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रामनवमी पर विशेष आलेख : राम स्वयं सेतु हैं / गजानंद प्रसाद देवांगन

 

सम्बन्धों में मधुरता का स्थान छीन रहा है - कटुता ! छल प्रपंच सर्वत्र व्याप्त है ! अनीति का दबदबा बढ‌ता प्रतीत हो रहा है ! इसलिए तमाम रिश्तों के पुल टूटते जा रहे हैं दिन-ब-दिन ! नीतियां भी , कमजोर होकर , टूट-टूट जा रही है बार –बार ! लगता है रीति रिवाजों में अब कोई दम नहीं रहा ! छलावे की प्रीति के कारण श्रद्धा - विश्वास नहीं रहा आपस में ! इसका कारण है –सत्य ,प्रेम , ईमान ,धर्म का अभाव !

महसूस किया जा रहा है कि , दिग्भ्रांत दुनियां को आवश्यकता है चरित्र नायक की , जो सिद्धांतत: सापेक्ष होते हुए भी व्यवहार में निरपेक्ष हो ! वह पूर्ण धर्म हो ! ऐसा ही पूर्ण धर्म है – राम ! वेद ने राम को रामो धर्मवान विग्रह निरूपित किया है ! धर्मस्वरूप राम –सबको जोड़ता है , मिलाता है ! राम ने अपने व्यक्तित्व के द्वारा आदि से अंत तक धर्म का सही स्वरूप उपस्थित किया है ! सेतु बनाने का काम किया है ! उन्हें सेतु कह लीजिए या सेतु रक्षक (पालक) कह लीजिए ! प्रमाणित है सभी तरह से ! राम के नाम ,रूप , धाम , लीला , आचरण में जोड़ने की दिव्य शैली विद्यमान है ! चाहे बाललीला हो या बनलीला हो ! चाहे जनकपुर की यात्रा हो , चाहे वन की यात्रा हो ! चाहे फूलों भरा मार्ग हो या कांटों भरा हो ! भगवान राम ने अपने चरित्र द्वारा सेतु का निर्माण कर , सारे समाज को मिलाया है ! भारतीय संतों व चिंतकों ने विश्वास व्यक्त किया है कि जब सारे सेतु टूट जायेंगे तो भी , राम का चरित्र सारे समाज को मिलाने के लिए सदा सर्वदा प्रस्तुत रहेगा ! ज्ञानसेतु , भावसेतु , व्यवहारसेतु की समग्रता के माध्यम से वर्ग , पक्ष , जाति – समाज सब एक दूसरे के निकट आयेंगे !

राम अपने अनुज त्रय और सखाओं के साथ क्रीड़ा में मगन थे उस दिन ! राजा द्वारा भोजन का बुलावा , अनसुनी कर दी उसने ! भक्तिस्वरूपा मां कौशल्या की पकड़ में तो आ गया राम ! किंतु , महल , अकेले चलने के लिए , वह तैयार न हुआ ! आज बेटे का उदास चेहरा देख , मां का हृदय धड़क गया ! नहिं आवत तजि बाल समाजा का कारण बतला दिया , राम ने - मैया को ! गरीब बच्चों और राजकुमारों के बीच की असमानता उन्हें पसंद न थी ! महल का , कुटियों के लिए थोड़ा भी भेदभाव चुभ जाता था राम को ! उत्तम भोजन ,कीमती वस्त्र और सुंदर निवास का सुख सबको सुलभ हो , राम यही चाहते थे ! चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के लिए यह कार्य असम्भव न था ! कौशल्या साम्राज्ञी थी उत्तरकौशल की ! सर्वगुण सम्पन्न राम सबको प्रिय लगते थे ही ! दशरथ- कौशल्या के , वे प्राणाधार थे ! ममतामयी मां भला कैसे इंकार कर सकती थी - पुत्र के प्रस्ताव को ! स्वीकृति मिल गयी राम को ! अब तो – बंधु सखा संग लेहि बोलाईं और अनुज सखा संग भोजन करही यह नित्य का नियम था राम का ! छोटों को बड़ों से और अमीरों को गरीबों से जोड़ने का यह पहला अभियान था , बाल राम का !

ब्रम्हऋषि वशिष्ठ और राजऋषि विश्वामित्र दोनों ज्ञानी और तपस्वी थे ! लोकमंगल अर्थात विश्वहित करने कराने की क्षमता थी दोनों में ! समस्त ऋषिकुल के दो किनारे थे ये महात्मन ! तुलसी के शब्दों में लोक -वेद मत मंजुल कूला भी थे त्रेतायुगमे ! किंतु ये परस्पर विरोधी थे ! समाज के व्यापक हित में इनका आपसी वैमनस्य , बाधक था ! वशिष्ठ से शास्त्र विद्या और विश्वामित्र से शस्त्र विद्या प्राप्त करते हुए , किशोर राम ने , दोनों को गुरू बना लिया ! राम का व्यक्तित्व ऐसा कि दोनों महात्मा जुड़ गए - निरखि राम दोउ गुरू अनुरागे ! राम के सेतुत्व गुण का ही चमत्कार है कि दोनों ऋषिकुल स्नेह बंधन में आबद्ध हो गए ! यहां तक कि वशिष्ठ जी ने विश्वामित्र जी की अनेकों प्रशंसा की – मुनिमन अगम गाधि सुत करनी! मुदित बशिष्ठ बिपुल विधि बरनी ! ऐसे में राम के व्यक्तित्व की प्रशंसा करने में कहां चूकते गुरूजन ! वशिष्ठ जी कहते हैं - धर्म सेतु करूणायतन कस न कहहु अस राम ! और विश्वामित्र ने – धरम हेतु पालक तुम ताता कहा और गदगद हो गए ! अवतार लेने से लेकर साकेत गमन तक राम ने दो कुलों , वंशों ,किनारों ,समूहों को जोड़ने का उपक्रम किया है ! दो को , इस तरह मिलाने वाला सेतु कहलाता है ! श्रीराम जी सदा सेतु बनते रहे - यह इनकी दूसरी सफलता है !

अहिल्या निरपराध थीं ! किंतु किसी ने उन्हे न्याय नही दिया ! बल्कि श्राप देते हुए पति गौतम ने , परित्याग कर दिया ! कुंठाग्रस्त अहिल्या एकाकी पड़ी रही , पाषाणवत , निर्जन वन में वर्षों तक ! यज्ञरक्षक व पूरक राम धर्मात्मा व न्यायप्रिय हैं ! अहिल्या को निर्दोष साबित करते हुए श्रापमुक्त कर दिया पतित पावन ने – जो अति मन भावा सो बरू पावा ,गै पतिलोक अनंद भरी ! श्रीराम के सेतु बन जाने पर ही वर्षों बाद पति –पत्नि का मिलन सम्भव हुआ !

देश विदेश के बहुतेरे राजा , जनक जी के प्रण को ही सुनकर सीय स्वयंम्बर में पधारे थे ! कुछ ही घनिष्ठ और विशिष्ठ लोगों को निमंत्रण भेजा था जनकजी ने ! किंतु किन्ही अज्ञात कारणों से निमिकुल और रघुकुल के बीच सम्बंन्ध नही था ! जुड़े हुए न होने के कारण धनुष यज्ञ का न्यौता, मिथिलेश ने अवधेश को नहीं भेजा ! निष्काम कर्मयोगी जनक जी की निर्गुण निराकार की निष्ठा ने उन्हे देहाध्यास से ऊपर उठा कर विदेह बना दिया ! किंतु सगुण साकार में ही दृड़ निष्ठा रखने के कारण सकाम कर्मयोगी दशरथ के लिए यह सम्भव न हुआ ! द्वैतवादी और अद्वैतवादी परस्पर एक दूसरे के विरोधी न रहे और सत्य को उपलब्ध हों , यही धर्म का हेतु है ! द्वैत – अद्वैत में श्रीराम ने जैसा सुंदर सामंजस्य स्थापित किया जनकपुर में , वैसा अन्यत्र दुर्लभ है ! विराग को ज्ञान की और राग को भक्ति की प्राप्ति हुई ! किंन्तु जड़ता के निवारण होने पर यह सम्भव हुआ ‌ - भजेउ राम सम्भु धनु भारी ! फिर तो – सिय जय माल ,राम उर मेली ! अब तो – मिले जनक – दशरथ, अति प्रीति ! लोगों ने कहा – सम समधी देखे हम आजू ! निमिकुल और रघुकुल का विरोध मिटाकर , उत्तम नाता जोड़कर ,उन्हे समधी बना दिया राम ने ! स्वयं पुल (सेतु) बनकर राम ने दोनों कुल (वंशों) को जोड़ दिया !

ब्राम्हण और क्षत्रिय के बीच का संघर्ष अकल्याणकारी और भयदायक भी होता है ! परशुराम के अंत:करण में क्षत्रिय जाति के प्रति विद्वेष था ! राष्ट्रहित चिंतक युवराज श्रीराम जी ने ब्राम्हण और क्षत्रिय को एक दूसरे के विरोधी नहीं , पूरक निरूपित किया ! अपने वकृत्व और कृतित्व के प्रभाव से राम ने समाज में व्याप्त भय और आशंकाओं का उपशमन कर दिया ! क्षत्रियों के प्रति परशुराम का आक्रोश और ब्राम्हणों के प्रति क्षत्रियों की अश्रद्धा को राम ने समाप्त कर दिया ! दोनों वर्ण अब एक दूसरे के प्रति आश्वस्त और विश्वस्त हो रहे ! सौहाद्र और शील दर्शाकर , वर्ण धर्म के भेद को मिटाने वाले श्रीराम के व्यक्तित्व ने यहां भी सेतु का काम किया !

वर्णभेद का अभिशाप भोग रहा था – तत्कालीन समाज !‍ छोटी जाति वालों के साथ बड़ी जाति वालों का दुराभाव - जासु छांह छुइ लेइअ सींचा के कारण प्रेम सेवा सहयोग का अभाव था लोगों के आचरण में ! किंतु नर को ईश्वरता प्राप्त कराने आया की घोषणा करने वाले राम , कर्म करके लोकशिक्षा देना चाहते थे ! इधर गंगापार कर वनपथ की ओर बढ़ने के पूर्व राम ने निषाद को हृदय से लगा लिया – राम लाइ उर लीन्हा ! कुल समेत जग पावन कीन्हा ! उधर अयोध्या की प्रजा परिजन पुरजन को साथ ले ,राम से मिलने जा रहे बशिष्ठ जी ने सुना कि केंवट निषाद को प्यारे राम ने हृदय से लगाकर सखा बना लिया ! यह ज्ञात होते ही बशिष्ठ जी ने , दूर से दण्डवत कर रहे निषाद को उठाकर , छाती से लगा लिया – तेहि लखि ,लखनहु ते अधिक ,मिले मुदित मुनिराज ! उपेक्षा से पीड़ित, हीनभावना से ग्रस्त निम्नकुल के प्रति छुआछूत जैसे विचार जन्य अज्ञानता और मिथ्या अभिमान को प्रदर्शित करता रहता था उच्च कुल ! इनके कल्पित भेदभावों को मिटाकर , लोकनायक राम ने उन्हे मिला दिया ! ब्राम्हण को शूद्र से , कुलीन को अकुलीन से , बुद्धिजीवी को श्रमजीवी से जोड़ने के लिए यहां भी श्रीराम जी पुल बन गए !

प्राचीन काल में मात्र बारह जातियां थी ! जिनमें से एक जाति वानरों की थी ! अशिक्षित होने के कारण ये अज्ञानी और असभ्य थे ! जो भारत के सभी वन्य क्षेत्रों में रहते थे झुंडों में ! उत्तर और दक्षिण के शिक्षित – सभ्य किंतु महत्वाकांक्षी लोगों की उपेक्षा का दुष्परिणाम था कि इन्हें अपनी समुचित विकास का अवसर नहीं मिला – सकल सृष्टि यह मोर उपाया और सब मम प्रिय सब मम उपजाये ! इस प्रकार बार-बार स्वीकारोक्ति है जिनकी वे समदर्शी भला कैसे सहन कर सकते थे यह दुराभाव ! बनवासियों में आपसी विरोध , द्वेष-कपट कम न था ! यह सब देख , राम अत्यंत क्षुब्ध हुए ! अपने सम्पर्क का लाभ देते हुए , राम ने इन वनचरों को सभ्य बना , उन्हें श्रेष्ठ लोगों से मिला दिया !

वन से लौट आये राम ,पुष्पक विमान से उतरकर , गुरू बशिष्ठ के चरण कमलों में साष्टांग प्रणाम किया ! गुरू ने राम को हृदय से लगा लिया ! बाद में अपने साथ आये सखाओं से परिचय कराते हुए – पुनि रघुपति सब सखा बोलाए ! मुनि पद लागहु सकल सिखाए ! पशुकुलाधम का मानवकुल श्रेष्ठ से मिलन , सर्वोपरि मिलन है ! राम के व्यक्तित्व की पराकाष्ठा है कि स्वयं सेतु बनकर एक दूसरे को निकट ला देते हैं !

रामजी चाहते हैं – विश्व में धर्मनीति पूर्वक राज्य व्यवस्था कायम हो ! इसके लिए मानव अंत:करण के विशिष्ट गुणों को उभारने की आवश्यकता है ! लंका की पैशाची प्रशासन से सभी असंतुष्ट और त्रस्त भी थे ! उन्हे नैतिक जीवन का सुख चाहिए था ! अलगाव को समाप्त करने के लिए विचार से विचार , हृदय से हृदय को जोड़ना पड़ेगा ! सेतु निर्माण का उपक्रम इसीलिए किया गया ! रावण को मारकर सीता को प्राप्त करने के लिए ,अपने व सेना के लंका प्रवेश के लिए सेतु निर्माण की आवश्यकता गौण थी- जेहि जग किये ,तिहूं पगहूं ते थोरा , उनके लिए यह लघु जलधि , तरति कति बारा इत्यादि ! धर्मग्रन्थों व इतिहासों में प्रभु के सामर्थ्य और ऐश्वर्य का उल्लेख मिलता है !

रावण द्वारा दण्डित और देश से निष्कासित विभीषण की सलाह , समाज द्वारा उपेक्षित एवम तिरस्कृत वानर सुग्रीवादि और वनवासियों की सेवा श्रम सहायता लेकर श्रीरामजी ने जिस सेतु का निर्माण कराया , उसे , समता का सेतु – कहें तो अतिशयोक्ति न होगी !

किन्हीं विशेष वैज्ञानिक यांत्रिकीय तकनीक द्वारा शिल्पी नल –नील ने सेतु का निर्माण कार्य सम्पन्न किया ! राम नाम अंकित पत्थरों को जोड़कर संसार में पुल निर्माण करने की युक्ति हनुमान जी जानते थे - जो आज भी ज्ञानी विज्ञानी यंत्रियों के लिए खोज का विषय है - बांधा सेतु नील नल नागर ! राम कृपा जस भयउ उजागर ! किंतु – सेतु बंध भई भीर अति , कपि नभ पंथ उड़ाहि ! अपर जल चरन्ह ऊपर , चढि‌ चढि‌ पारहि जाहि ! राम के रूप को देखकर ,जलचर , सागर की सतह पर इस तरह छा गए कि बड़ा सेतु बन गया ! मतलब यहां रामजी का रूप सौंदर्य सेतु बन गया ! भक्तों की दृष्टि में – नाथ नाम तव सेतु , नर चढि भव सागर तरहि ! अर्से से अनमिले मित्र तथा अपरिचित व्यक्ति भी राम-राम भैया बोलकर नया पहिचान बना लेते अथवा परिचय का नवीनीकरण कर लेते हैं ! यह राम नाम के व्यवहार सेतु का अनुपम उदाहरण है !

जो व्यक्ति अन्यत्र कहीं नहीं मिल सकते , वे रामकथा रूपी सेतु के माध्यम से ,परस्पर एक दूसरे के सन्निकट आ जाते हैं ! राम की कथा , वक्ता और श्रोता को जोड़ता है ! वक्ता को विश्राम और श्रोता को शिष्ट मनोरंजन के साथ शिक्षा भी देता है - बुध विश्राम, सकल जन रंजनि !

प्राचीनकाल में सभी , दैव भाषा भाषी थे ! कालांतर में संस्कृत भाषा का ज्ञान गिने चुने लोगों के पास रह गया ! बीती सदियों में , क्षेत्रीय बोली बोलने वालों को आज की राष्ट्रभाषा हिंदी का पर्याप्त ज्ञान नहीं था ! किंतु आज दिन राम चरित श्रवण गायन मनन करने वालों का , हिंदी और संस्कृत भाषा का ज्ञान बढा है ! बोली और भाषाओं में राम और उसकी कथा के कारण सम्पर्क स्थापित हो गया है ! इस प्रमाणित और घटित तथ्य को कोई अस्वीकार नही कर सकता ! स्पष्ट है राम , भाषा - सेतु भी हैं !

अभावग्रस्त दुखी दुनियां , शाश्वत सुख शांति पाने के लिए , सदा प्रयत्नशील रही है ! उजागर है कि श्री हनुमानजी अष्टसिद्धि नव निधी के दाता हैं ! इस दाता के समक्ष जो भी मनोरथ करता है – तासु अमित जीवन फल पावे वाली बात अनुभव सिद्ध है ! हनुमानजी को भक्ति एवं शक्ति और उपासकों को अनुरक्ति एवं युक्ति देकर , दोनों को जोड़ने का काम जन सेतु बनने वाले मेरे रामजी का ही तो है ! श्रीरामजी के कर्मसेतु ,धर्मसेतु , व्यहारसेतु , परमार्थसेतु व सभी प्रकार के सेतु बनने के अनेक उदाहरण हैं ! हर अवस्था दशा ,परिस्थिति और प्रत्येक देश काल में राम का सेतुत्व चरितार्थ हुआ है ! अदभुत बात है कि जनकपुर में सीताजी को पाकर , दो कुलों (वंशों) को जोड़ते हैं , तो वनवास काल में सीता को खोकर , अनेक कुलों को जोड़ते है ! राम घर-बन कहीं भी रहे , बस जोड़ते रहे , सेतु बनते रहे ! आत्मा को परमात्मा की प्राप्ति श्रीराम कृपा – सेतु द्वारा ही होता है ! भौतिक विज्ञान से अध्यात्म विज्ञान का सामंजस्य श्रीरामजी के व्यक्तित्व के सेतु द्वारा सहज सम्भव हुआ है ! आज जो राम को यथार्थ रूप में जानता , भजता और पाता है – वही जुड़ता और जोड़ता है सबसे ! ,

अलगाव, बिलगाव और बिखराव आदि टूटन और घुटन से बचने के लिए इस सेतु तत्व को आचरण में लाना अर्थात अपनाना होगा ! जातिवाद , क्षेत्रवाद , रूढिवाद , भाषावाद और आतंकवाद जैसे अनेकों समाजघातीवाद , जो सिर उठा रहें हैं , उनके आक्रोश को भी राम का सेतु समाप्त कर सकता है ! अस्तित्व की रक्षा का प्रयत्न सफल हो सकता है ! गर्व की बात है कि हमारा भारत न लड़ता है , न लड़ाता है ! क्या भारत में राम का सेतुत्व आज भी जिंदा है ?

विश्वास है धर्मप्राण भारत , लोकनायक राम के समग्र जीवन वृत्य को सेतुत्व के रूप में उपयोग करेगा और विश्व को हमेशा की भांति , सुख शांति पाने में , उनका मार्ग प्रशस्त करेगा !

 

लेखक –  गजानंद प्रसाद देवांगन

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