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व्यंग्य / भ्रमण को व्यग्र मंझले बाबू / अशोक गौतम

 

ज्यों ही मंझले बाबू अपने आपदा प्रबंधन कार्यालय द्वारा आयोजित संवेदनशीलता अग्नि प्रतियोगिता में सफल हो सूखाग्रस्त क्षेत्र के भ्रमण का सेहरा सिर पर बांधने लायक घोषित हुए तो उनकी खुशी का पारावार न रहा। उन्हें लगा जैसे वे एकबार फिर घोड़ी पर सवार हो रहे हों। उन्हें उस वक्त लगा जैसे वे घोड़ी पर कांधे पर कटार रखे बैठे हों और घोड़ी के आगे-पीछे उनके कार्यालय के असंवेदनहीन रोते- रोते अपना-अपना सिर पीट रहे हों।

कितने अरमानों से उन्होंने कई बार आपदाग्रस्त क्षेत्र के भ्रमण का आनंद लेना चाहा पर हर बार ऐन मौके पर बाजी और ही मार जाते और उनका नाम आपदाग्रस्त क्षेत्र का भ्रमण करने वाली टीम में से ऐसे निकाल दिया जाता जैसे दो कौड़ी का हलवाई मूंछें न होने के बाद भी मूंछों पर ताव देते दूध में से सबके सामने मरी मक्खी निकाल परे कर देता है हसंते हुए।

उनकी बारी चाहे अबके भी सूखाग्रस्त क्षेत्र का भ्रमण करने की न आती पर भला हो भगवान का कि जो नेता अफसरों से पहले इन क्षेत्रों के दौरे के नाम पर सरकारी खर्चे पर करोड़ों की कारों में पिकनिक मनाने निकले थे, वे मीडिया की नजरों में इसलिए आ गए कि प्यासग्रस्त आत्माओं को मिलने पर उनके चेहरे की रौनक देखने लायक थी। कहीं से भी दिखावे को भी उनके चेहरों से नहीं लग रहा था कि वे सूखाग्रस्त लोगों का दुख-दर्द बांटने आए हों, उन्हें सांत्वना देने आए हों। अतः सरकार ने पार्टी की फजीहत होती देख निर्णय लिया कि आगे से जो भी सूखाग्रस्त लोगों से मिलने सरकारी खर्चे पर जाएगा, भले ही उसके मन में उनके प्रति संवदेना हो या न पर चेहरे से वे पूरी तरह ऐसे दिखने चाहिएं जैसे सूखे की मार से जितनी परेशान जनता है उससे कहीं अधिक परेशान वे हैं।

और मंझले बाबू ठहरे नौंटकी के महारथी। सो बीसियों को पछाड़ अबके नौटंकी के बूते बाजी मार गए। कइयों के सूटकेस भरे के भरे रह गए। सूखाग्रस्त क्षेत्र के लोगों के दर्द से रूबरू होने के सपने धरे के धरे रह गए।

जो मंझले बाबू रात को आठ बजे तक गिरते -पड़ते भी घर आ जाएं तो वक्त के आए, आज जब वे पांच बजे से पहले घर आए तो बीवी हैरान हो उठी। आते ही उन्होंने अपनी बीवी से अपने चार सूट सूटकेस में टाई- शाई सहित पैक करवाए और सारी रात सोने के बदले सूखाग्रस्त क्षेत्र के एक से एक हसीन मंजर को विस्फरित नैनों से देख मन होने के बाद भी मन ही मन खुश होते रहे। जब रात को बिस्तर पर उलटते -पलटते मोबाइल पर टाइम देखा तो दो बजे थे। हर रोज नौ बजे घोड़े बेच कर सोने वाले मंझले बाबू की आंखों से नींद उस वक्त वैसे ही कोसों दूर थी जैसे शादी के बाद उनकी प्रेमिका।

आखिर जब तवे पर पड़ी पकती मक्की कर रोटी की तरह वे बिस्तर पर खुद को उलटते-पलटते थक गए तो हारकर उन्होंने बिस्तर छोड़ा और बाहर आ आसमान की ओर एकटक आसमान में हिंदी फिल्मों की नायिका के महीन कपड़ों से बादल के भीतर गदराते आसमान को देखा तो उनका दिमाग जोर-जोर से धड़कने लगा। उन्हें लगा कि जो बरखा हो गई तो सारी की सारी तैयारी धरी की धरी रह जाएगी। कभी भगवान को न मानने वाले के हाथ उसी वक्त भगवान को आसामन में मान आसमान की ओर जुड़े तो भगवान ने भी सोचा कि इस नास्तिक की बात आज मान ही ली जाए, वरना ऐसा न हो कि बंदा हमेशा -हमेशा को नास्तिक ही रहे और वे अपने एक वोटर से हाथ धो बैठें।

असल में नेताओं की तरह भगवान भी आजकल मंझले बुरे दौर से गुजर रहे हैं। जिस तरह नेताओं को अपना एक- एक वोट दांत से पकड़ कर रखना पड़ रहा है ठीक यही स्थिति आजकल भगवान की चल रही है। भक्तों का पता ही नहीं चलता कि कैसे ,क्यों सुबह वे किसी और के चरणों में होते हैं तो शाम की किसी और के चरणों में।

मंझले बाबू ने आस्था न होने के बाद भी भगवान को पुकारा तो वे उनका मुंह बंद होने से पहले ही उनके आगे हाजिर होते बोले,' कहो मंझले बाबू! जिंदगी में पहली बार कैसे याद किया? तुमने मुझे याद किया तो मैं धन्य हुआ। कहो, क्या चाहते हो?'

'प्रभु! देखो तो तुमने आसमान में बादल ला दिए। पहली बार तो सूखाग्रस्त क्षेत्र का भ्रमण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था और अब ऊपर आसमान में ये..... सिर मुडांते ही ओले... प्रभु , कुछ करो वरना मुझे कहीं दिल का दौरा न पड़ जाए।'

'मंझले बाबू! क्यों ठिठोली करते हो? दिल का दौरा उन्हें पड़ता है जिनके पास दिल हो। जनता से तो आजतक मजाक ही करते आए आए पर अब मुझसे भी मजाक करने लग गए?'

' नहीं प्रभु! आज पहली बार दिल से कह रहा हूं। अगर तुम सच्ची को भगवान हो तो आसमान से अभी बादल हटा दो। नहीं तो मैं समझूंगा इस धरती पर भगवान हैं ही नहीं।'

'मतलब??' भगवान को काटो तो खून नहीं।

'प्रभु! कितने जुगाड़ करने के बाद अबके अचानक सूखाग्रस्त क्षेत्र का भ्रमण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। और अब जो मुझे यह मौका मिला भी तो ...' कह मंझले बाबू की आंखों में पहली बार आंसू दिखे तो भगवान का मन पसीज गया। तब वे मंझले बाबू के स्वारथ का गुणगान करते बोले,' अरे मंझले बाबू! इतने से बादलों को देख डर गए? ये तो उतने भी नहीं जितने तुम्हारी नायिकाओं के शरीर पर कपड़े होते हैं। ये कहां बरसेंगे मंझले बाबू!'

'पर डर तो लग रहा है न प्रभु! तुम सच्ची को असली भगवान हो तो इन बादलों को ये जैसे भी हों, आसमान से इन्हें एकदम हवा कर दो।'

' देखो मंझले बाबू! बुरा मत मानना , ग्रीष्म ऋतु में जो आकल, मृत्यु तक को नंगा आसमान दिखे तोउनकी भी रूह कांप उठती है। ये तुम कैसे जीव हो मंझले बाबू? घोर स्वार्थी मंझले बाबू?'

' प्रभु, डींगे चाहे कोई कितनी ही क्यों न मार ले, दावे चाहे कोई कितने ही क्यों न कर ले , पर सच यह है कि आजकल हर जीव अपने पैरों से आगे की सोच रखता ही नहीं। इसलिए जैसा भी हूं मैं बस वैसा ही ठीक हूं। बस, इन बादलों को आसमान से हटा दो। कहीं ऐसा न हो सुबह ऑफिस से फोन आ जाए कि जिस सूखाग्रस्त क्षेत्र का जहां मैं हवाई भ्रमण करने जा रहा हूं , वहां बारिश होने की संभावना है , अगर कहीं ऐसा हो गया न तो प्रभु, मैं तुम्हें किसी जन्म में भी माफ नहीं करूंगा,' मंझले बाबू की घोर स्वारथता देख प्रभु ने उसे इस धरती पर भेजने वाले को दोनों हाथ जोड़ने के बाद कहा,' पर मंझले बाबू! एक आदमी की मस्ती की पूर्ति के बदले हजारों लोगों के अभावों की पूर्ति हो जाए तो कौन सी बुरी बात है?'

' मतलब, तुम जनता के साथ हो प्रभु? सिस्टम के साथ नहीं?? बुरी बात है जनता के साथ होना। देखो प्रभु, जो जनता का साथ दोगे तो घाटे ही घाटे में रहोगे और जो सिस्टम का साथ दोगे तो सूखाग्रस्त , बाढ़ग्रस्त देश होने पर भी मिनरल वाटर में नहाओगे,' मंझले बाबू ने भगवान से घूरते कहा तो भगवान को अपनी गलती का अहसास हुआ । तब वे भीगा शेर होते बोले,' नहीं, मेरा मतलब ये नहीं मंझले बाबू पर....', पर सच ये था कि भीतर ही भीतर प्रभु मंझले बाबू के गुस्से से डर गए थे कि जो मंझले बाबू को पता चल गया कि सच्ची को वे जनता का पक्ष ले रहे हैं तो वे जैसे कैसे उनके चलते काम काज में रोड़े न डलवा दें। बाबू चाहे किसी भी विभाग के हों, सब एक से होते हैं।

'तो ये बादल आसमान से हटा दो अभी के अभी!' मंझले बाबू ने गुस्साते कहा तो भगवान ने दोनों हाथ जोड़े और अंतरध्यान हो गए।

अशोक गौतम,

गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

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अशोक गौतमजी,बहुत सुन्दर व्यंगय। ईश्वर को भी खूब लपेटा है। बधाई। सुरेन्द्र वर्मा ।

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