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रचना और रचनाकार (२९) : स्मृति काव्य गुरु-शिष्य से शिष्य-गुरु तक / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

 

 

डा. सुरेन्द्र वर्मा पी. रविकुमार के एक मलयालम खंड-काव्य का हिंदी अनुवाद ‘रामनाथ स्मृति’ नाम से मुझे जैसे ही मिला, उसे पूरा पढ़ डाला है. उसने मुझे बराबर बांधे रखा.

पी. रविकुमार की मातृभाषा तमिल है किन्तु वे लिखते मुख्यत: मलयालम में हैं. मलयालम में उनका नचिकेता पर केन्द्रित एक अन्य खण्ड-काव्य प्रकाशित हो चुका है. साहित्य-जगत में इसे काफी सराहा गया है. एषुतु अकादमी से यह पुरस्कृत भी किया जा चुका है. अब उनका यह दूसरा खंड-काव्य आया है जिसका हिन्दी अनुवाद प्रो. डी. तन्कप्पन तथा के जी. बालकृष्ण पिल्लै ने किया है. पी. रविकुमार ने दोनों ही खंड-काव्यों में किसी न किसी व्यक्ति को अपना चरितनायक चुना है. पहले काव्य में प्राचीन काल के नचिकेता की गाथा थी तो इस बार उन्होंने एक समकालीन कर्नाटक संगीत के सुप्रसिद्ध गायक एम. डी. रामनाथन के चरित्र को अपने काव्य का नायक बनाया है. संभवत: यह पहली बार है कि किसी भारतीय खंड-काव्य में एक संगीतज्ञ को यह सम्मान दिया गया हो. अनेक संगीतज्ञों पर जीवनीपरक पुस्तकें तो लिखी गईं हैं, अनेक लेख भी प्रकाशित हुए हैं किन्तु उनमें से किसी को खंड-काव्य के नायक बनाने की अवसर नहीं दिया गया. पी.रविकुमार एक कवि तो हैं ही, एक जागरूक संगीत श्रोता और समीक्षक भी हैं. ऐसे में उनके लिए यह सहज, स्वाभाविक था की वे एक संगीत साधक को अपना नायक बनाते. पी. रविकुमार का संगीत के प्रति ‘अदम्य आकर्षण’ रहा है. कवितायेँ पढ़ने और संगीत सुनने की प्रक्रियाएं उनके लिए स्वाभाविक रूप से ‘सांस लेने के समान’ हैं. बड़े बड़े गायकों, जैसे त्यागराजभागवतर और एम् एस. सुब्बलक्ष्मी आदि के गायन वे रेडिओ पर बचपन से ही रूचि पूर्वक सुनते आए हैं. आज भी उनके मन में वे छाए हुए हैं. अपनी इसी अभिरुचि के माध्यम से वे रामनाथन तक पहुंचे.

पी. रविकुमार बताते हैं कि उनहोंने सातवें दशक के आरम्भ में एम. डी. रामनाथन को पहली बार साक्षात सुना था और तभी से वे उनके अपने “गायक” बन गए. उनका गायन वे अपने ‘ह्रदय में संजोए’ हुए हैं. रवि- कुमार कहते हैं, ‘हमारे अन्दर जो आध्यात्मिकता है उसे संगीत जगा देता है. हमें ध्यान और आन्तरिक विकास की ओर ले जाता है. अंततोगत्वा वह हमारा शोधन करता है.’ रामनाथन के संगीत में भी कुछ यही खूबी थी. रविकुमार बताते हैं कि रामनाथन के ‘आलापन’ (आलाप/संगीत) में भी ‘सर्जनात्मकता की अनंत यात्रा है.’ इस सृजन-यात्रा में यदि रविकुमार अपने काव्य के माध्यम से सम्मिलित होते हैं तो आश्चर्य नहीं है.

मैंने अपनी इस पुस्तक समीक्षा का शीर्षक यदि ‘गुरु-शिष्य से शिष्य-गुरु तक’ दिया है तो इसका एक कारण है. पी. रविकुमार का यह खंड-काव्य रामनाथन के गुरु वरादाचारी के अंतिम समय से आरम्भ होता है. वरादाचारी अपनी मृत्यु शैया पर अपने शिष्य को याद कर रहे होते हैं. बस उनकी अंतिम इच्छा यही है कि वे किसी तरह अपने शिष्य रामनाथन के दर्शन कर सकें. संयोग देखिए या कवि की कल्पना कहिए, पुस्तक के अंत में रामनाथन मृत्यु शैया पर पड़े हैं और वे अपने अपने गुरु का स्मरण कर रहे हैं! उनकी स्मृति ने सबकुछ भुला दिया है और ‘सिर्फ वरदाचारी का चेहरा /

स्पष्ट हो रहा है /

वरादाचारी का /

खरहरप्रिय राग गूँजता है’!

गुरु वरादाचारी विदा हो रहे हैं, उन्हें आभास है कि शाम से पहले वे नहीं रहेंगे. अब उन्हें ‘केवल अपने रंगनाथन को देखना है’. उन्हें याद आता है, रंगनाथन को ‘टाइगर’ नाम उनके हिंडोल राग सुनाने पर अब्दुल करीम खान ने दिया था. अब्दुलकरीम के अलावा और भी कई संगीतज्ञ और उनका संगीत उनकी स्मृति में ताज़ा हो जाता है. तभी एकायक उन्हें लगता है रामनाथन आ गया, वे व्यग्र होकर कहते हैं, -

‘रामनाथ आ गया क्या? /

मेरे बेटे /

तू आ गया? /

यह क्या? /

तू रो रहा है? /

तू रोना मत मेरे जाने का समय आगया है बेटे /

तू मेरे लिए त्यागराज का कीर्तन /

‘एन्तारानि’ ज़रा गा ..’ ‘राग /

शब्द /

अर्थ /

और अलंकार /

छिपते जा रहे हैं /

अब /

केवल /

रामनाथ का /

गूँजता नाद मात्र ! समस्त सृष्टियों के /

प्रकट होने के पहले का /

आदिम नाद /

उस नाद में /

वरादाचारी पूर्णत: समा गए.’

वरादाचारी और रामनाथन का गुरु-शिष्य सम्बन्ध इतना घनिष्ट है कि हम एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं कर सकते. जब-जब वरादाचारी गाते हैं रामनाथन उनके गान में विलीन हो जाते हैं. दोनों ही देश काल की सुधि खो देते हैं. देवेश भागवतर रामनाथन के पिता हैं. वे प्राय: रात के समय लालटेन लिए अपने बेटे को ढूँढ़ने निकलते हैं और

‘बरगद के पेड़ तले वरादाचारी

वरादाचारी के चरणों तले रामनाथन’

को गान में विलीन पाते हैं. वरदाचारी के गायन को रामनाथन आत्मसात कर लेते हैं. शिष्य के चहरे को टकटकी बांधे देखते हैं गुरु वरादाचारी. कहते हैं, “चोर” –

सब कुछ चुरा रहा है /

मेरा गान चुरा रहा है /

मेरा दिल चुरा रहा है /

मुझे ही चुरा रहा है ....

एक बार असावधानीवश रामनाथ के पाँव वरादाचारी के शरीर से छू गए. शिष्य को लगा उससे बड़ा पाप हो गया. रामनाथन रोने लगे. क्षमा याचना करने लगे. रामनाथन के दुर्बल शरीर को वरदाचारी ने अपने मोटे शरीर से लगा लिया. उसके आंसू पोंछते हुए कहा, ‘मुझे /

कुछ नहीं हुआ है /

तू मेरा /

ज्ञान-पुत्र है /

है न ?’ रामनाथन के आंसुओं में वरादाचारी भीग गए! और इस तरह वे न जाने कितनी बार भीग-भीग गए.

गुरु-शिष्य की यह एक अद्भुत गाथा है जिसे पी रविकुमार ने अपनी संवेदनशील लेखनी से अमर कर दिया है. रामनाथन रातों रात महान संगीतज्ञ नहीं हो गए थे. स्वर साधने के लिए वे दिन-रात निरंतर रियाज़ करते रहे. आरम्भ में लोग उनकी मजाक उड़ाते – ‘ये कौन आधी रात में गरज रहा है, पागल!’ ‘यह क्या है रे, तेरा असुर साधकं मेरी नींद हराम कर देता है’. गली के छोकरों ने रामनाथन को चारों ओर घेर लिया. पर रामनाथन हंस पडा,बस ! वह तो ‘निद्राहीन /

रात्रियों से होकर /

अशांत /

दिवसों से होकर /

यात्रा करता ही रहा !’ उसका रियाज़. संगीत-अभ्यास रुका नहीं. संगीत सभाओं में जाता तो रामनाथन से गाया नहीं जाता. सिसकी लेते हुए कहता, ‘अब आगे मैं गाऊँगा नही’. कीड़े की तरह व तड़पता, ‘रास्ता भटककर /

विचलित होकर /

मन की अथाह /

गहराइयों में /

डूबता’ चला जाता.

वह अपार करुणा का संगीत था – ‘गली में /

हरी पत्तियाँ चबाता फिरता /

(एक) काला बकरा /

सिर उठाकर कान देकर /

---पाप मुक्तिदायक वह नाद /

सुन रहा है.’ नाद का स्रोत ढूँढ़कर, वहीं पर निश्छल होकर वह लेट गया.

‘कसाई के चाकू /

गले में अटकती /

चीखें /

आखिरी संभ्रम में /

बिखरते मल-मूत्र /

कटकर गिरते /

प्राणों की तड़पन /

बकरे की स्मृतियाँ /

...गीत समाप्त हो रहा है ... पत्थर के सोपानों से उतर कर /

(बकरा) अचानक कहीं अप्रत्यक्ष हो गया.’ रामनाथन के संगीत के सम्मोहन का यह केवल एक उदाहरण है जिसे कवि ने अपनी इस रामनाथ स्मृति में साकार किया है.

संगीत समीक्षक आरजी के हवाले से पी रविकुमार कहते हैं, रामनाथन जब गाता है तो वह दर्दनाक मूकाभिनय का दृश्य बन जाता है. उस समय उसके चहरे की नसें तन जाती हैं. चेहरा विकृत हो जाता है. मानो उसकी आत्मा सिसकती और रुदन करती है पर –

‘महाशून्यता से /

स्वरों को पकड़ लेने के लिए ... रामनाथन गाता ही रहा /

काल के अतीत की ओर /

और अतीत की ओर /

चलता ही रहा /

नाद रहस्य की ओर /

आदि मौन की ओर...’

‘मात्र संगीत है - /

एम डी रामनाथन का संगीत /

उस संगीत में /

विलीन हो जाता हूँ /

मैं और वह /

वह और यह /

सब प्रकार के भेदभाव /

मिट जाते हैं /

मैं सब हो जाता हूँ /

सब मैं हो जाता है! ‘

चिदंबरम के दर्शन के लिए रामनाथन आतुर हैं. –

‘मैं जाति का चांडाल/ बात कर सकता हूँ आपसे ?/ आप का परमानंद-तांडव देखने /

नाथ मैं आजाऊँ /

आपके पास /

...नाथ कृपा करो मुझ पर /

मेरा अपना कोई नहीं /

परमगति पाने को /

कृपा बरसो मुझ पर नाथ !’

रामनाथन चिदम्बर की गलियों में भटक रहा है. हे, चिदम्बरनाथ! वर दे मुझे /

दुःख और पाप मिटाने को /

गाने और नाचने /

नाथ मैं आजाऊँ /

आपके पास ?’ पी रविकुमार कहे हैं, - रामनाथन नंद्नार बनकर /

भटक रहा था /

ह्रदय की गहराइयों से /

कराह रहा था.’

‘अनेक जन्मान्तरों से होकर /

एक चोर की भाँति /

एक भिखारी की भांति /

रामनाथ भटकता फिरता है /

नमक से लेकर कपूर तक की /

हर आवश्यक चीज़ मांगकर पाता है /

...दिन रात बीतते जाते हैं /

अतिनिन्दनीय इस भटकाव का /

कब होगा अंत? ...-रामनाथ /

त्यागराज बनकर /

भटक रहा था /

और दिल की गहराइयों से /

चीख रहा था’.

रामनाथन का अंतिम समय आ गया है. न जाने कितने दिन हो गए हैं रोग-शैया पर गंदे –मैले जीर्ण वस्त्र और दवाइयों की गंध के बीच पड़े हुए. पत्नी साथ में है, सेवा कर रही है. छोटे भाई सरीखा सेतुरामन भी है. रामकृष्णय्यर मिलने आए हैं. सब जड़ीभूत खड़े हैं. रामनाथन विदा हो रहा है.

‘दूर पहाड़ पर प्रकाश फ़ैल रहा है...सब निरर्थक होता जारहा है ... वेद-पुराण जप-तप -सब निरर्थक आकाश, वायु और अग्नि में जल, पृथ्वी एवं चिड़ियों में पशु पहाड़ एवं पेड़ों में सगुन एवं निर्गुण में परम तत्व प्रकाशित होता है.’

रामनाथन की स्मृति में अपने गुरु वरादाचारी की यादें उभरती हैं. ‘चोर, मेरा सब लूटने वाला चोर’. रोती हुई पत्नी के सर पर रामनाथन अपने दुर्बल कांपते हाथों को रखता है. आँखें बंद हो जाती हैं.

‘अब सिर्फ वरदाचारी का चेहरा /

स्पष्ट हो रहा है /

खरहरप्रिय राग गूँजता है /

.... राग और शब्द /

अर्थ और अलंकार छिप जाते हैं /

सब थम जाते हैं /

सिर्फ एक कालातीत नाद /

असीम होकर /

अक्षय होकर /

अनंत होकर /

भरता जा रहा है.’

वरादाचारी से रामनाथन और रामनाथन से वरदाचारी का चक्र पूरा होता है. ‘रामनाथ स्मृति’ का पटाक्षेप होता है. पी रविकुमार अपनी लेखनी को विराम देते हैं.

रविकुमार ने एक संगीत-साधक की साधना को अपनी काव्य साधना के माध्यम से मूर्तमान किया है. और अपने इस प्रयास में वे बेशक असफल नहीं रहे. इस पूरे आख्यान में केरल की महक तो है ही, दार्शनिक सोच भी है. वस्तुत: यह कोई रामनाथन जी जीविनी नहीं है. उनके जन्म, बचपन और यौवन का लेखाजोखा नहीं है. यह एक संगीतज्ञ की आतंरिक यात्रा का संवेदनात्मक चित्रण है जिसे जितना ही धैर्यपूर्वक पढ़ा जाए उतना ही वह सहृदय पाठक के मन में उतरता चला जाता है.

पी रविकुमार की काव्य-कृति को हिन्दी में अनुवादित कर प्रो. डी. तनकप्पन नायर और श्री के. जी. बालकृष्ण पिल्लै ने हिन्दी भाषियों के हित में एक बड़ा काम किया है. हमें उनका शुक्रगुज़ार होना चाहिए. आजकल कविता में गद्य और पद्य की सीमा रेखा टूट सी गई है. कविता बहुत कुछ गद्य कविता हो गयी है. लेकिन यदि वह हमारी संवेदनाओं को छूती और जगाती है तो वह कविता ही है. इस कसौटी पर ‘रामनाथ स्मृति’ को एक खंड काव्य कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है.

पी रविकुमार को इस रचना के लिए हार्दिक बधाई.

--सुरेन्द्र वर्मा १०, एच आई जी , १, सर्कुलर रोड , इलाहाबाद – २११००१ (मो) ०९६२१२२२७७८

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समीक्षित पुस्तक - रामनाथ स्मृति (मलयालम खंड-काव्य) मूल रचनाकार, पी. रविकुमार अनुवादक, प्रो. डी. तन्कप्पन तथा के. जी. बालकृष्ण पिल्लै जवाहर पुस्तकालय, मथुरा -२८१००१ , २०१४ मूल्य रु. २७५|- पृष्ठ १२८

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