी है
जिन्होंने अपनी ज़िम्मेदारियों से
अपनी आँखें मूँद रखी हैं
पहले सज़ा दो
ज़िन्दा गुनहगारों को
मौत के बाद के लिए
बचा के रखो
अपने संस्कारी हथियारों को

बच्चे तो तुम्हारे ही हैं
तुमसे बचके कहाँ जाएँगे
दिन भर अगर डर से भटके भी
तो शाम तक लौट आएँगे
फिर तुम भी ज़रा
तमीज़ से पेश आना
और बेरहम बाप मत कहलाना
और झूठ मूठ का रोब मत दिखाना
बच्चे तुमने अपनी ज़रूरत के लिए पैदा किए थे
बच्चों से पहले तुम्हें ज़मीन पे आना चाहिए था
ज़िन्दगी कैसे जीनी है
बताना चाहिए था

तुमने शुरुआत ही ग़लत कर दी
पहले कानून फिर इनसान बनाने चाहिए थे
तुमने पहले इनसान फिर कानून बनाया है
सच कहूँ दोस्त
तू यहीं लड़खड़ाया है

वरना सब कुछ तो ठीक था
बस कानून ही बनाना था
तो ये भी बना देते कि कोई पेड़ नहीं काटेगा
वरना उसकी भी गर्दन उड़ा दी जाएगी
पेड़ नहीं कटते
तो धरती माँ की
छातियों का दूध
कभी नहीं सूखता
और तुम्हारा कोई भी बच्चा
सूखे और भूख की वजह से नहीं मरता

तुम्हारे बड़े बेटों ने घर में फेरबदल कर दी है
जिसका खामियाज़ा छोटों को भुगतना पड़ रहा है
छोटे भी बड़ों की गलतियाँ सुधारने में
नई गलतियाँ कर रहे हैं
और ज़िन्दगी जीने के
रोज़ नए-नए तरीक़े गढ़ रहे हैं

और तुम कैसे बाप हो
तुम्हारी आँख के सामने ही
तुम्हारे बच्चे बिगड़ रहे हैं
और तुम्हें फ़र्क़ भी नहीं पड़ता
ये बच्चे तो तुम्हारे ही हैं
या तुम भी इन्हें कहीं से उठा के लाए थे

जवाब दो
चुप क्यों हो
देखो ऐसे चुप न रहो
तुम्हारी ख़ामोशी
किसी और तरफ़ इशारा करती है
इतनी सारी औलादें
नाज़ायज़ और हराम की नहीं हो सकतीं

तुम्हारे सिवा और कौन है
जो इनकी ज़िम्मेदारी लेगा

 

***

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