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रचना और रचनाकार (१९)आज की कविता – कुछ टिप्पणियां / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

कविता का अर्थ

भाषा का एक महत्वपूर्ण कार्य वस्तु-जगत को चित्रित करना है. किसी समय भाषा का यह एकमात्र उद्देश्य माना जाता था. साहित्य को भी समाज का दर्पण कहा गया है. कविता के बारे में भी यह धारणा रही है कि वह अपने समाज और समय का एक विश्वसनीय दस्तावेज़ हो. लेकिन भाषा, साहित्य और कविता का यह काम कि समाज को चित्रित करे, उसका दर्पण बने अथवा उसका प्रमाणिक दस्तावेज़ हो- शायद न्यूनतम कार्य है. इतना तो होना ही चाहिए. लेकिन प्रश्न यह है कि भाषा /साहित्य /कविता अपने समाज की वस्तुगत स्थिति को अभिव्यक्ति देती ही क्यों हैं और क्यों दें.

भाषा केवल जगत /समाज का चित्रण ही प्रस्तुत नहीं करती. यह अन्य अनेक कार्य भी करती है और जो कदाचित चित्रण से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं और जो भाषा में ही सम्पन्न हो सकते हैं. ऐसे कार्यों का भाषा से इतर कोई प्रतिरूप नहीं होता. उदाहरण के लिए जब हम शब्द, लेखनी, कहते हैं तो इसका वस्तुगत प्रतिरूप हमें उस लेखनी के रूप में मिल जाता है जिसका हम लिखने के लिए उपयोग कर रहे होते हैं. लेकिन जब हम अपनी भाषा में ‘प्रार्थना’ कर रहे होते हैं तो यह प्रार्थना भाषा में ही सम्पन्न हो जाती है. इसका कोई प्रतिरूप भाषा से परे नहीं देखा जा सकता,. केवल प्रार्थना ही क्या हमारी प्रतिदिन की भाषा ऐसे तमाम भाषाई कार्यों को अंजाम देती है – आज्ञा प्रदान करना, रचना करना, अनुमान लगाना, कहानी कहना, लतीफा गढना, पूछना, धन्यवाद देना, शाप देना, अभिनंदन करना, आदि अनेकानेक ऐसे कार्य हैं जिन्हें हम भाषा के अंतरगत ही सम्पन्न कर लेते हैं.

कविता न केवल एक ऐसा ही भाषाई खेल है, वरन वह सभी भाषाई कार्यों को सम्पन्न करने में भी समर्थ है. वस्तुतः जब वह अपने समय और समाज का चित्रण कर रही होती है तो भी जाने-अनजाने कोई न कोई भाषाई कार्य उसमें निहित रहता है. वह फटकारने के लिए ऐसा चित्रण कर सकती है, वस्तु-स्थिति की विडम्बना को रेखांकित कर सकती है, हालात को बदलने के लिए प्रेरित कर सकती है, वह झकझोर सकती है, हमें हमारी रूढिगत निद्रा से जगा सकती है, इत्यादि. विट्गेंस्टाइन की भाषा में कहें तो भाषा (कविता) अनेक ‘खेल खेलती’ है. –

कौन है, आखिर किसके लिए

वह खेलती है खेल

क्यों खेलती है/ और खेल भी

कैसे-कैसे खेलती है कविता!

आकृतियां रचती है कविता

कविता प्राक्कल्पना है भविष्य की

वर्तमान पर सवाल उठाती

कविता झड़ी लगा देती है प्रश्नों की

नारे लगाती है/ अभिनय करती है कविता

पहेली बुझाती है /लतीफे गढती है कविता,

कविता प्रार्थना है, एक निवेदन है

अभिनंदन में उठा हाथ भी है

कविता धन्यवाद है

लेकिन कभी-कभार श्राप भी है

सम्वेदनाओं की अभिव्यक्ति है कविता

माना कि हथियार का खेल भी खेलती है

लेकिन खेलते हुए/ क्या खेल होती है कविता!

कौन है , आखिर किसके लिए

खेलती है वह खेल !

(डॉ. सुरेंद्र वर्मा, कविता के पार कविता)

कविता का वितान – राजनैतिक सम्वेदना

कविता का वितान बहुत विस्तृत हो गया है. उसे किसी एक ही कार्य के लिए तैनाथ नहीं किया जा सकता. लेकिन आज का कवि यह कभी नहीं भूलता कि कविता-कर्म भी एक सामाजिक कार्य है.

कविता अपने समाज से ही रूप और आकार ग्रहण करती है. कवि एक सचेत दृष्टा की तरह अपने आस-पास होने वाली सामाजिक उथल-पुथल, संगति-असंगति आदि, को कविता में अभिव्यक्ति देता है और आवश्यकतानुसार ललकारता और डॉटता भी है. परिवर्तन के लिए निवेदन भी करता है.

स्वतंत्रता के बाद भारत के लोगों की कई आकांक्षाएं रहीं –उज्ज्वल भविष्य के प्रति उन्होंने सपने देखे, स्वशासन को गर्व से महसूस करना चाहा, लोकतंत्र के आदर्शों को अपने प्रतिनिधियों और सामान्य जनों में उतरते देखना चाहा, चंहुमुखी विकास को सम्पन्न होते महसूस करना चाहा...लेकिन ये सारे स्वप्न, ये सारी आकांक्षाएं धराशाही हो गईं. केवल असंतोष और खीज ही प्राप्त हो सकी. राजनीति को भ्रष्टाचार में परिवर्तित होते देखा गया. उसे पूर्णतः व्यर्थ होते देखा गया. लोकतंत्र की मान्यताएं बिखरकर चूर-चूर हो गईं. आम आदमी बस वोट मात्र बनकर रह गया.

आज के कवि ने अपनी कविता में इन सभी स्थितियों का जायज़ा लिया. कवि ने अपनी राजनैतिक चेतना को जाग्रत किया और अपनी कविताओ द्वारा उसे अपने पाठको तक पहुंचाया. ऐसा नहीं है कि कविता के लिए विषयों का कोई टोटा पड़ गया हो, लेकिन आज की कविता मुख्यतः राजनैतिक सम्वेदना की कविता है जो व्यक्ति और समाज को परिवर्तन के लिए तैयार करती है, विसंगतियों पर अपना सात्विक क्रोध अभिव्यक्त करती है. राजनैतिक चेतना के इन कवियों में लीलाधर जगूड़ी, धूमिल, आदि का नाम ससम्मान लिया जा सकता है.

नई कविता को चुनौती

आज ऐसा प्रतीत होता है कि जिसे हम नई-कविता कहते आए हैं, वह पुरानी पड़ने लगी हैं. नई-कविता मुख्यतः छंद-मुक्त कविता है. बेशक सामाजिक विसंगतियों और विकृतियों के प्रति नई कविता ने अपने आक्रामक तेवर दिखाए हैं और आज भी यह सुरक्षित हैं. मानवीय मूल्यों के विघटन पर उसकी मुट्ठी कसती रही है. साथ ही अनावश्यक तुकों के भिड़ाने में नई-कविता ने भाषा का अपव्यय भी नहीं किया. लेकिन जहां वह एक तरफ यथार्थ के दुर्वह भार से प्रायः लद गई, वहीं दूसरी ओर स्वच्छंदता के नाम पर लगभग गद्य-परख शैली में निबंध जैसी शब्दावली का प्रयोग करने लगी. इतना ही नहीं, वह जनोन्मुख होने का दावा करते हुए भी, अत्यधिक व्यक्तिनिष्ठ होती चली गई.

छंद-मुक्त कविता की वह प्रौढ सम्वेदना जो निराला में हमें देखने को मिली, अब धीरे-धीरे सूख चली है. नई कविता इसे सहेज नहीं सकी. अब तो स्थिति यह हो गई है कि कविता का पाठक केवल कवि ही रह गया है. कवि की स्थिति यह है कि वह स्वयं अपनी ही कविता को याद रख पाने में असमर्थ है. ऐसे में क्या किया जाए. अनुभव किया गया है कि आज यदि कविता को बचाना है तो उसे पुनः लय और छंद की ओर लौटना होगा, फिर वह चाहे राजनैतिक चेतना की कविता ही क्यों न हो! आज नई-कविता छंद-मुक्त होने के नाम पर बेतुकी हो गई है. उसने अधिकतर अपनी आंतरिक लय भी खो दी है. कविता शब्दों का संगीत है, ठीक उसी तरह जैसे संगीत स्वरों का काव्य है. कविता को निःसंदेह संगीत नहीं बनाना है, लेकिन उसे पूरी तरह गद्यात्मक भी नहीं बने रहने देना है. एक अच्छी कविता, भले ही वह छंद-मुक्त ही क्यों न हो, अपना एक ध्वनि-प्रभाव छोड़ती है. यही ध्यनि-तत्व उसकी लय है.

आज की कविता में इसी लय की वापसी का प्रयास कई तरह से हुआ है. हिंदी ग़ज़ल का प्रादुर्भाव और दोहों आदि, प्राचीन काव्य-शैलियों की पुनर्प्रतिष्ठा इसी ओर संकेत करती है. इसमें लय है, संगीतात्मकता है, स्मृति में सहेज पाने की सरलता है और साथ ही आज समाज में व्याप्त विसंगतियों, विरोधाभासों और कुटिलताओं को वाणी देने का तेवर भी है. नई-कविता अपणी विस्तृत विवरणात्मकता और तहरीरी तर्ज़ की वजह से गद्य-लेख की ओर अधिक से अधिक झुकती जा रही है. व्यस्तता और वेग-गति के कारण आज व्यक्ति को इतना भी अवकाश नहीं है कि वह फुर्सत में बैठकर लम्बी-लम्बी तहरीरों को पढ सुन सके. उसे आज एक ऐसी काव्य-विधा चाहिए जो थोड़े में और अपने चुटीले अंदाज़ में बहुत-कुछ कह जाए. त्वरा के इस युग में हमें हर चीज़ ‘क्वीकी’ (तुरंतो) के रूप में चाहिए. आज मोटे-मोटे ग्रंथों का स्थान पेपर-बैक्स ने ले लिया है. धीरे-धीरे इन पेपर-बैक्स का स्थान ‘ग्लोसी’ पत्रिकाएं हथियाने लगी हैं. अखबारों में छपने वाले लेखों तक के सार-संक्षेप बीच-बीच में बॉक्स में डालना पड़ रहे हैं. तो ऐसे में लम्बी गद्यात्मक कविताएं ठहर नहीं सकतीं. उन्हें भी अपने आकार की लघुता पर तथा कथन की बेबाकी और चुटीलेपनपर ध्यान देना होगा. आज लिखी जा रही हिंदी ग़ज़ल, नव-गीत और दोहे इत्यादि इस मांग की पूर्ति करते नज़र आते हैं. इनमें समय की पहचान के साथ-साथ गीतात्मकता होने के कारण एक पकड़ है जो पाठक को अपनी तरफ खींचती है.

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(प्रेरणा, जनवरी-जून, 2010‌)

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