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सच बोलें, सच्चे काम करें - डॉ. दीपक आचार्य

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सभी चाहते हैं कि जो हम सोचें और अपने श्रीमुख से बोलें वह सब सच होता रहे। ताकि हम सुख-समृद्धि का आवाहन करते रहें और मौज-मस्ती के साथ जीवन जीयें। 

पर ऎसा हो नहीं पाता। यह बात नहीं है कि यह सब कुछ असंभव हो। यह असंभव नहीं मगर दुष्कर जरूर है। दुनिया का कोई भी कर्म ऎसा नहीं है जिसके बारे में यह दावे के साथ कहा जा सके कि उसे इंसान नहीं कर सकता।

हम सभी लोग वह सब कुछ कर सकते हैं जो हमारे चिंतन में होता है। उन सभी प्रकार की कल्पनाओं को अच्छी तरह जी सकते हैं जो हमारे दिमाग में आती हैं क्योंकि ब्रह्माण्ड में वही सब संचित है जो किसी न किसी युग में पहले हो चुका होता है और इसका अनुभव सृष्टि के लोग ले चुके होते हैं।

अब जो होगा या हो रहा है वह तो सिर्फ इसकी पुनरावृत्ति का प्रयास ही है। हो सकता है देश, काल और परिस्थिति के अनुरूप इसका परिष्कृत स्वरूप हमारे सामने आ जाए जो अधिक युगानुकूल प्रतीत हो तथा इसका पहले से अधिक प्रभाव हो।

हमारे जीवन में सभी काम हो सकते हैं जिन्हें हम सोचते या बोलते हैं। चाहे वह आशीर्वाद हो या श्राप। लेकिन इसके लिए सत्य का आश्रय पाना नितान्त जरूरी है। जो सत्य को अपना लेता है, मन, वचन और कर्म से सत्य का परिपालन करता है,  सत्य उसके वचन और संकल्प की रक्षा करता है।

ऎसा इंसान जो कुछ कहता है वह हमेशा सच ही सच होता है और इस सच के सहारे इंसान जीवन के सत्य से रूबरू होता हुआ आनंदित होता है।

हमारी कही हुई कोई सी बात सत्य नहीं होती। हमारे हर सोचे हुए काम के लिए हमें भगवान के सामने मिन्नतें करनी पड़ती हैं कि यह सच हों। आखिर इसके पीछे क्या रहस्य या अवरोध है, इसे समझने की आवश्यकता है। असल में इसका मूल कारण यह है कि हमारे मन में मलिनता और दिमाग में कुटिलता भरी होती है और इस कारण हम दूसरों के बारे में नकारात्मक सोचते रहते हैं।

इस स्थिति में यदि हमारे बोल सच होने लगें तो हमारा अपना भला हो न हो, दूसरे का नुकसान करते हुए प्रसन्नता प्राप्त करने में हमें मजा आने लगता है लेकिन इसमें हमारी पूर्वजन्म से लेकर वर्तमान जन्म तक की सारी संचित ऊर्जा और पुण्य एक झटके में समाप्त हो जाता है और हम ठन-ठन गोपाल हो जाते हैं।

यह शाश्वत सत्य है कि हमारे हर शब्द के साथ हमारे भीतर की वह ऊर्जा शक्ति बाहर निकल जाती है जो हमारे आत्मविश्वास और संकल्पों को मजबूत करती है और जिसके होने की वजह से ही हम शक्ति के साथ टिके होते हैं।  पर हमारे द्वारा बोले जाने वाले हरेक शब्द में यदि  नकारात्मकता हो, भले वह शब्द सकारात्मक हो, लेकिन हमारे दिल और दिमाग में नकारात्मकता के भाव आ जाएं तो समझ लेना चाहिए कि मन के भाव के अनुरूप शक्ति का उपयोग होता।

बहुत से लोग हैं जो मन से नहीं चाहते कि किसी का  भला हो, किसी के काम बनें और कोई दूसरा इंसान तरक्की करे। इसके बावजूद ये लोग दूसरों के बारे में चिकनी-चुपड़ी बातें करते हुए विश्वास दिलाते हैं। इस स्थिति में इनके संकल्प के अनुरूप काम होगा, इसमें वाणी का कोई मूल्य नहीं है क्योंकि इन लोगों की वाणी का कोई मोल नहीं होता। ये लोग अक्सर झूठ और बकवास, वादों और दावों के बीच झूलते हुए पेण्डुलम होते हैं। जो इंसान भीतर-बाहर से एक नहीं है उसके शब्दों का कोई अर्थ या प्रभाव नहीं होता, ये भूसे की तरह होते हैं।

यह रिक्तता हमें आने वाले कई जन्मों तक दुःखी करती रहती है और अधोगामी बनाकर पशुता की ओर बढ़ाती रहती है। आजकल अधिकांश लोग नकारात्मक और स्वार्थी मानसिकता के हैं, धर्म और न्याय, मानवता, संवेदना और करुणा से इन्हेंं कोई सरोकार नहीं है।

इस स्थिति में झूठ के कारण से हमारी बातें सच नहीं होती। यदि सच होने लग जाएं तो दुनिया में धमाल मच  जाए। इसलिए अच्छा ही है कि हमारी वाणी सिद्ध नहीं हो पा रही है।  

धर्मानुकूल व्यवहार और मानवीय संवेदनाओं को अपना लिए जाने कि बाद शत-प्रतिशत सत्य को जीवन में अपना लिया जाए तो कोई कारण नहीं कि हमारी वाणी सत्य न निकले।

सत्य का आश्रय पाएं, फिर देखें हमारे बोल कितने सच निकलते हैं, हमारे सोचे हुए काम कैसे फटाफट होने लगते हैं। जो सत्य को अपना लेता है वह अपने आप ईश्वरत्व का अनुभव करने लगता है। आजमा कर देखें। सत्य को जीवन भर के लिए स्वीकार कर लिए जाने के बाद उस इंसान के पास न कुछ छिपाने को होता है, न षड़यंत्रों और मलीनताओं में जीने की विवशता। वह सत्यं से शिवं और सुन्दरं तक की यात्रा का मार्ग पकड़ लेता है।

 

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

www.drdeepakacharya.com

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