रविवार, 3 अप्रैल 2016

रचना और रचनाकार (१७) / समकालीन ग़ज़ल और हिंदुस्तानी ज़बान / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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एक नई पत्रिका, अक्षर शिल्पी, के जनवरी 2003 के अंक में डॉ किशन तिवारी ने हिंदी ग़ज़ल के कुछ पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि आज के इस दौर में जब भाषा को साम्प्रदायिक रंग दिया जा रहा हो, ऐसे में ग़ज़ल एक ऐसा पुल है जो भाषाई विवाद की गहरी होती खाई पर हिंदी और उर्दू को जोड़ने की महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है.

यह एक बहुत ईमानदार और ग़ौरतलब बात है. आज की ग़ज़ल को हिंदी या उर्दू के खाने में बांटना लगभग असम्भव हो गया है. इन दिनों फारसी लिपि में जो ग़ज़लें अधिकतर लिखी जा रही हैं यदि उन्हें देवनागरी में लिख दिया जाए तो वे हिंदी-ग़ज़लें आसानी से कही जा सकती है और इसी तरह देवनागरी में लिखी ग़ज़लें यदि फारसी लिपि में बदल दी जाएं तो उन्हें उर्दू-ग़ज़ल कहने में शायद ही कोई हिचकिचाहट हो. ऐसा इसलिए मुमकिन हो सका है कि आज ग़ज़लकारों ने जो भाषा अपनाई है –चाहे वे इसे माने या न मानें- वह न तो ठेठ हिंदी है और न ही उर्दू. वह तो सिर्फ हिंदुस्तानी ज़बान है, जिसने हमेशा से ही हिंदी और उर्दू को जोड़ने का काम किया है और जो एक तरफ संस्कृत-निष्ट हिंदी और दूसरी ओर फारसी-अरबी से बोझिल उर्दू की ख़िलाफत करती रही है.

ग़ज़ल के भाषाई मिज़ाज़ में यह बदलाव अचानक नहीं आया है. यह धीरे-धीरे और बरसों की जानी-अनजानी कोशिश का नतीजा है. सच तो यह है कि ग़ालिब, मीर और दाग़ के यहां भी हमें तमाम ऐसे शेर मिल जाएंगे जो आम-फ़हम की भाषा, हिंदुस्तानी, में लिखे गए हैं और जिनमें जानबूझकर अरबी-फ़ारसी के लफ़्ज़ों से परहेज़ है. ये शेर हिंदुस्तानी से इतनी नज़दीकी से जुड़े हैं कि वे क़रीब-क़रीब हिंदुस्तानी ज़बान के मुहावरे बन गए हैं. ग़ालिब के ही कुछ शेर देखें –

न सुनो गर बुरा कहे कोई

न कहो गर बुरा करे कोई

 

इश्क पर ज़ोर नहीं यह वह आतिश ग़ालिब

कि लगाए न लगे और बुझाए न बुझे

 

इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया

वर्ना हम भी आदमी थे काम के

 

हम को मालूम है जिन्नत की हक़ीक़त लेकिन

दिल को खुश रखने को ग़ालिब ख्याल अच्छा है

 

उसके देखे से जो आजाती है मुंह पर रौनक़

वे समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

 

है कोई ऐसी ही बात कि जो चुप हूं

वर्ना क्या बात कर नहीं आती

 

इसी तरह दाग़ के भी कुछ शेर है जो हमारी बोली में सहज ही समा गए हैं –

हज़रते दाग़ जहां बैठ गए बैठ गए

और होंगे तेरी महफिल से उठने वाले

 

दाग़ दुश्मन से भी झुककर मिलिए

कुछ अजब चीज़ मिलनसारी है

 

मीर दाग़ और गालिब बेशक उर्दू के शायर थे और उर्दू को उन्होंने उस ज़बान के रूप में अपनाया था जो आम फहम की भाषा थी. –

उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं दाग़

हिंदोस्तां में धूम हमारी ज़बां की है

 

उर्दू वस्तुतः उनके ज़माने की हिंदुस्तानी ज़बान थी और वे इसी भाषा में ग़ज़ल लिखने की तरफ अपनी पूरी तवज्जह दे रहे थे. पर क्योंकि उनके अध्ययन की पृष्टभूमि अरबी-फारसी थी इसलिए उनकी शायरी में आम-फहम की भाषा के साथ-साथ ज़्यादहतर अरबी-फारसी से लदी-फंदी क्लिष्ट उर्दू भी देखने को मिलती है.

ग़ज़ल उर्दू सहित्य में एक अत्यंत लोकप्रिय विधा रही है. इसके दो कारण हैं. एक तो यह कि इसने जिस भाषा को अपनाया वह मुस्लिम शासन में हिंदुस्तान के आम-आदमी की भाषा हो गई थी और साथ ही अपनी अरबी-फारसी नज़दीकी के कारण शासकों की भाषा भी थी. दूसरे इसमें दो पंक्तियों में गम्भीर से गम्भीर और बड़ी से बड़ी बात को चुटीले ढंग से प्रस्तुत करके हृदय में उतार देने की एक ग़ज़ब की क्षमता है जो अन्य किसी विधा में नहीं दिखाई देती.

इसके अतिरिक्त एक बात और थी. ग़ालिब, मीर और दाग़ के समय अमीर-उमरा और बादशाहों ने साहित्य को प्रश्रय दिया था और उर्दू का अधिकतर साहित्य उन्हें खुश करने के लिए लिखा गया. अतः उस समय की ग़ज़ल ने अपने को शराब और शबाब तक सीमित कर लिया और यह तो मानना ही पड़ेगा कि अपने को लाख लोग पाक-साफ बनने की कोशिश करें, शराब और शबाब में दिलचस्पी तो हरेक की रहती ही है. ग़ज़ल इसीलिए सारी इलाक़ाई सीमाएं तोड़ कर भारत के कोने-कोने में लोकप्रिय हो गई. लेकिन उर्दू के अलावा किसी भी भारतीय भाषा के काव्य-जगत में उसे एक विधा के रूप में प्रवेश नहीं मिल पाया. आज़ादी के बाद के दस साल तक हिंदी में भी उसके लिए कोई स्थान नहीं था. समझा यह जाता था कि यह विधा हिंदी काव्य की प्रकृति से किसी भी प्रकार मेल नहीं बैठा सकती. पर दुष्यंत कुमार के ग़ज़ल-संग्रह, ‘साए में धूप’ के प्रकाशन के बाद से परिदृश्य पूरी तरह बदल गया.

दुष्यंत कुमार ने परिष्कृत हिंदी का मोह छोड़कर अपनी ग़ज़लों में हिदुस्तानी ज़बान को अपनाया और ग़ज़ल की आत्मा को पहचान कर ठेठ ग़ज़ल के तेवर में ही अपनी बात कही. बेशक उनका कथ्य फर्क था. उन्होंने ग़ज़ल के परम्परागत ‘मोटीफ’ का अतिक्रमण कर उसे समकालीन समस्याओं से जोड़ा और आम आदनी के मसाइल को लेकर वे आम आदमी की भाषा में ही ग़ज़ल के क्षेत्र में उतरे. दुष्यंत कुमार के साथ, इस तरह, अपनी निजी पहचान बरक़रार रखते हुए, ग़ज़ल आम हिंदुस्तानी की समस्याओं से उसकी ही ज़बान में जुड़ गई.

ग़ज़ल का सरल हिंदी में पदार्पण शायद इतना नाटकीय नहीं था जितना कि दिखाई देता है. दुष्यंत कुमार निःसंदेह वे बिंदु हैं जहां से हम कह सकते हैं कि ग़ज़ल ने हिंदी साहित्य की ओर रुख़ किया, किंतु इसकी पृष्टभूमि में अनेक उर्दू कवियों की उस भूमिका को नकारा नहीं जा सकता जिन्होंने इसे सम्भव बनाने के लिए अपना योगदान दिया है. ये उर्दू के ही शायर थे जिन्होंने ग़ज़ल की अरबी-फारसी की शृंखला में जकड़ी भाषाई कड़ी को तोड़ा और साथ ही विषय के धरातल पर भी बदलाव लाकर उसे आज़ाद किया.

प्रकाश पंडित द्वारा सम्पादित ‘सर्वोत्तम मुशायरा’ हिंदुस्तान और पाकिस्तान की उर्दू शायरी का एक ऐसा संकलन है जिसमें लगभग 80 शायरों को प्रतिनिधित्व मिला है. यदि उनकी शायरी का विवेचन किया जाए तो यह एक तरफ आसान उर्दू, जो बहुत-कुछ हिंदुस्तानी ज़बान के नज़दीक है, और दूसरी ओर समकालीन समस्याओं को उठाती / अपनाती नज़र आएगी. इब्ने इंशा कहते हैं –

जोग वियोग की बातें झूठी सबका जी बहलाना हो

फिर भी हमसे जाते-जाते एक ग़ज़ल सुन जाना हो

ग़ज़ल का यह पहला ही शेर समकालीन उर्दू शायरी की पहचान कराता है. इसमें, ज़ाहिर है, मिलन और विरह की शृंगारिक चर्चाएं नहीं हैं, फिर भी ग़ज़ल अपने आप में खंडित नहीं हुई है. अपनी बदली हुई भाषा और उनवान के साथ वह अपने पूरे वजूद में क़ायम है. इस ‘सर्वोत्तम मुशायरा’ में आपको अनेकानेक ऐसे शेर मिल जाएंगे जो समकालीन हिंदी ग़ज़ल की पहचान कराते हैं. वस्तुतः यह वो शेरो-शायरी है जिसमें हिंदी और उर्दू के बीच खड़ी दीवार भड़भड़ा कर टूटने लगी है और जिसने ज़मीनी समस्याओं और हिंदुस्तानी ज़बान की ओर रुख़ किया है. इसके कुछ उदाहरण मुलाहिज़ा फरमाएं –

कुछ आदमी को हैं मजबूरियां भी दुनिया में

अरे वो दर्दे मुहब्बत ही सही तो क्या मर जाएं

(फिराक़)

 

वो बात सारे फसाने में जिसका ज़िक्र न था

वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है

(फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)

 

चीखेंगी बदमस्त हवाएं ऊंचे-ऊंचे पेड़ों पर

रूठ के जाने वाले पत्तो कब तक वापस आओगे

(नूर बिजनौरी)

 

रंग पेड़ों का क्या हुआ देखो

कोई पत्ता हरा नहीं देखो

ज़िंदगी को शिकस्त दी गोया

मरने वालों का हौसला देखो

क्या अजब बोलही पड़ें पत्थर

अपना किस्सा उसे सुना देखो

(मख्मूर सईद)

 

किसी की राह में दहलीज़ पर दिए न रखो

किबाड़ सूखी लकड़ियों के होते हैं

(बशीर बद्र)

 

इस प्रकार हम देखते हैं कि आधुनिक हिंदी ग़ज़ल की पृष्ठभूमि में वस्तुतः उर्दू ग़ज़ल ही है. इसने हिंदी और उर्दू के बीच की खाई को पाटने का लगातार काम किया है. आज हिंदी ग़ज़ल जिस मुक़ाम पर है वहां यह पहचान पाना कठिन है कि वह किस ज़बान में लिखी जा रही है –हिंदी या उर्दू. इसने तो भाषा में ठीक वही ज़बान अपनाई है जिसे हिंदुस्तानी ज़बान कहते हैं. यह ज़बान न हिंदी है न उर्दू, बल्कि कहना चाहिए, यह हिंदी भी है और उर्दू भी. यह वह ज़बान है जिसे हिंदुस्तान का हर आदमी समझ सकता है और जो आज के समय की सार्थक अभिव्यक्ति है. इतना ही नहीं इसने हिंदी और उर्दू के मध्य तनाव को भी शिथिल किया है.

आज के वक्त को उजागर करते हुए प्रेम किरण कहते हैं –

सैकड़ों उन्वान देकर इक फ़साना बंट गया

अब तो पुरखों का मकां भी खाना-खाना बंट गया

आज से पहले कभी अबोहवा ऐसी न थी

दिल बंटा, फिर दर बंटा फिर आशियाना बंट गया

 

प्रेम किरण जहां मायूस हैं, वहीं ओम प्रभाकर अपनी करुणा का रचनात्मक उपयोग कुछ इस प्रकार करते हैं –

जाने के बाद आहों कराहों में रहूंगा

गर खुशबू बनूंगा तो हवाओं में रहूंगा

या तो रहूंगा किसी बेवा की हंसी में

या फिर किसी माता की दुआओं में रहूंगा

 

पर रामदरश मिश्र ने समय का उजला पक्ष भी देखा है. –

भर-भरा कर शिला रह गई

जाने क्या यह हवा कह गई

बीच में घर के उसके मेरे

एक दीवाल थी ढह गई

पंख चिड़ियाके फिर खुल गए

देखिए यह गई वह गई

 

लेकिन आज के समय को समझ पाना शायद इतना आसान नहीं है क्योंकि-

हरेक आदमी चेहरे हज़ार रखता है

दिलमें नफरत और आंखोंमें प्यार रखता है

(रमेश कटारिया)

 

इसी तरह

हम क्या समझे वो क्या निकला

चेहरे में से चेहरा निकला

हस्ती हर जीवन चादर पर

कोई न कोई धब्बा निकला

(हस्ती)

अब यह निःसंदेह कहा जा सकता है कि समकालीन ग़ज़ल अपनी कारा से निकलकर नई भाषा और शैली और नए-नए मज़बूनों को अपना रही है. यह एक सुखद अहसास है, इससे हिंदुस्तानी भावना को बल प्राप्त हो रहा है. पर कुछ लोग हिंदी ग़ज़ल के नाम पर आज ग़ज़ल का हिंदीकरण करने में जुटे हुए हैं. उनकी कोशिश है कि तथाकथित हिंदी ग़ज़ल में कहीं कोई ऊर्दू का लफ्ज़ भूले से भी न आ जाए. वे उसे संस्कृतनिष्ट बनाना चाहते हैं. इस प्रवृत्ति से जितना बचा जाए, उतना ही अच्छा है. ग़ज़ल की खूबसूरती और नफासत के लिए यह ज़रूरी है कि वह अपनी परम्पराओं से जुड़ी रहे और उस भाषा से भी जो आज बोली जाती है.

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surendraverma389@gmail.com

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