सोमवार, 25 अप्रैल 2016

समीक्षा : 'परिषद् साक्ष्य' का जेपी-अंक यानी संपूर्ण क्रान्ति के नायक को नया हुंकार देती पत्रिका / शहंशाह आलम

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इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 'संपूर्ण क्रान्ति' देश की आत्मा और देश की चेतना में अब भी पूरी तरह पैवस्त है। बिहार का सन् 1974 का छात्र-आंदोलन व्यवस्था-परिवर्तन के लिए जयप्रकाशजी की ललकार पर किए गए विश्व भर के उन आंदोलनों जैसा ही था, जोकि सफ़ल हुए थे। यह एक ऐसा अद्भुत आंदोलन था, जिसने लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, सुशील कुमार मोदी तथा प्रो. जाबिर हुसेन जैसे नेताओं को भी जन्म दिया, जो जयप्रकाशजी के विचारों को आज भी स्पष्ट और सार्थक तरीक़े से ज़िंदा रखे हुए हैं। बिहार विधान परिषद् की बहुचर्चित वैचारिक-साहित्यिक पत्रिका 'परिषद् साक्ष्य' ने अपने लोकनायक स्मरण-अंक के बहाने जयप्रकाशजी के विचारों को पुनरुज्जीवित किया है। इस विशेषांक में जहाँ भारत के राष्ट्रपति, श्री प्रणव मुखर्जी, प्रधानमंत्री, श्री नरेन्द्र मोदी, बिहार के राज्यपाल, श्री राम नाथ कोविन्द, बिहार के मुख्यमंत्री, श्री नीतीश कुमार, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री, श्री लालू प्रसाद, पूर्व मुख्यमंत्री एवं बिहार विधान परिषद् की सदस्या, श्रीमती राबड़ी देवी, नेता विरोधी दल, बिहार विधान परिषद्, श्री सुशील कुमार मोदी के साथ-साथ बिहार के उप मुख्यमंत्री, श्री तेजस्वी प्रसाद यादव ने अपने पत्रों के माध्यम से जयप्रकाशजी को याद किया है। वहीं, बिहार विधान परिषद् के सभापति, श्री अवधेश नारायण सिंह ने 'प्रधान संरक्षक की क़लम से' के बहाने जयप्रकाशजी का पूरी विन्रमता से सटीक मूल्यांकन किया है।

इस अंक में पत्रिका के संपादक डा. उपेन्द्र प्रसाद का 'जयप्रकाश का समाजवाद से लोकनायक तक का सफ़र' शीर्षक संपादकीय क़ाबिले-ग़ौर है। लेखकों में बिहार विधान परिषद् के उप सभापति, मो. हारूण रशीद के अलावे प्रसिद्ध साहित्यकार डा. रामवचन राय, हरेन्द्र प्रताप पाण्डेय, विजय कुमार वर्मा, डा. संजय प्रकाश 'मयूख', कुमार कृष्णन, देवांशु शेखर मिश्र, प्रो. कमलाकांत मिश्र, गुप्तेश्वरनाथ श्रीवास्तव, अर्चना झा, डा. इंदिरा झा, सच्चिदानन्द, डा. विजय प्रकाश, भैरवलाल दास, चंद्रमोहन मिश्र, लता वर्मा, मुकुल सिन्हा, डा. ओम जमुआर, डा. अरविन्द श्रीवास्तव, डा. एम. के. मधु आदि की रचनाएँ जयप्रकाशजी के जीवन और व्यक्तित्व को पूरी धार और गंभीरता से प्रकट करती हैं। 'परिषद् साक्ष्य' के इस ख़ास अंक में 'तस्वीरों में क़ैद दुर्लभ क्षण' शीर्षक खंड में लोकनायक जयप्रकाश नारायण से जुड़ीं दो दर्जन तस्वीरें भी भव्यता से छापी गई हैं। ये सारी तस्वीरें रेयर हैं और सिर्फ़ यहीं पर संयोजित दिखाई देती हैं।

आज हमारे जीवन की जो स्थितियाँ हैं, इसमें संदेह नहीं कि काफ़ी जटिल भी हैं तथा विकट भी। लेकिन यह भी सच है कि हमारे महानायक हमें ऐसी स्थितियों से, ऐसी जटिलताओं से निकलने के लिए हमें रास्ते दिखाते रहे हैं---जयप्रकाशजी ऐसे ही महानायकों में हैं, जो हमें घुटन की किसी भी अवस्था से बाहर निकलने का मार्ग हमें दिखाकर गए हैं। बिहार विधान परिषद् के सभापति एवं 'परिषद् साक्ष्य' के प्रधान संरक्षक, श्री अवधेश नारायण सिंह ने सही ही कहा है 'कि जो सच्चे और अच्छे मनुष्य होते हैं, जिनके भीतर एक अलग ही तरह की गहरी सृजनात्मकता होती है, जो राष्ट्र को नया अनुभव और नया अनुभाव देना चाहते हैं, उनके पदचिह्न पर सभी चलना चाहते हैं। जयप्रकाश नारायण एक ऐसे ही मनुष्य थे, जिनके विचार आज भी हमें भूख से, बेरोज़गारी से मुक्ति के लिए मार्ग दिखाते हैं। जिस तरह अपने समय के विश्व के महान लेखक मैक्सिम गोर्की का 'सर्वहारा क्रान्ति' को लेकर विचार था कि क्रान्तिकारी सर्वहारा का मानवतावाद सीधा-सादा है। वे मानवता के प्रति प्यार के सुंदर शब्दों का वाग्जाल नहीं रचते। इसका लक्ष्य है सारी दुनिया के सर्वहारा को पूँजीवाद के शर्मनाक, ख़ूनी पागल जुए से मुक्त करना और मनुष्य को यह सिखाना कि वे स्वयं को ख़रीदा-बेचा जानेवाला माल न समझें। मेरा मानना है कि जयप्रकाश नारायण भी अपनी 'संपूर्ण क्रान्ति' के माध्यम से एक ऐसी ही दुनिया चाहते थे, जिसमें सारे मनुष्य एक सरल-सहज जीवन जीएँ।' इसमें संदेह नहीं कि बिहार विधान परिषद् के सभापति, श्री अवधेश नारायण सिंह के ये विचार गंभीरता से सोचे जाने के लिए मजबूर ही नहीं करते बल्कि जयप्रकाशजी के विचारों को एक नई सोच देते हैं और जयप्रकाशजी के विचारों को पूर्णता भी प्रदान करते हैं। इसलिए कि ये चुपचाप लिखे हुए विचार भर नहीं हैं, बल्कि एक सभापति के रूप में श्री अवधेश नारायण सिंह के चुनौतीपूर्ण कार्यों को साहस भी प्रदान करते हैं।

'परिषद् साक्ष्य' के प्रकाशन से जुड़ा एक रोचक और विस्मयकारी तथ्य यह भी है कि इस 'लोकनायक स्मरण-अंक' के साथ ही इस पत्रिका के बीस अंक पूरे हो चुके हैं। यह किसी भी संवैधानिक संस्था के लिए ऐतिहासिक क्षण कहा जा सकता है। 'साक्ष्य' के बीस अंकों के पृष्ठों को गिनने-जोड़ने बैठें तो हजारों हो जाएँगे। अपनी वैचारिक-साहित्यिक पत्रिका के माध्यम से जनता के विचारों को जनता तक पहुँचाने का यह अनूठा प्रयास देश की अन्य संवैधानिक संस्थाओं को प्रभावित करेगा, इसमें संदेह नहीं किया जाना चाहिए।

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'परिषद् साक्ष्य' (लोकनायक स्मरण-अंक)/ प्रधान संरक्षक : श्री अवधेश नारायण सिंह/ संपादक : डा. उपेन्द्र प्रसाद/ प्रकाशक : बिहार विधान परिषद्, पटना-800 015/ मूल्य : ₹ 100 मात्र।

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kumar krishnan (journalist)

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