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खोटे सिक्कों की दौड़ चवन्नियों का साथ़ - डॉ. दीपक आचार्य

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जो अपने आप में पूर्ण है उसे किसी के सहारे की कोई जरूरत नहीं पड़ती। सहारा या तो निःशक्तों और निर्बलों को लेना पड़ता है अथवा भीड़ के जरिये अपने आपको आगे लाने का जतन करने वालों को।

अन्यथा जो लोग सक्षम हैं उन्हें किसी की सहायता की दरकार नहीं होती। जो लोग अपने ज्ञान, हुनर और कर्म में प्रवीण हैं वे लोग अपने सामर्थ्य और प्रतिभाओं पर भरोसा रखते हैं। इन लोगों को अपने अर्जित ज्ञान और अनुभव पर पूरा तथा पक्का भरोसा होता है और इसी से उनका आत्मविश्वास इतना अधिक मजबूत रहता है कि उनका कर्मयोग मुँह बोलता है। चाहे ये लोग राजपथों पर रहें अथवा अरण्य में।

इसका मूल कारण यह है कि इन लोगों द्वारा बड़े ही परिश्रम और एकाग्रता के साथ ज्ञानार्जन किया होता है और इस ज्ञान के आधार पर इनका अनुभव इतना प्रगाढ़ होता है कि उसमें शक की कोई गुंजाईश ही नहीं रहती।

अक्सर ऎसे मेधावी लोग ‘एकला चालो रे’ की नीति पर चलते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि आजकल जिस तरह के लोगों की खेप  आ रही है उसमें अधिकतर लोग काम बिगाड़ने की मनोवृत्ति वाले होते हैं और इन लोगों के साथ काम करते हुए काम को बिगाड़ने की दिशा में ले जाने की अपेक्षा अकेले ही काम कर लेना अधिक निरापद होता है।

इनके न होने पर इंसान खुद अच्छी तरह काम कर सकता है और गुणात्मक परिणाम से रूबरू भी करा सकता है। इसके विपरीत किसी भी नाकाबिल, खुदगर्ज, उत्साहहीन और नकारात्मक इंसान के अपने साथ हो जाने से मानसिक और शारीरिक के साथ सभी प्रकार का नुकसान भुगतना पड़ सकता है।

लेकिन अधिकांश लोगों के साथ ऎसा नहीं होता। बहुत से लोग हैं जो चाहे किसी भी प्रतिष्ठित स्थान पर क्यों न हों लेकिन इन्हें अपने कर्म को अच्छी तरह अथवा कामचलाऊ संचालन के लिए किसी न किसी को साथ रखना मजबूरी हो गया है।

बहुत से बड़े कहे जाने वाले लोग जहां कहीं होंगे, वहां अकेले कभी नहीं होते। इनके साथ कोई साथी, सहकर्मी या मार्गदर्शक जरूर होगा। कोई सा आयोजन हो, बैठक हो या चर्चा  का अवसर, इन लोगों के साथ हमेशा एक न एक इंसान साथ होगा ही।

असल में ये बैसाखियां संकटमोचक और सुपर कम्प्यूटर  का काम करती हैं। ये न हों तो बड़े-बड़े लोगों को रोजाना कुछ समय अपने काम-काज की जानकारी रखने के लिए अध्ययन हेतु निकालना पड़े, क्योंकि बड़े लोग अक्सर उन्हीं कामों में रुचि रखते हैं जिनमें प्रत्यक्ष प्राप्ति का कोई सा अवसर हो।

समाज और देश के नवनिर्माण में हाथ बंटाने वाले, फाइलों के जंगल में अपनी सेहत के लिए ऊर्वरकों की तलाश में लगे और लगातार व्यस्त रहने वाले इन लोगों के पास इतना समय नहीं होता कि वे सब कुछ देख पाएं।

समाज जीवन में खूब सारे हैं जिनके इर्द-गिर्द बैसाखियां जमी रहती हैं। बैसाखियां रखना इनकी मजबूरी भी है क्योंकि बैसाखियों के सहारे ही ये जिन्दा हैं। ये बैसाखियां अपनी सैकड़ों प्रकार की भूमिकाओं में हलचल करती रहती हैं। कभी ढाल बनकर बचा लेती हैं, कभी कठपुतली वाले की तरह नचाने लगती हैं, कभी मजबूत सहारा बनकर थाम लिया करती हैं और कभी शस्त्र के रूप में काम आने लगती हैं।

ये बैसाखियां फाईलों का भण्डार हुआ करती हैं और कभी अपने कामकाज  से संबंधित पूरी की पूरी डिजीटल लायबेे्ररी। बैसाखियां हर नाकाबिल इंसान की वह अपरिहार्य विवशता है जो पूरे कार्यकाल तक साथ रहनी जरूरी है।

बैसाखियों को कम न आँकें।  ये बैसाखियां उनके लिए फाईल थामने से लेकर सारी व्यवस्थाओं को पूरा करती हैं और अपने मालिक को खुश रखने के सारे जतन कर हुए परस्पर धन्य अनुभव करते हैं।

इन बैसाखियों को बड़े लोगों का क्लोन कहना ज्यादा उपयुक्त होगा क्योंकि अधिकतर बार ये बैसाखियां ही इनके जीवन में निर्णायक भूमिका अदा करती हैं। तमाम प्रकार के बाड़ों में बैसाखियों की ही चलती है, बैसाखियां ही हैं जो लोगों को चलाती हैं, दौड़ाती हैं। असल  में ये बैसाखियां हर मजबूर इंसान की विवशता होती है।

बैसाखियों को भी तलाश रहती है उन सभी लोगों की जो आधे-अधूरे या मूर्ख होते हैं। कोई दिमाग और शरीर से कितना ही मजबूत और स्वस्थ क्यों न हो, अपने काम-काज में फिसड्डी होने के कारण वह दिव्यांग की ही श्रेणी में दिखता है।

जानबूझकर नाकाबिल रहने वाले लोगों और बैसाखियों का रिश्ता पिछले कुछ सालों से ज्यादा चल पड़ा है जबसे आदमी ने स्वार्थ और प्राप्ति वाले कामों को तवज्जो देना और दूसरे कामों को हीन मान लिया है।

ईश्वर ने निकम्मों के लिए ही उन बैसाखियों का बन्दोबस्त किया है जो एक-दूसरे को तारने के लिए काफी हैं। अपने आस-पास बहुत सारे लोग हैं जिन्हें अपनी-अपनी बैसाखियों के साथ देखा जा सकता है। बहुत से लोग हैं जो इन्हीं बैसाखियों को थाम कर दुनियादारी की वैतरणी को पार कर गए ।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

www.drdeepakacharya.com

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