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उदारता से बाँटें प्यार - डॉ. दीपक आचार्य

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कोई कुछ कहता है तो कहता रहे, कोई सुनाता है तो सुनाता रहे, हमारे पास और कुछ हो न हो, अकूत प्यार है और वह सब सहेज कर रखने के लिए नहीं बल्कि लगातार और पूरी उदारता के साथ बाँटने के लिए है।

हमारा साफ-साफ मानना है कि प्यार और ज्ञान को जितना अधिक बाँटा जाता है वह बहुगुणित होकर हमें भी प्राप्त होता है और जगत में भी विस्तार पाता जाता है। पता नहीं हम सारे के सारे लोग जब कभी सार्वजनिक अभिव्यक्ति का मौका आता है वहाँ प्यार की बातें करते हैं और भाईचारा, मोहब्बत और प्रेम जैसे जुमलों का इस्तेमाल कर अपने आपको प्रेम दूत के रूप में दर्शाते हैं  लेकिन वास्तविक जिन्दगी में कुछ दूसरे ही आवरण ओढ़ते रहते हैं।

हम सभी के पास प्रेम, माधुर्य और आनंद के भण्डार भरे हुए हैं लेकिन वे सारे ही हमारे स्वार्थ की वजह से अनुदारता के मजबूत ढक्कन से ढके हुए हैं और इस वजह से हमारे भीतर का सारा प्रेम दरिया बाहर की हवा से वंचित हो जाने के कारण सूखता चला जाता है। जीवन का अंत होने तक हमें पता ही नहीं चलता कि हमारे पास कोई ऎसा भी खजाना था जिसकी बदौलत हम चाहते तो पूरी दुनिया को वश में कर सकते थे।

ब्रह्माण्ड भर में प्राणी मात्र के लिए सुकूनदायी जीवन जीने के दो ही रास्ते हैं। एक है प्रेम से रहें और दूसरों को भी प्रेम से रहने दें। दूसरा रास्ता है दुश्मनों की तरह व्यवहार करें और दुश्मनी का रायता फैलाते रहें।

कहने को हम सभी प्रेम को सही बताते हैं, प्रेम के मार्ग पर चलने की बातें कहते रहते हैं पर नगण्य लोगों को छोड़ कर बाकी सारे न प्रेम जानते हैं न प्रेम प्रकट कर सकते हैं। इन लोगों की जिन्दगी में रोजमर्रा के स्वार्थों, छीना-झपटी की आदतों, लूट-खसोट की मनोवृत्ति और अपनी ही अपनी ढपली बजाते रहने की लत के कारण प्रेम की बजाय दुश्मनी के भाव बने रहते हैं और यही कारण है कि प्रेम की सार्वजनिक तौर पर प्रशंसा और स्वीकारोक्ति के बावजूद हम लोग प्रेम से दूर भागते हैं और इसका खामियाजा भोगते भी हैं।

लेकिन हमें दूसरों का मामूली सा नुकसान देख कर जितना आनंद आता है उतना शायद हमारे किसी बड़े लाभ को देखकर भी न आए। जिसे बांटने से आनंद आता है, संतोष प्राप्त होता है और कीर्ति बढ़ती है उस प्रेम भरे रास्ते को छोड़कर हम लोग शत्रुता के रास्ते की ओर बढ़ चलते हैं।

इस मामले में हम सभी लोग विचित्र अवस्थाओं में जी रहे हैं। कुछ लोग प्रेम की तलाश में कस्तूरी मृग की तरह जिन्दगी भर भटकते रहते हैं। खूब जतन करते हैं प्रेम पाने का। किश्तों-किश्तों में प्रेम पा भी लेते हैं मगर फिर वही अन्तहीन भटकाव।

इसके लिए दूसरे लोग जिम्मेदार नहीं हैं। हमारे भीतर यदि प्रेम होगा तभी वह औरों के प्रेम तत्व को आकर्षित कर पाएगा। इस मामले में प्रेम चुम्बकीय आकर्षण की तरह होता है।

प्रेम के भरपूर खजानों से लक-दक होने के बावजूद हम लोग प्रेमहीन जिन्दगी जीते हुए रोजाना किसी न किसी संघर्ष में रमे रहते हैं और रोग, शोक, दुःख, अवसाद, पीड़ाओं तथा तनावों की भूमिका रचते रहते हैं।

खुद भी दुःखी रहते हैं और दूसरों को भी दुःखी करते रहते हैं।  अपने दुःख को कम आँकने के लिए हम औरों को पीड़ित करते हुए आनंदित होती हैं। यह उल्टी रीत की माया न काया के लिए ठीक है न जगत के लिए।

भगवान ने हर प्राणी को प्रेम से लबालब भर कर धरती पर भेजा है। बावजूद इसके हम यदि प्रेम का अनुभव न कर सकें, अपने भीतर के प्रेम भण्डारों का पता न पा सकें, उदारतापूर्वक प्रेम का यथार्थ प्रकटीकरण व वितरण न कर सकें तो इस जीवन का कोई अर्थ नहीं है।

इससे तो अच्छा है हम धरती खाली करें ताकि दूसरे अच्छे और प्रेम भाव वाले जीवों के जन्म लेने का मार्ग प्रशस्त हो सके। हमारे पास दुनिया भर में बाँटने के लिए अपार प्रेम भरा पड़ा है, उसे जानें और उपयोग करें।

पूरी उदारता और मुक्तमन से प्रेम बाँटें। किसी को दुश्मन न मानें क्योंकि हमारा दुश्मन कोई हो ही नहीं सकता। कोई हमारे मुकाबले दुनिया में होता ही नहीं जिसे हम दुश्मन मानें।

जिन्हें हम दुश्मन मानते हैं या जो लोग हमें दुश्मन मानते हैं वे दुश्मन न होकर विदूषक और मनोरंजनकर्ता हैं जो तरह-तरह के स्वाँग रचकर, दूसरों की भरी हुई तोप या गोला-बारूद की तरह फटकर हमारा मनोरंजन करने के लिए पैदा हुए हैं ताकि हमारे शुभ कर्मों और मांगलिक आयोजनों की गूंज दूर-दूर तक पहुंच सके।

इसलिए जगत भर को प्रेम की दृष्टि से देखें, प्रेम दें और प्रेमपूर्वक व्यवहार करें। भगवद् अवतार मावजी महाराज ने इसीलिए कहा है - प्रेम तुही ने प्रेम स्वामी, प्रेम त्यां परमेश्वरो।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

www.drdeepakacharya.com

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