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डॉ. विजय लक्ष्मी राय की कविताएँ

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दोषी कौन


तमाचा
लगता है
दलित शब्द
मन को
छिन्न भिन्न कर देता है ।
गाली लगता है
शूद्र शब्द
सर नीचे झुकाता है
हरिजन को
आरक्षण सुन
हीन भावना
भर जाती है ।
फिर क्यों
बनाए गए ये शब्द
दोषी कौन?
कानून
नियम
संविधान
अथवा
वेद और
पुराण ।

परिवर्तन


अहं
ने तुम्हें
मुझसे दूर कर दिया
मैं ' ने मेरे
कभी तुम्हारे पास
जाने न दिया
बदलते समय में
अब न
' अहं ' तुम्हारे पास
न मुझमें
गर्व से भरा
मैं ' रह गया
शेष रह गए
बस
लम्बे फासले
दूरियाँ
और कुछ
कड़वी यादें ।


मौन है प्रशासन


आज
सरे आम
हत्या
बलात्कार
हो रहे हैं
मौन है
प्रशासन
गाँधी जी के
तीन बन्दरों की तरह
आँख और कान
बंद किए
मूक है जनता ।
शायद…
यह सब देखते सुनते
आदी हो गए हैं लोग
तभी तो
मानवीयता की जगह ले ली है
अमानवीयता ने
और
संवेदना
तो गई है
संवेदनाशून्य ।


मौन


सदा मौन
रहती हो तुम
सबकी पीड़ा सहती हो
तुम पर पहाड़ टूटते,
ज्वालामुखी फटते,
तूफान भी आते
फिर भी तुम हो मौन ।
गर्मी की उमस
वर्षा की बौछार
ठंड की सिहरन
हर मौसम
को सह जाती हो
कर्त्तव्य से
विमुख नहीं होतीं
मंजिल तक पहुंचाती हो
किसी को कभी
बोझ न समझती
सबके सुख-दुख की साथी हो
पर तुम
क्यों?
यह अन्याय सहती
क्या तुममें
विरोध का साहस नहीं?
आखिर
तुम हो कौन?
क्या नारी?
नहीं!

तो फिर?
उसी का दूसरा रूप
निरुत्तर सड़क!!!


प्रकाश


प्रातः
सूर्य के उदय होते ही
हृदय पर
थपकी देती है
निस्तब्ध हवा
कुछ उदास
कुछ परेशान सी
तन्हां
प्यास से जलती
आतुर मैं
नींद से बोझिल
खुमार भरी आँखों से
अपने जीवन के
प्रकाश
को ढूंढती हूँ ।

दोस्त


दोस्त
आइने जैसा होता है
जिसमें दिखता
अक्स अपना
खुशियों को  बढाता
गम को दूर भगाता
जीवन की बगिया
को महकाता है
एक यही रिश्ता है
जिसे हम चुनते हैं
माता-पिता
भाई-बहन
चाचा-बुआ
मामा-मौसी
आदि सभी
जन्म लेते ही
बन जाते हैं
सभी
रिश्तों में
हो सकता है
स्वार्थ
पर दोस्त होता है
नि स्वार्थ!

राख नहीं होना


होठों से लगी
जलती हुई सिगरेट सी
कहानी है मेरी
सुलगकर जलना उसे भी है
मुझे भी.. ।
फर्क सिर्फ इतना है
उसे कुछ ही क्षणों में
राख होना है
पर मुझे तिल-तिल कर
जलकर भी
राख नहीं होना है ।

गीत

बादल के उस पार
बादल के उस पार
दूर तक निगाह गई
  
पलकों पर छोड़ गया
अनदेखी छवि कोई
आँखों ने देख लिया
रूप तेरा मोहक कोई

इक पल जो देखा
उम्र यूँ गुजर गई
बादल के उस पार
दूर तक निगाह गई

लहरें किनारों से
सपने में बोल गईं
कि मिलने को तुझसे
कुछ बेताब हो गईं

अनजानी हवा कहीं
आँचल उड़ा गई
बादल के उस पार
दूर तक निगाह गई ।


मीत कोई मिल गया


पूनम की रात
मस्ती की बारात है
चांदनी दमक ' रही
मस्त हवा बहक. रही

लहरें साज दे गईं
गीत गुनगुना गई
दूर कहीं डूब गई
आज की यह शाम है

कान में कोई बोल गया
मिश्री सी घोल गया
हवा में उड़ता हुआ
आँचल लहरा गया

मन कहीं उड़ चला
बादलों के पार गया
मीत कोई मिल गया
जीवन है खिल गया






क्षणिकाएँ

1
आसमान से एक तारा
टूट कर पृथ्वी तक आया
पृथ्वी ने अपना आँचल फैलाकर
अपने आगोश में छिपा लिया
2
उदासियों से भरी हुई यह शाम
विचारों का यह उमड़ता सैलाब
उनकी कुछ बहर्की-बहकीं नजरें
लगता है मुझे जीने नहीं देंगी

3
आज मैं फिर बिखर रही हूँ
यह सिलसिला कब तक चलेगा
वह मुझे समेटे आखिर कब तक
मुझे तो जीवन भर बिखरना है ।

4

दीप अपनी ही धुन में जला रात भर
चाँद हारा थका पर चला रात भर
प्यार की ही तपिश का असर देखिए
हिम शिखर के हृदय से गला रातभर ।

5
मैंने ख्वाबों में देखा था जब कभी
दिल परेशां सा हुआ था तब कभी
ख्वाब का जब हुआ हकीकत से सामना
तुझे तब से ही माना है दिल का आईना ।

--- 
लेखक परिचय
जन्म 15 मार्च 196०
शिक्षा एम. ए., पी-एच .डी. ( हिन्दी)
सम्प्रति - प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, म.ल.बा.
शास. कन्या स्नातकोत्तर ( स्वाशासी) महाविद्यालय
भोपाल ( म. प्र.)

सम्पर्क सूत्र  - एफ- 113/23, शिवाजी नगर, भोपाल ।
प्रकाशन लगभग 3० शोध - पत्र एवं आलेख प्रकाशित विभिन्न
पत्रिकाओं में कविताएं एवं पुस्तक समीक्षाएं प्रकाशित ।
आकाशवाणी भोपाल से कविताओं का प्रसारण, वर्तमान
में स्त्री विमर्श ' विषय पर ' लघुशोध  '  ।

सम्मान : अम्बेडकर फैलोशिप सम्मान दलित साहित्य अकादमी,
नई दिल्ली ।

अम्बेडकर आदित्य सम्मान उज्जैन
मानद उपााधि- हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग
सारस्वत सम्मान हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग,
इलाहाबाद










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