विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

घास की रोटी / कहानी / देवेन्द्र कुमार मिश्रा

image_thumb

'' आज की तारीख में घास की रोटी कौन खाता है यार? हाँ पढ़ा है हिन्दी की किताब में कि महाराणा प्रताप ने घास की रोटी खाई थी लेकिन झुके नहीं थे अकबर के सामने। तब की बात और थी। लेकिन अब 21 वीं सदी में है हम। भारत विकासशील से विकसित होने जा रहा है। संचार क्रांति सौ फीसदी सफल हो चुकी है। कर्मचारियों को 7 वाँ वेतन आयोग लागू हो चुका है। गाँव-गाँव में सड़कें बिजली कम्प्यूटर पहुँच चुका है और तुम कहते हो कि देश के बीचों-बीच बसे बुन्देलखंड में लोग घास की रोटी खा रहे हैं। क्या वहाँ खेती नहीं होती। क्या राशन की दुकानें नहीं हैं। तुम भी अजीब बात करते हो यार। '' चैनल के पत्रकार रवि चौधरी ने कहा - जब उसके पत्रकार साथी विनोद रंजन से उसे ये जानकारी दी।

'' अकाल रखा, ओलावृष्टि से प्रभावित क्षेत्र रहा है हमेशा बुन्देलखंड। पानी का तो सर्वत्र अभाव है। नदी नाले कुँए तालाब सभी सूख जाते हैं गर्मी में। शहरों में तो लोग पानी खरीद लेते है। लेकिन गाँव का किसान कहां से पानी खरीदे? नगद रूपया-पैसा कहा होता है उनके पास?''

' तुमने किससे सुना। ''

'' अपनी आँखों से देखा ''

'' क्या कर रहे थे तुम वहां '

'' शहर में मेरा घर है। जब खबर मिली तो मेरे अन्दर का पत्रकार खबर सूंघने वहां पहुँच गया। पिछले हरते ही तो घर गया था छुट्‌टी लेकर। ''

'' तुम्हारे घर में भी पानी की समस्या है। ''

'' हाँ खरीदना पड़ता है पानी '

'' और वो घास की रोटी वाली कहानी ''

'' कहानी नहीं! हकीकत है, आँखों देखी ''

'' पूछा तुमने, घास की रोटी क्यों खा रहे हो? ''

'' हाँ. पूछा। उन्होंने पहले मना कर दिया। कहने लगे - '' आप खुलेआम हमारी इज्जत मिट्‌टी में मत मिलाइये। ''

'' घास की रोटी खाने वाले इज्जत की बात कर रहे हैं। ''

'' हाँ, इज्जत ही सब कुछ है उनके लिए। वे घास की रोटी खा रहे थे लेकिन छिपकर। आखिर उन्हें अपनी इज्जत की चिंता थी। लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे। ''

फिर.

' '' मैंने छिपकर देखा। उन्हें लगा कि मैं चला गया हूँ। जल्दी में कैमरा ले जाना भूल गया। मोबाइल था। उसी से प्रयास किया फोटो लेने की। लेकिन काफी दूर का- मामला था। स्पष्ट तस्वीर नहीं आई। वे हरी घास, जिसकी मात्रा भी कम ही है पानी के अभाव में तोड़कर लाते हैं। उसे पीते हैं और रोटी बनाकर खाते हैं। किसान हैं, मजदूर हैं। जवान आदमी तो शहर चले जाते हैं मजदूरी के लिए। बुजुर्ग बेचारे वहीं रह जाते है। क्या करें फसल हुई नहीं? तो पैसा भी नहीं है। कमाई का और कोई जरिया है नहीं किसानों के पास। थोड़ी सी खेती है। उसी पर जीवन चलता है। बैंक लोन भी नहीं देता। ''

'' हाँ, वो तो ठीक है लेकिन कौन भरोसा करेगा घास की रोटी खाने वाली बात पर। तुम चाहो तो वहाँ की समस्या पर कुछ कवरेज करो। उसी के साथ घास की रोटी भी दिखा देंगे। लेकिन घास की रोटी पर पूरी रिपोर्ट दिखाना अविश्वसनीय सी बात होगी। वैसे वहां की समस्या मुख्य क्या है?''

“ पानी.”

'' तो उसी पर फोकस करो। ''

'' ओके '' कहकर विनोद रंजन निकल पडा बुन्देलखंड की ओर।

एक माह बुन्देलखंड में बिताने के बाद विनोद रंजन ने स्टोरी बनाकर दिखाई।

बसन्त बीतने को है। लोगों के चेहरों पर ग्रीष्म की तपिश स्पष्ट दिखने लगी है। बसन्त पूरी तरह गया नहीं है अभी अंतिम पड़ाव पर है किन्तु आदमी तो भविष्य की सोचता है और आदमी यदि बुन्देलखण्ड का हो तो उसके चेहरे पर चिन्ता होना स्वाभाविक है। चिन्ता पानी की। पानी जो धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। नदियों में. तालाबों में, कुँओं में और जमीन के बहुत अन्दर का पानी भी जिसे हम मशीनों से निकालते हैं।

उसने बिजली का बटन दबाया। बुन्देलखंड के हर रहवासी में से किसी भी एक ने। हर घर का पूरे शहर का, पूरे बुन्देलखंड का यही हाल है। मशीन चालू हुई लेकिन अभी आधी बाल्टी भी नहीं भरी थी कि कीचड आने लगा। फिर बूंद-बूंद मटमैला पानी। फिर वो भी बन्द। केवल सूं-सू की आवाज। उसके चेहरे पर तनाव आ गया। उसने बटन बन्द किया।

'' जमीन का पानी भी सूख गया। '' उसने अपनी पत्नी से कहा।

'' इतनी जल्दी '' पत्नी ने उत्सुकता और उदासी से कहा - '' अभी तो गर्मी शुरु भी नहीं हुई। ''

पति ने कुछ न कहा। वह चुप रहा। उसके चेहरे से निराशा, उदासी और चिन्ता झलक रही थी। आगे क्या होगा? पानी के बिना कैसे काम चलेगा? बच्चों की फीस भरे। रोजी-रोटी की व्यवस्था में पैसे खर्च करे या पानी की व्यवस्था करें और पता नहीं इस साल पानी कितने दामों में मिलेगा('। हर कहीं पानी की कीमतें बढ़ जाती है। अपना घर छोड़कर जाये भी कहां। कितने दिनों के लिए? घर किसके भरोसे छोड़कर जाये? अभी तो मार्च चल रहा है। पूरी गर्मी पड़ी है भुगतने को। अप्रैल मई जून और जुलाई में भी पानी बरसता है या नहीं। मानसून का क्या भरोसा?

बुन्देलखंड क्षेत्र से दूर शहर में जहां कुओं में पानी होता है काफी मात्रा में। वहाँ कुछ व्यापारी पहुंचते हैं हर साल की तरह इस वर्ष भी कुंए के मालिकों के पास।

दो-तीन बडी चमचमाती हुई गाड़ियों से उतरते हुए सूट-बूटधारी। उन्हें देखकर कुंए के मालिक उनके पास पहुंचे। ' आइये, सेठ साहब। इस बार इतनी जल्दी। ''

'' सुना है कि पानी सूख चुका है बुन्देलखंड के बहुत से शहरों में ''

' हाँ. खबर तो मिली है सेठजी '' एक स्वर में बोले कई लोग।

'' इसलिए हम कुओं का ठेका लेने जल्दी आ गये इस बार। कहीं ऐसा न हो कि कोई और व्यापारी आ जाये। '' दूसरे सेठ ने कहा।

'' सेठ जी, हमारे यहाँ तो पानी पिलाना पुण्य का काम होता है। लेकिन क्या करें? पेट भी लगा है साथ में और बढ़ती महंगाई में बाल-बच्चों को पालना भी मुश्किल हो रहा है। नहीं तो पानी बेचना शोभा नहीं देता। '' एक किसान ने कहा। जिसके खेत पर कुंआ था।

'' पाप-पुण्य आप थोड़े ही कर रहे हैं। आपको शोभा नहीं देता न सही। हम तो व्यापारी ठहरे। जहां से चार पैसे बने। वही काम करते है। फिर पानी तो हम भी पिला रहे है। बस जरा सा दाम ले रहे हैं। '' एक सेठ ने ढीठता से कहा।

जरा से दाम.................. .हमने तो सुना है...........''

किसान की बात बीच में काटकर व्यापारी ने कहा - '' पानी के बदले हर दाम जरा सा ही होता है। तुम अपने मुनाफे की सोचो। पिछली बार से थोड़ा बढ़ाकर ही दूंगा। तीन महीने लायक पानी है भी कुंए में या.....................''

किसानों को लगा कि सौदा हाथ से न निकल जाये। उन्होंने एक साथ कहा - '' आप चलकर देख लीजिए। पानी बहुत है कुओं में। ''

सेठ ने कुओं का मुआइना किया। अपने लोगों को इशारा किया। सेठ के लोगों ने कुंए में रस्सी बांधकर बाल्टी डाली। ताकि पानी कितना भरा है इसका पता लग सके। सेठ के लोगों ने इशारा करके बताया '' ठीक है। ''

'' पिछले बार एक लाख दिये थे प्रत्येक कुएं के। इरा बार दस हजार बढ़ाता हूँ। '' सेठ ने कहा '' लेकिन हुजूर इस बार एक माह पहले भी तो आये है। '' किसानों ने कहा।

'' कुछ तो पुण्य आप लोग भी करिये। जितना महंगा आप हमें देंगे। उतना ही महंगा हम बेचेंगे। '' '' बुन्देलखंड में वैसे भी बेकारी, गरीबी है साहब। लोग बहुत महंगा नहीं खरीद पायेंगे। '' दूसरे किसान ने कहा।

'' कहां गरीबी है? कहां बेकारी है? अरे जहाँ हम जैसे सेठ व्यापार कर रहे है। वहां कहां से बेकारी? लोगों को कमाना नहीं आता। ये और बात है। फिर हम रोजगार तो दे ही रहे हैं गरीबों को। ट्रेक्टर, ट्रक चलाने वालों को पानी घर-घर पहुंचाने वालों को काम मिलेगा। एजेन्टों को कमीशन मिलेगा। यही तो तीन-चार महीने है कमाई के। फिर तो बारिश आ ही जाती है। ' एक लाख दर। हजार प्रति कुंए के हिसाब से ठेका हो गया। नगर पालिकाओं ने नहरों में सशस्त्र बल तैनात करवा दिये। ताकि किसान सिंचाई के लिए पानी न ले सके। नगर-पालिकाओं को आदेश था कि वे तीन महीने पीने का पानी उपलब्ध कराये। नगर- पालिका ने अपने इंजीनियरों द्वारा सर्वेक्षण के आधार पर तय किया कि चार दिन के अन्तराल से बीस मिनिट के लिए नलों को चलाया जाये।

नदियाँ क्रिकेट का मैदान बनी हुई थी। बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। तालाब सूखे हुए थे। लोगों के लिए अब घूमकर सड़क से आना-जाना नहीं पड़ता था तालाब उनके लिए अब रास्ता बन चुका था। जल्दी पहुंचने का शार्टकट। कुंए सूख चुके थे। कुंए के तल स्पष्ट दिखाई देते थे।

चार दिन के अन्तराल से घरों में पानी पहुंच रहा था। जो पीने के लिए भी पर्याप्त नहीं था। बाकी कामों का क्या होगा? तभी दलालों ने सम्पर्क करना शुरु कर दिया। पहले इसका बाकायदा आटोरिक्शा से रिक्शा से प्रचार-प्रसार किया गया।

जो भी सज्जन पीने का पानी दैनिक उपयोग का पानी चाहते हैं। वे अपने मोहल्ले, कॉलोनी के मुख्य सड़क पर बने ऑफिस में सम्पर्क करें। इस बार पानी प्रति टेंकर 8007 - रूपये दैनिक उपयोग के लिए और पीने का पानी प्रति लीटर 2० रुपये। जल्दी करे ऑफर सीमित समय के लिए है। बाद में रेट में बढ़ोत्तरी हो सकती है। सुबह- शाम दोपहर कई-कई बार सभी एजेन्टों के लाउड स्पीकर पर विज्ञापन करते आटो, रिक्शा घूम रहे थे।

-३- पीने का पानी तो लोग बर्तनों में रख लेते है। दैनिक इस्तेमाल के लिए लोगों ने घर में अलग- अलग साइज के पक्के गड़हे खुदवा रखे हैं। जिनमें जरुरत के हिसाब से एक टेकर-दो टेंकर पानी समा सके। पानी की सुरक्षा के लिए गड्‌ढे के ऊपर लोहे की चादर से बना ढक्कन होता है। जिसमें ताला लगाया जा सके। इस तरह पानी की सुरक्षा भी हो जाती है और चोरों से बचाव भी। जिनके पारा खरीदने के पैसे नहीं होते। वे चोरी करते है। पानी सुरक्षित रखने के लिए जमीन के अन्दर पक्की टंकियाँ बनाने का कारण यही था। पहले लोग छत पर रखी सिनटेक्स की टंकियों में पानी भरवाते थे। किन्तु रात में चोर, लुटेरे घुस आते। घर के बाहर की कुंडी लगा देते ताकि घर के लोग बाहर न आ सके। फिर छत पर चढ़कर बाल्टी में पानी भर-भर ले जाते। इसकी रिपोर्ट भी हुई। चोर पकड़े भी गये। उन्हें सजा भी हुई। किन्तु कितनों को सजा हुई। कंठ की प्यास नित-नये चोर पैदा करने लगी। तब से लोगों ने घर के मुख्य द्वार के अन्दर जमीन खोदकर टंकियाँ बनवाना शुरू कर दी।

सार्वजनिक नलों पर कई बार पानी के लिए झड़पें होती। लड़ाई-झगड़े होते। यहाँ तक कि पानी के लिए हत्यायें होना भी आम बात हो चुकी थी। जो सम्पन्न थे उन्होंने बोर करवा लिए। घर में नल लगवा लिए। लेकिन पानी तो था ही नहीं। शो व्यापारी लोग पानी का व्यापार करने लगे। वे जानते थे कि सरकार के लिए उतना पानी देना संभव नहीं है। जितनी लोगों को आवश्यकता है और गर्मियों में पानी बिकने लगा।

पुरानी बस्ती के बिगड़ैल लड़के गर्मियों में जान अकर पानी के लिए मार-पीट करते।

उनके खिलाफ रिपोर्ट होती और वे बिना बचाव के थाने पहुंच जाते। दूसरे मौसम में वे फरार हो जाते। अग्रिम जमानत की कोशिश में वकीलों से सम्पर्क करते। किन्तु ग्रीष्म ऋतु में वे पुलिस के आने पर मानों उनका इन्तजार करते। थानेदार ले-देकर छोड़ने की बात करता। वे कहते इस गर्मी में हम जैसे लोगों के लिए जेल ही ठीक है। थानेदार माँ-बहिन की गालियाँ देते हुए कहता - '' सब समझ रहा हूँ मादर........... पानी के लिए जेल जा रहे हो। ''

इरा बार अदालत में बिलकुल नया मजिस्ट्रेट था। जिन्हें यहाँ की स्थिति मालूम नहीं थी। मुलजिमों के पेश होने पर सरकारी वकील ने कहा - '' सर चोरी और मारपीट के केस में आये है। ''

'' वजह '' मजिस्ट्रेट ने पूछा।

पानी '' सरकारी वकील ने कहा।

'' पानी '' मजिस्ट्रेट ने चौंककर कहा - ' ये क्या वजह हुई? ''

' अपराध तो अपराध है '' सरकारी वकील ने कहा।

'' हाँ है लेकिन पानी क्या वजह हुई? न्यायाधीश ने आश्चर्य से पूछा।

'' योर ऑनर, आप यहां नये है। धीरे- धीरे जान जायेंगे। पानी ही यहाँ बहुत बड़ी वजह है। '' सरकारी वकील ने कहा।

'' जमानतदार है। '' मजिस्ट्रेट ने मुलजिमों की तरफ देखते हुए कहा।

'' जज साहब, तीन महीने बाद जमानत करवायेगें '' मुलजिम के कठघरे में खड़े एक लड़के ने कहा।

क्यों ''? जज ने प्रश्न किया।

'' साहब, जेल में पानी की कमी नहीं होती। व्यवस्था कराना जेल प्रशासन का काम होता है। जिसे जेल प्रशासन पूरी ईमानदारी से निभाता है। कैदियों की रोटी भले ही जेल प्रशासन खा जाये लेकिन पानी मिलता है। '' दूसरे लड़के ने कहा - जो कठघरे में अपने साथियों के साथ खड़ा था। अदालत में खड़े रंजन को भी हंसी आ गई। रंजन ने जज से मिलने का विचार किया।

'' तो पानी की सुविधा के लिए जेल जा रहे हो। ''

उन्होंने हाँ में सिर हिलाया।

और काम धंधा. घर-परिवार। ''

' बेकार है साहब। क्या जेल क्या घर? सब बराबर है। गर्मी के मौसम में घरवालों पर इतनी मेहरबानी तो कर ही सकते है कि उन्हें हमारे लिए पानी न खरीदना पड़े। ''

मजिस्ट्रेट आश्चर्यचकित था। उन्होंने मुलजिमों की इच्छा पूरी करते हुए सबको जेल भेज दिया। टैंक से बेचने वाले पानी बेच रहे थे। लोग खरीद रहे थे। दैनिक उपयोग का पानी मटमैला तो था ही लेकिन लोग इस ओर ध्यान नहीं दे रहे थे। लेकिन पीने के पानी में मटमैलापन देखकर कुछ लोगों ने ऑब्जेक्शन उठाया। दलाल ने कहा - '' पानी हमारे घर से नहीं आ रहा है। दूर शहरों से आ रहा है। लेना हो तो लो। नहीं तो दूसरा दलाल देखो। '' किसी ने पानी से संबंधित विभाग में शिकायत दर्ज करवा दी। जाँच अधिकारी ने अपना यंत्र पानी में डाला। फिर निकाला और चेक करने के बाद गुस्से से कहा - '' इतना गंदा पानी पिला रहे हो लोगो को। लोग पानी पीकर बीमार हो जायेंगे। ''

दलाल ने कहा - '' प्यासे मरने से तो अच्छा है। धंधे के टाइम पर कानून मत सिखाइये। हम लोग स्वेच्छा से खरीद रहे हैं। ''

लेकिन ये गैर कानूनी है। '' जाँच अधिकारी ने कहा।

'' तो अपनी सरकार से कहिये कि पानी की व्यवस्था कराये। धंधे के टाइम पर परेशान मत करिये। आप बताइये। आपको क्या चाहिए? कितना चाहिए। ''

'' हमको रिश्वत देते हो। ''

. '' हाँ, देता हूँ क्योंकि आप लोग लेते हैं। कौन सा सरकारी आदमी नहीं लेता। आपको चाहिए तो लो। नहीं चाहिए तो केस बना दो। मैं अपनी जमानत का इंतजाम करूँ? ''

जाँच अधिकारी कुछ देर चुप रहा। फिर बोला - '' ठीक है ऐसा करो दो टेंकर पानी पहुँचा दो मेरे घर। ''

'' कल पहुंचेगा। आज का पानी तो सब बिक चुका। ''

'' ठीक है। '' जाँच अधिकारी ने अपना पता दिया और दफतर की ओर चल दिया। मजिस्ट्रेट दयाल साहब ने पत्रकार विनोद रंजन से कहा - '' मैं क्या बताऊँ पानी के बारे में। बैठो, अपने नौकर से पूछता हूँ। कुछ पूछना हो तो पूछ लेना। '' उन्होंने अपने घरेलू नौकर से पूछा - '' तुम इसी शहर के हो। '' जी, हुजूर ''

' पानी की कमी है यहाँ बहुत ''

'' जी, हुजूर ''

'' कब से ''

'' साहब जब से पैदा हुए। होश संभाला। तभी से देख रहा हूँ। ''

'' और इस समय तुम्हारी उम्र 5० वर्ष होगी। कम से कम ''

'' जी हुजूर ''

'' पानी की कमी क्यों हैं यहाँ ''

'' बारिश ठीक-ठाक नहीं होती हुजूर। ''

'' तुम्हारे होश संभालने से लेकर अब तक ''

'' ऐसा ही समझिये हुजूर ''

'' कभी तो पानी अच्छा बरसा होगा। ''

'' ऐसा बहुत कम हुआ है। लेकिन तब भी गर्मी में पानी की कमी रही ही है। ''

'' पानी के लिए कोई हल नहीं निकाला गया। ''

'' पानी का क्या हल होगा हुजूर ''

'' सरकार ने कुछ नहीं किया अब तक ''

'' नौकर की समझ में नहीं आया कि पानी की कमी के लिए सरकार क्या हल निकालेगी? उसे तो इतना मालूम था कि पानी का न गिरना या कम गिरना या गर्मी में पानी के लिए हाहाकार मचना भगवान की कुदृष्टि है। उसने यही उत्तर दिया।

'' साहब ईश्वर के आगे किसकी चलती है। ''

मजिस्ट्रेट ने इससे ज्यादा पूछना उचित नहीं समझा। विनोद रंजन ने विदा ली और सोचा किसी समझदार पढे-लिखे व्यक्ति से इस विषय में बात करना उचित होगा।

दूसरे दिन रविवार था। जल संरक्षण विधा-? व्यक्ति से मिला विनोद रंजन। चाय- नाश्ता करवाया। फिर पानी की कमी के विषय में पूछा। उसने सहज भाव से उत्तर दिया। - '' ट्राई एरिया है सर। ''

'' तुमने पानी की कमी के कारणों का पता लगाने की कोशिश नहीं की। ''

'' सर, वॉटर लेबिल बहुत नीचे जा चुका है। जल संरक्षण के उपायों पर लोग ध्यान नहीं देते। यहाँ लोग व्यक्तिगत समस्याओं से लड़ते हैं। सार्वजनिक समस्याओं पर नहीं। जाति, धर्म के नाम पर लड़ मरेंगे। लेकिन पानी, बिजली, सड़क रोजगार के मुददों पर सरकार को कोसने के अलावा कुछ नहीं करते। इसका लाभ नेता, व्यापारी उठाते हैं। पानी भी कम ही गिरता है यहाँ। कुछ दैवीय मार भी है। ''

' और यहाँ के नेताओं सरकार ने कुछ नहीं किया। ''

' 'सरकार, सरकार को बचाने में लगी हुई है। विपक्ष सरकार गिराने में लगा हुआ है। नेता कमाने में लगे हुए हैं। थोड़ा-बहुत जो किया गया। वो बस दिखावा था चुनाव के समय। '' पत्रकार महोदय कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने पूछा।

'' लोग क्या करते हैं? कैसे रहते हैं? '

'' सर जिनकी नौकरी-व्यापार है। उन्हें तो खरीदना ही पड़ता है पानी। वे कहां जायेंगे? मजदूर गरीब आदमी इन्दौर भोपाल चले जाते हैं रोजगार के लिए। खाने को नहीं है जिनके पास वे पानी कहां से खरीदेंगे रिटायर्ड लोग अकेले रहते हैं। बच्चों को इन्दौर, पूना, कोटा भेज देते हैं पढ़ाई के लिए। नौकरी के लिए। अधिकांश पढ़े-लिखे घरों के बच्चे दूसरे शहरों में ही रहते है। अब बच्चे अपने परिवार के साथ गर्मियों में नहीं आते। ठंड में आते है। सात दिन के अवकाश में। ही बुजुर्ग माता-पिता ही चले जाते हैं गर्मियों में बच्चों के पारा। एक कमरे में सारा सामान रखकर शेष मकान किराये पर दे देते हैं। या किसी परिचित को देखभाल करने को कहकर चले जाते हैं। ''

'' फिर खेती का हाल तो और भी बुरा होगा। '' पत्रकार महोदय ने पूछा।

'' पूछिये ही मत सर। जमीनें बंजर पडी हैं। किसान मजदूरी करने चले जाते है। जो नहीं जा पाते। उन्हें आत्महत्या करनी पड़ती है। सरकारी मुआवजा तो आप जानते ही है। मिला न मिला बराबर ही है। ''

' फिर कैसे रह लेते है लोग यहाँ ''

'' किसी तरह रह लेते हैं साहब। भूख, गरीबी, बेकारी, अकाल यही बुन्देलखंड का पर्याय बन चुके हैं। ''

'' लेकिन बड़े-बड़े मकान भव्य इमारतें दिखती हैं शहर में। बड़ी-बड़ी महंगी गाड़ियाँ है लोगों के पास। मैंने देखा है शहर में। ''

'' हाँ............ कुछ पुश्तैनी जायदाद वाले हैं। कुछ बड़े-बड़े व्यापारी हैं। जिनमें भू माफिया, शिक्षा माफिया ' दो नम्बर के धंधे वाले हैं। कुछ लोग तो पानी बेच-बेचकर धन्ना सेठ हो गये हैं। जो पानी बेचने का बेगैरत काम कर सके वो तो कहीं भी रह सकता है और किसी भी हाल में रह सकता है। ''

'' गर्मी के अलावा शेष समय ''

'' वर्षा का पानी दो-चार बार गिरता है। उतने में जल स्तर बढ़ जाता है और लोग ठंड और बारिश का सीजन निकाल ही लेते हैं। बस गर्मियों में समस्या होती है। डर बस यही होता है कि कोई मेहमान न आये जाये गर्मियों में। ''

'' हूँ..... '' पत्रकार महोदय ने फिर कुछ नहीं पूछा।

चारों और फैली हुई उमस।

तापमान 45 डिग्री के ऊपर।

शरीर में बहता हुआ पसीना।

जब कभी गर्म हवा का झोंका चलता

तो धूल का गुबार उठता।

घरों के बाहर बनी नालियाँ भी सूखी हुई।

पानी की तलाश में भटकते जानवर।

ठंडी छाँव के लिए पेड़ के नीचे गर्म लपट खाते लोग।

गर्मी के कारण दोपहर में कर्फ्यू जैसा माहौल। सन्नाटा छाया हुआ चारों ओर। लेकिन चैन घर में भी नहीं है। चार-चार घंटे के लिए गोल होती बिजली। लोग देशी पंखे (बिजना) से गर्मी कम करने की कोशिश में लगे हुए। ऐसे में गाड़ी एजेंसी के सर्विस सेंटर में गाड़ियों की धुलाई हो रही है। आश्चर्य। कहां से मिल रहा है इन्हें इतना पानी। जब ड्राईवर फोर-व्हीलर गाड़ी धुलवाकर लाया तो राकेश रंजन ने पूछा - '' एजेंसी के पास पानी कहां से आया? ''

'' सबके अपने-अपने जुगाड हैं साहब। खरीदते तो नहीं होंगे। पैसे वालों को कहां कमी होती है? मरण तो गरीब और मिडिल क्लास लोगों का होता है।.'

'' तुम तो यहीं के हो।..

'' जी साहब पास के गाँव का हूँ। '' '' यहाँ कोई नदी नहीं है '' विवेक रंजन ने पूछा। '' है क्यों नहीं साहब। पाँच बड़ी नदियाँ हैं। लेकिन बारिश में एक बार उफान आता है। फिर नदी धीरे-धीरे सूख जाती है। व्यापारी लोग रेत निकालने में लगे रहते हैं नदी से। पानी संरक्षण की कोई व्यवस्था करता नहीं है। '.

' तालाबों का गहरीकरण नहीं होता। ''

' सब होता है साहब। और नहीं भी होता। दैवीय मार है। पानी भरपूर गिरता ही नहीं। अकाल रखा बुन्देलखंड के भाग्य में है। ऐसा लगता है कि बुंदेलखण्ड श्रापित है। ''

शहरों का तो ठीक है। लोग पानी खरीद सकते हैं। शहरों में नौकरी वाले व्यापार करने वाले रहते हैं। लेकिन गाँवों में .किसानों के पास नगद रूपया कहां होता है? उन्हें तो फसल आने पर ही पैसा मिलता है। किसान कहा से पानी खरीदेगा फिर गाँव में पानी बेचने वाले जाते भी नहीं हैं। वे जानते हैं कि किसान पानी खरीद नहीं सकता।

बुन्देलखण्ड के सभी गाँवों का प्रतिनिधित्व करता गाँव भीमपुरा। पिछली बरसात ढंग से न होने पर फसलें सूख गई थी। बेमौसम की ओलावृष्टि फसलों को बर्बाद कर चुकी थी। किसान केवल सरकारी दफ्तर के चक्कर लगा रहे थे मुआवजे के लिए। जो उन्हें अगर मिल भी रहा था तो नुकसान के अनुपात में तो बिलकुल नहीं। बहुतों को कुछ भी नहीं मिला था। कई किसान कर्ज न चुकता करने पर आत्महत्या कर चुके थे। बहुत से आत्महत्या का विचार कर रहे थे। कुछ ऐसे भी थे जो किसान से मजदूर बन चुके थे। मजबूरी में शहरों की तरफ पलायन कर चुके थे।

तीरथ सोच में पड़ा था कि वह क्या करे? शहर जाये या आत्महत्या करे। गाँव में कुछ ही घर बचे थे। शेष तो ताला लगाकर परिवार सहित जा चुके थे। तीरथ जाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। लेकिन आखिर कब तक? अब किसी चमत्कार की उसे उम्मीद नहीं थी। तालाब. कुंए सब सूख चुके थे। गांव का एक पुराना कुंआ (झिरिया) था। जिसमें पानी था। पानी जो बहुत नीचे उतर चुका था। अपना काम तो चला ले लेकिन जानवरों की प्यारा कैसे बुझाये। खेत भूखे, उजाड़ हो चुके थे। तपिश से दरारें पड़ चुकी थी खेतों में। सूर्य तपता ही जा रहा था। पानी सूखता ही जा रहा था।

तीरथ की पत्नी ने कहा - '' जानवरों को छोड़ दिया जाये। ताकि वे अपने दाने-पानी की तलाश में निकल सके। यहाँ बांध के रखा तो भूख-प्यास से मर जायेंगे। हमें भी चलना चाहिए। ''

' घर का क्या होगा? '' तीरथ ने उदास स्वर में पूछा।

'' घर में रखा ही क्या है? '' तीरथ की पत्नी ने चिढ़कर कहा - '' जय रोटी-पानी तक का इन्तजाम नहीं है तो चोर लुटेरे आकर भी क्या करेंगे? '' तीरथ चुप रहा। उसे पत्नी की बात सही लगी। उसनें जानवरों को मुक्त किया। घर में ताला लगाया और पत्नी बच्चों के साथ शहर जाने वाली बस की तरफ बढ़ने लगा। तीरथ को उदास देखकर पत्नी ने कहा - '' यहाँ भूखे मरने - आत्महत्या करने से अच्छा है कि शहर जाकर मजदूरी करें। ऊपर वाले ने पेट दिया है तो दाना भी वही देगा। लेकिन बैठने से कुछ हासिल नहीं होगा। चिन्ता मत करो। हर बार की तरह बारिस का पहला पानी गिरते ही आ जायेंगे। ''

पत्नी की बात सुनकर तीरथ ने कहा - '' अकेले पानी से गुजारा नहीं होता। फसल नहीं होगी तो रोटी कहां से आयेगी। '.

- '' महाजन से कर्जा ले लेंगे। '' पत्नी ने कहा - '' बैंक के हजार चक्कर लगाने से भी कहां कर्जा मिल जाता है? हमारे लिए गांव का महाजन ही ठीक है। ब्याज ज्यादा लेता है। लेकिन पैसे तुरन्त देता है। ''

'' कर्जा लिया और न चुका पाये तो जमीन भी गई। फिर तो कुछ न बचा ''

'' तो अभी क्या बचा है? अकाल. सूखा बेमौसम ओलों की मार से फसल कहीं होती है। जमीन चली भी गई तो जाने दो। कम से कम एक-दो साल तो जी लेंगे। फिर आखिरी रास्ता तो है ही किसानों के पास '' तीरथ कुछ न बोला। वह मन ही मन सोच रहा था। मरने के पहले कर्जा लेकर ही कुछ समय बिना चिंता के जी ले। चिता तो राजी ही है अपनी। कल मरना है तो आज ही क्यों मरें? कल ही मरेंगे। धूल उडाती हुई बस तेजी से शहर की तरफ भाग रही थी।

रवि चौधरी ने कहा - '' और घास की रोटी वाला प्रकरण ''

' अब न घास है और न घास खाने वाले। ''

' मतलब..........'' रवि चौधरी ने पूछा।

' सूखे की मार, पानी के खत्म होने पर घास हरी कैसे होती? तो जब साधन भी खत्म हो गया तो उस वृद्ध ने अपनी पत्नी सहित आत्महत्या कर ली.'

'' सरकार ने कुछ नहीं किया ''

'' किया न, राहत राशि घोषित की। कर्ज माफ की घोषणा की। ''

'' तुमने बात की किसी जिम्मेदार सरकारी व्यक्ति से ''

'' हाँ भोपाल आकर की। उन्होंने कहा - '' हमें तो पता ही नहीं था। हम जाँच करवायेगें और उचित कदम उठायेंगे। ''

'' ठीक है. वैसे ये कोई टी.आर.पी. वाली खबर तो नहीं है। लेकिन कोशिश करेंगे दिखाने की। इस कवरेज को घास की रोटी नाम देते हैं। कैसा रहेगा? ''

विनोद रंजन ने कहा - '' बॉस को दिखा दो। हाँ कहे तो ठीक है। ''

रवि चौधरी कवरेज से बहुत खुश नहीं थे। उनका मानना था कि पानी की समस्या तो दिल्ली में भी है। इसमें नई खबर क्या है? विवेक रंजन का मानना था कि दिल्ली और बुन्देलखंड की पानी की समस्या में बहुत अन्तर है। रवि चौधरी को इस पूरे कवरेज में घास की रोटी वाली बात ठीक लगी लेकिन उसके फुटेज मोबाइल से काफी दूर से लिए जाने के कारण स्पष्ट नहीं थे। हाँ पानी की कमी के कारण जेल जाने वाला फुटेज उन्हें पसन्द आया क्योंकि वे जानते थे कि इससे टी.आर.पी. बढ सकती है।

---

   

लेखक का पता -

देवेन्द्र कुमार मिश्रा

पाटनी कालोनी, भरत नगर, चब्दलगाँव छिन्दवाड़ा मप्र. ९४८०१००१

1 नाम देवेन्द्र कुमार मिश्रा

2 जन्मतिथि 21 -०३-१ 973

3. शिक्षा एम ए समाजशास्त्र,

०इ प्रमाणपत्रीय कोर्स

4. भाषा हिन्दी

5 कार्य स्वतंत्र लेखन्

6 लेखन 1991 से सतत् पत्र-पत्रिकाओं में कथा 7000 से अधिक कवितायें। 3०० कहानियाँ प्रकाशित। 8 कथा संग्रह प्रकाशित। 27 काव्य संग्रह प्रकाशित। . सम्मान : देश भर की साहित्यिक संस्थाओं से 225 . पत्राचार का देवेन्द्र कुमार मिश्रा,

वर्तमान पता पाटनी कालोनी. भरत नगर. चन्दनगाँव-छिन्दवाडा मप्र.) छिन्दवाडा मो 9425405022

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget