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हिंदी में हाइकु (२) : स्वरूप और सम्भावनाएं / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

जापानी काव्य की एक विधा है- हाइकु. यह शायद संसार में लघुतम कविता का रूप है. प्रसिद्ध जापानी हाइकुकार यशुदा ने इसे ‘एक श्वासी कविता’ कहा है. हाइकु में कोई एक भाव या विचार या अनुभूति अभिव्यक्ति पाती है. अतः इसे मुक्तक काव्य की श्रेणी में रखा जा सकता है.

हाइकु एक त्रिपदी है. तीन पंक्तियों की भावोन्मेशित कविता है. लेकिन हर तीन पंक्ति की ककिता को हाइकु नहीं कहा जा सकता. इन तीन पंक्तियों का भी एक अनुशासन है. इनमें से प्रथम पंक्ति 5 द्वितीय 7 और त्रितीय भी प्रथम की तरह 5 अक्षरों की होती है. हिंदी हाइकु ने अब इस अनुशासन को लगभग स्वीकार कर लिया है. यह अनुशासन जापानी हाइकु रचनाओं के कलेवर से सर्वाधिक मेल खाता हुआ भी है, इस विधान में एक ध्वनि-तरंग सी उठती है जो हाइकु को एक प्रकार की लय से समृद्ध करती है. बेशक हाइकु अतुकांत होता है, लेकिन उसमें जो एक लय होती है वह हाइकु को एक अतिरिक्त सौंदर्य प्रदान करती है. हाइकु में कृत्रिमता नहीं होती, किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि वह सपट-बयानी से ग्रस्त है. एक अच्छे हाइकु में जो कहा गया है उससे अधिक अनकहा रह जाता है. सतही तौर पर हाइकु का जो कथ्य है प्रायः अपने आप में पूर्ण नहीं होता. यह सांकेतिक रूप से अधिक व्यापक सच्चाइयों की ओर संकेत करता है. इसलिए हाइकु कविता अधिकतर इकहरी नहीं होती. पर उसका कथ्य अपने को बोझिल और बनावटी होने से भी बचाए रखता है.

लेकिन क्या हर कविता जो 5-7-5 अक्षरों के अनुशासन को स्वीकार करती है,हाइकु की श्रेणी में रखी जा सकती है कलेवर की दृष्टि से इसे हम भले ही हाइकु कहें लेकिन जापान में हाइकु के साथ एक शर्त और भी है कि हाइकु रचनाओं में एक ऋतु-बोधक संकेत अवश्य होना चाहिए. इसे जापानी भाषा में ‘किगो’ कहते हैं, हिंदी में ऋतु-संकेत से युक्त अनेकानेक हाइकु लिखे गए हैं, लेकिन हिंदी ने किगो की शर्त से बंधना स्वीकार नहीं किया. किगो रहित हाइकु कलेवर की रचनाएं भी यहां हाइकु की श्रेणी में ही आती हैं. वस्तुतः कालांतर में जापान में भी एक अधिक उदारवादी दृष्टिकोण अपनाया गया और हाइकु के लिए किगो अनिवार्य नहीं रहा. पर हाइकु काव्य का प्रिय विषय प्रकृति रहा है. यह प्रकृति के मिस मनुष्य की भावनाओं को प्रकट करता है साथ ही प्रकृति, जिसका एक अंग मनुष्य भी है, के सौंदर्य को समेटने का प्रयत्न भी करता है. ऋतु वर्णन के लिए अनेक हाइकु प्रसिद्ध हुए हैं. इनमें प्रकृति के विविध रूपों और मनुष्य की भावनाओं को समान रूप से अभिव्यक्ति मिली है.

हाइकु अध्यात्म का वाहक भी है. यह जीवन के निचोड़ को प्रस्तुत करता है.जापानी हाइकुओं में ज़ेन-दर्शन की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति हुई है. शायद इसीलिए इसे अक्सर ‘सूक्ति-काव्य’ या ‘सूत्र-काव्य’ भी कहा गया है. रामचंद्र शुक्ल ने सूक्तियों को काव्य विरोधी माना है. हाइकु-काव्य इस मत को झुठलाता प्रतीत होता है. हाइकुओं में सूक्तियों का सफल और काव्यात्मक निर्वाह हुआ है.

इतना सब होते हुए भी हाइकु व्यावहारिक जीवन से कटा हुआ काव्य नहीं है.जापान में हाइकु और सेंर्यु (सेनरियु) में एक स्पष्ट भेद किया गया है. हाइकु के कलेवर में जब कवि सामाजिक विडम्बना और विरोधाभास पर छींटा कसता है, व्यंग्य करते हुए उनकी हंसी उड़ाता है, तो ऐसी रचनाओं को हाइकु नाम न देकर उन्हें सेंर्यु कहा गया है. स्पष्ट: कथ्य की दृष्टि से हाइकु और सेंर्यु में एक ऐसा भेद है जो एक ही कलेवर की रचनाओं को दो प्रारूपों में विभाजित करता है पर हिंदी में इस विभाजन को आमतौर पर स्वीकार नहीं किया गया है. सामाजिक संदर्भ से युक्त हास्य-व्यंग्य की हलकी-फुलकी रचनाओं को भी, जो हाइकु कलेवर को स्वीकार करती हैं, हिंदी जगत में हाइकु ही कहा गया है. यह उचित भी लगता है. केवल कथ्य की दृष्टि से हाइकु कलेवर की रचनाओं का एक अलग वर्ग तो हो सकता है और इस प्रकार कविताओं को कई वर्गों में रखा जा सकता है, लेकिन उन्हें एक अलग नाम देकर उन्हें एक स्वतंत्र पहचान देने के लिए ज़िद करना हिंदी जगत की उदार वृत्ति के अनुरूप नहीं है. हाइकु को ही यदि थोड़ी व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो उसमें सेंर्यु सम्मिलित किया जा सकता है. हिंदी हाइकु अपने समय की विडम्बनाओं और विसंगतियों की चोट करने से चूकता नहीं वस्तुतः जगत में ऐसा कोई विषय नहीं है जो हाइकु कविताओं के लिए अनुपयुक्त हो.

छोटी भले हो पर हाइकु रचना अपने आप में एक पूर्ण कविता है. किसी भी हाइकु का सम्बंध, उसको समझ पाने के लिए किसी अन्य हाइकु से नहीं होता. हर हाइकु अपने में स्वतंत्र होता है. यह ‘मोनेड’ (चिदणु‌) की तरह होता है. पूरी तरह गवाक्षहीन. वह दूसरी हाइकु-रचनाओं में तांका-झांकी नहीं करता. जैसे, उदाहरण के लिए हिंदी में दोहा अपने में स्वतंत्र होता है उसी तरह हाइकु भी है. दोहा-गीत नहीं लिखे जाते. दोहा मुक्तक काव्य है. दोहों का, हर दोहे का, अपना एक स्वतंत्र वजूद है. हाइकु रचना भी इसी तरह की होती है.

हिंदी में इन दिनों अनेक स्वनाम धन्य कवि हाइकुओं से गीत रच रहे हैं. कुछ ने तो हाइकु महाकाव्य और हाइकु खंड-काव्य तक रच डाले हैं. मुझे लगता है कि यह हाइकु की स्वतंत्र इकाई के साथ बड़ा अन्याय है.

आपको हिंदी में ऐसी अनेक हाइकु रचनाएं मिल जाएंगी जिनमें हाइकु के कलेवर का भी ध्यान रखा गया है और ऋतु-बोधक संकेत भी है, फिर भी उन्हें हाइकु कहने में संकोच होता है. इसका कारण है. हाइकु क्या, कोई भी अन्य कविता क्यों न हो, यह कविता इसलिए होती है कि उसमें काव्यतत्व होता है. अन्य काव्य रूपों की तरह हाइकु रचना भी एक कविता ही है और इसलिए उसमें काव्य-तत्व होना भी, कविता के नाते अनिवार्य है. हिंदी में इन दिनो हाइकु लेखन की बाड़ सी आई हुई है किंतु उनमें से अधिकतर काव्य-तत्व से पूरी तरह विहीन हैं. काव्य-तत्व से आशय मोटे तौर पर कथ्य की मौलिकता और अभिव्यक्ति के सौंदर्य से है.

एक विदेशी काव्य विधा होने के कारण हिंदी में हाइकु कविता को जो प्रतिष्ठा मिलना चाहिए थी शायद अभी तक नहीं मिली है. लेकिन हिंदी में अब यह विधा धीरे-धीरे परिपक्व होती जा रही है. यदि अंगरेज़ी काव्य के सॉनेट रूप को हिंदी अपना सकती है तो जापानी हाइकु विधा से भी परहेज़ करने का कोई कारण नहीं है. सच तो यह है कि अंगरेज़ी की अपेक्षा जापान की संस्कृति हिंदी-भाषियों और भारतवासियों के अधिक नज़दीक है. हिंदी के व्यापक विकास के लिए यह आवश्यक है कि जापान की ओर की खिड़कियां भी हम खुली रखें.

ऐसा माना जाता है कि भारत में हाइकु विधा का प्रथम परिचय गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर के माध्यम से हुआ. अपनी जापान यात्रा से लौटने के बाद उन्होंने अपनी यात्रा-पुस्तक में सर्व प्रथम हाइकु का उल्लेख किया था और साथ ही इसमें तीन जापानी हाइकु कविताओं के शाब्दिक अनुवाद भी प्रस्तुत किए थे. हिंदी में हाइकु का प्रारम्भ वर्ष 1956 में प्रकाशित अज्ञेय के काव्य संग्रह ‘अरी ओ करुणा प्रभामय’ से माना जाता है. इसमें चीड़ का खाका, खंड में सत्ताइस हाइकु कविताओं के अनुवाद हैं ये अनुवाद एक समर्थ कवि द्वारा हाइकु की भावाभिव्यक्ति को आत्मसात करके किए गए हैं और इसलिए हमें उनमें हर कविता के एवज़ में एक कविता प्राप्त हो जाती है.

हिंदी में सन 1960 के बाद क्षणिकाएं, कणिकाएं, सीपिकाएं आदि, नाम से ‘मिनी

कविताएं’ लिखी जाने लगीं जिनमें कुछ हाइकु की आत्मा के निकट तो थीं किंतु वे हाइकु के शिल्प-विधान का पालन नहीं करती थीं. अब यह एक संतोष का विषय है कि पिछले तीस-पैतीस वर्षों से हिंदी में हाइकु में 5-7-5 अक्षरों की मर्यादा का पालन करता शिल्प सर्वमान्य हो चुका है और भारत में हाइकु की पहचान बनने लगी है. इसका बहुत कुछ श्रेय जे.एन.यू के पूर्व आचार्य डॉ. सत्य भूषण वर्मा और बाद में भगवतशरण अग्रवाल, अहमदाबाद, को जाता है.

डॉ. सत्य भूषण वर्मा ने यद्यपि स्वयं हिंदी हाइकु कविताएं नहीं रचीं किंतु उन्होंने प्रसिद्ध जापानी हाइकुओं के मूल जापानी भाषा से हिंदी अनुवाद अवश्य किए हैं. जापानी कविता, नामक ग्रंथ में ये 1977 में प्रकाशित हुए. 1978 में डॉ. वर्मा ने भारतीय हाइकु क्लब की स्थापना की और एक अंतरदेशीय त्रेमासिक पत्र ‘हाइकु’ नाम से प्रकाशित करना आरम्भ किया. हिंदी में हाइकु लेखन के लिए यह बहुत प्रेरक सिद्ध हुआ. 25-30 अंकों के प्रकाशन के बाद यह बंद हो गया. हिंदी का प्रथम हाइकु संग्रह 1985 में छपा. यह डॉ. भगवतशरण अग्रवाल का ‘शाश्वत क्षितिज’ शीर्षक से है. डॉ. अग्रवाल ने बाद में एक ‘हाइकु भारती’ त्रैमासिक पत्रिका भी निकाली. इससे भी हाइकु लेखन को बड़ा प्रोत्साहन मिला.

शाश्वत क्षितिज के बाद हिंदी में अनेकानेक हाइकु संकलन निकल चुके हैं और कुछ हाइकुकारों ने अपनी पहचान भी बनाई है.

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