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बेजुबानों का दर्द समझें - डॉ. दीपक आचार्य

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भीषण गर्मी और गर्म हवाओं से भरे घातक मौसम में परिन्दों को हमसे बहुत अधिक आशाएं हैं। पानी की बूँद-बूँद के लिए परिन्दों की तड़फन इन दिनों देखी जा रही है और हम हैं कि बोतलबंद पानी, शीतल जल और ठण्डा-ठण्डा कूल-कूल के चक्कर में फंसे हुए हैं। 

हमारे आस-पास के प्राणियों की जरूरतों और समस्याओं की हमने अभी अनदेखी की तो आने वाले समय में हम भी जमाने की अनदेखी का सामना करने को विवश होंगे। हम धर्म के नाम पर तमाम प्रकार के आडम्बरों में रमे हुए हैं, बाबाओं, तांत्रिकों, टोने-टोटकाबाजों और पण्डितों के चक्कर में पूजा-हवन, ध्यान, अनुष्ठान, ग्रहशांति, कालसर्पदोष शमन आदि के अनुष्ठानों को ही धर्म मानकर धर्म के मूल तत्व से बेखबर होकर अंधविश्वासों में रमते जा रहे हैं, धर्मस्थलों के निर्माण पर लाखों-करोड़ों खर्च कर रहे हैं, जुलूसों, भोज, शोभायात्राओं और सत्संग-कथाओं पर पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं लेकिन जिसे वास्तविक धर्म माना गया है उसकी उपेक्षा कर रहे हैं अथवा अपनी नासमझी और संवेदनहीनता का प्रकटीकरण कर रहे हैं।

प्राणी मात्र के प्रति दया, करुणा और संवेदनशीलता इंसानियत का लक्षण है और हम हैं कि इन जीवों के प्रति अपने कर्तव्यों से विमुख हो गए हैं। हम सभी को गाड़ी-बंगले, दफ्तर-दुकान, कंपनी और सभी जगहों पर ठण्डक चाहिए इसलिए एयरकण्डीशनरों के भरोसे जी रहे  हैं, कूलर-फ्रीज को सर्वाधिक महत्व दे रहे हैं और उन सभी उपायों में जुटे हुए हैं जिनसे छाया, शीतलता के साथ गर्मी से राहत का सुकून मिल सके।

जो इंसान अपने ही सुख और सुकून के लिए जीता है वह दुनिया में सबसे अधम, खुदगर्ज और आसुरी है। ऎसे इंसानों की संख्या बढ़ते रहने के कारण ही आज हम संवेदनहीन माहौल में जी रहे हैं और हमारे आस-पास के लोग, पशु-पक्षी तथा पेड़ दुःखी, संतप्त और पीड़ित हैं। 

इन सभी को इंसान से ही आशा थी कि वे संवेदनशीलता के साथ कुछ सोचेंगे, करेंगे और अभावों-पीड़ाओं से उबारेंगे। लेकिन यहाँ तो इंसान की स्थिति ही कुछ दूसरी हो गई है। उसे अपनी ही पड़ी है, अपन भले, अपना घर भला।

आज हम सभी लोग धर्म को भूलते जा रहे हैं अथवा धर्म की अपने हिसाब से व्याख्याएं करने लगे हैं, धर्म को अपने हक में भुनाने के लिए हम पूरी दबंगई और नंगई के साथ मैदान में हैं, चन्दा वसूली और फिक्स डिपोजिट करने में भिड़े हुए हैं, धर्म के नाम पर दुकानें चला रहे हैं और अपने स्वार्थों को पूरे करने के लिए उन्मुक्त होकर उतर पड़े हैं।

असल में धर्म के नाम पर आजकल जो कुछ हो रहा है, धर्म की हानि हो रही है, धर्म के प्रति आस्थाहीनता के भाव व्याप्त हो रहे हैं इन सभी के लिए वे लोग जिम्मेदार हैं जो धर्म के नाम पर जनता का खा-पी रहे हैं, ऎश कर रहे हैं और आश्रमों के एयरकण्डीशण्ड कमरों में आराम फरमाने, भोग-विलास के आदी हो चुके हैं, धर्म के नाम पर पैसा बना रहे हैं और भोले-भाले आस्थावान लोगों को किसी न किसी बहाने लूट रहे हैं।

यही नहीं तो  धर्म के नाम पर तिजोरियां भर रहे हैं, बैंक लॉकर और खातों को समृद्ध बना रहे हैं और फाइनेंसरों के समूहों को साथ लेकर धर्म के नाम  आये पैसों को ब्याज पर चला रहे हैं। संसार को त्याग बैठे इन बाबाओं के स्वार्थ और प्रलोभनों के नए-नए संसार बनते जा रहे हैं

कोई नहीं समझ पा रहा है कि जो लोग संसार को त्याग कर वैराग्य धारण कर चुके हैं आखिर उन लोगों में धन-सम्पदा, आश्रम, जमीन-जायदाद और भोग-विलासी संसाधनों के प्रति मोह क्यों है। इन लोगों की सादगी, सरलता और सहजता कहां गायब हो गई।

इन लोगों की क्या ऎसी मजबूरी है कि जो राजनेताओं, पूंजीपतियों और प्रभावशाली लोगों के पीछे पागल हुए जा रहे हैं, उन्हें ईश्वर से अधिक पूजनीय मानकर उनकी चापलुसी और चमचागिरि में रमे हुए हैं। बहुत से बाबे कई महान लोगों के ब्राण्ड एम्बेसेडर बने हुए हैं और चाहते हैं कि उनके मठ और आश्रम वीआईपी चेलों और  उनके अनुचरों से भरे रहें ताकि पब्लिसिटी और पॉवर दिखे और लोगों का आकर्षण उनकी ओर बढ़ता रहे।

धर्म के नाम पर एक तरफ यह विचित्र हालात हैं और दूसरी तरफ हमारे आस-पास के पशु-पक्षी पानी के अभाव में मौत के मुँह में जा रहे हैं, गायों से लेकर सभी तरह के मवेशी पानी के अभाव में दम तोड़ते जा रहे हैं। इन प्राणियों को दाना-पानी तक मुहैया कराने में हमें शर्म महसूस हो रही है।

हमारे भक्तों, चेलों और आम लोगों को हम यह नहीं कह पा रहे हैं कि पशु-पक्षियों के लिए कुछ करें, दाना-पानी का इंतजाम करें, परिण्डे बांधे-बध्ांायें, प्राणियों की जीवन रक्षा करें और वास्तविक धर्म को अपनाएं। हम अपने ही अपने लिए सब जमा करने का गुरु मंत्र दे रहे हैं, कुछ तो परवाह करें उनकी जो हमारे आस-पास हैं। गरीबों और अभावग्रस्तों के लिए कुछ कर पाने का माद्दा और उदारता भले न हो, बेजुबानों पर तो दया करें।

कोई कहे न कहे, हम सभी की जिम्मेदारी है कि पशु-पक्षियों के लिए गर्मी में कुछ करें, उनके प्राण बचाएं। तभी हम असली इंसान कहे जा सकते हैं। यही सबसे बड़ा धर्म और पुण्य है जिसे अपना कर ईश्वर को प्रसन्न किया जा सकता है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

www.drdeepakacharya.com

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