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कहाँ खेलें बच्चे ? / यशवंत कोठारी

गर्मियां शुरू हो गई हैं, बच्चों के स्कूलों में छुट्टियां हो गई हैं , दिन बड़े होने लग गए हैं ,बच्चे , बच्चियां खेल -कूदना चाहती हैं ताकि गर्मियां पास हो जाये। मगर अफ़सोस शहर में बच्चों के खेलने कूदने के लिए कोई जगह ही नहीं बची हैं , पार्कों में बच्चों को खेलने नहीं दिया जाता , स्कूलों में ग्राउंड नहीं हैं , बच्चे गलियों में खेल कूद का प्रयास करते हैं ,लेकिन वहां भी जगहों की बड़ी मारा मारी है। अस्थायी अतिक्रमण सबसे बड़ी समस्या हैं।

इस सम्बन्ध में शहर के स्कूल प्रबंधक भी लापरवाह हैं . शहर में ज्यादातर स्कूल छोटे मकानों में चलते हैं जहाँ पर खेल के मैदान की कोई सम्भावना ही नहीं हैं ,पिछले ५० वर्षों में शहरी इलाका बहुत ही भीड़ वाला हो गया है। कहीं भी खाली जगह नहीं बची है। , पार्कों में खेलने -कूदने की इजाजत नहीं मिलती है। सरकारी स्कूलों में भी ग्राउंड नहीं हैं। मीडिया में खेलने की समस्याओं पर अक्सर लिखा जाता है , मगर सरकार की ओर से कोई खास प्रयास नहीं किये जा रहे हैं। अस्थायी अतिक्रमण से पार्क, खेल के मैदान ख़त्म से हो गए हैं। युवा देश का भविष्य हैं, उनके शारीरिक विकास के लिए खेल कूद जरूरी हैं। बच्चों को अच्छा पर्यावरण मिले यह हम सबकी जिम्मेदारी है।

वास्तव में खेल के मैदान सीमेंट कंक्रीट के जंगलों में खो गए हैं.

नगर निगम, विकास प्राधिकरण , स्कूल, कॉलेज , यूनिवर्सिटीज व् अन्य संस्थाओं को मिल कर खेल के मैदानों के विकास की और ध्यान देना चाहिए। बच्चों को खेलने जगह मिले यह सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन सरकारें उदासीन हैं।

हर शहर के वार्डों को देखने के बाद यह कहा जा सकता है की बच्चों को खेल की सुविधा नहीं हैं, बच्चे परेशान हैं। इधर उधर फिरते हैं ,उनके विकास के लिए स्कूलों में भी ग्राउंड की जरूरत है। जिन स्कूलों के पास ग्राउंड नहीं हैं, उनको खेल मैदान विकसित करने के लिए निर्देशित किया जाना चाहिए।

खुली जगह शहर में है ही नहीं। हर तरफ सीमेंट कंक्रीट के जंगल उग आये हैं।

सरकार शहर को स्मार्ट बनना चाहती हैं ,लेकिन युवा, बच्चों , लड़कियों के स्वास्थ केलिए जरूरी खुली जगह व खेल के मैदान के विकास पर कोई ध्यान नहीं देना चाहती।

यह समस्या हर बड़े शहर की है।

नगर निगमों के पास इस संबंध में कोई योजना नहीं हैं। बहुत सारे वार्डों में कोई जगह ही नहीं बची हैं ,बड़े -बूढ़े बच्चों को खेलने नहीं देते.

कुछ वर्षों पहले रविवार व् छुट्टी के दिन बच्चे आसपास के खुले मैदानों में खेलते थे , मैच होते थे , मनोरंजन होता था, शारीरिक विकास होता था , मगर यह सब पुरानी बातें हो गयी हैं ।

बच्चे हताश, निराश हैं । गर्मियां बीत जाएगी , कुछ होने वाला नहीं हैं यही सोच कर दुःख होता है।

सरकार को खेलने कूदने के लिए जगहों को आरक्षण देना चाहिए। कुछ अगली पीढ़ी के लिए भी किया जाना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी हमें गर्व से याद करे।

एक अच्छी विरासत छोड़कर जाना ही सबसे बड़ा धर्म होगा।

--

यशवंत कोठरी

८६, लक्ष्मी नगर , ब्रह्मपुरी

जयपुर -३०२००२

मो -९४१४४६१२०७

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