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वर्दी / कहानी / गोविन्द सेन

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ठो...ठो...ठो...। मकान की नींव हिलने लगती है। दीवारें काँपने लगती हैं। बाबूजी के मुख से पड़ोसी के लिए गालियाँ फूटने लगती है। ’ठोकी-ठोकी नऽ भ...

ठो...ठो...ठो...। मकान की नींव हिलने लगती है। दीवारें काँपने लगती हैं। बाबूजी के मुख से पड़ोसी के लिए गालियाँ फूटने लगती है। ’ठोकी-ठोकी नऽ भीतड़ो ओदार दगा रे भई।’ माँ कुढ़ने लगती है। मेरा कलेजा काँपने लगता है कि कहीं भीत धँस ही न जाए। धमनियों और शिराओं में रक्त-प्रवाह तेज हो जाता है। नींद उड़ जाती है। यह रोज की त्रासदी है।

भीलों के इस अवार में बात-बात पर सिर फूट जाते हैं। तीर, कामठी और फालिए निकल आते हैं। पत्थरबाजी होने लगती है। अंधाधुंध माँ-बहन की गालियों का आदान-प्रदान होने लगता है। पीढ़ियों तक रंजिशें चलती हैं। ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब दारू पीकर किसी न कुर्राटी नहीं भरी हो और गाली-गलौच नहीं की हो।

गाँव में हमारी जाति का एक ही घर है। हम तो इस अवार में ऐसे रहते हैं जैसे बत्तीस दाँतों में अकेली जीभ। एक-एक कदम फूँक-फूँक कर रखना पड़ता है। कई बार हमें कटु अनुभवों से गुजरना पड़ता है। सदा एक आतंक से घिरे रहते हैं हम।

मुझे रह-रहकर बाबूजी पर खीज आती है कि क्यों उन्होंने इस अवार में मकान बनाया? क्या गाँव भर में यही जगह बची थी रहने योग्य। लेकिन फिर अपनी ही बुध्दि पर तरस आता। पहली बात तो मौके की जमीन मिलना ही मुश्किल और मिलती भी है तो उसे खरीदने की हैसियत नहीं है हमारी। जानता हूँ बाबूजी ने मकान बनाने में अपनी एक-तिहाई जिन्दगी खपा दी है और माँ के पास एक भी जेवर बचा नहीं था। घर बनाना कोई हँसी-खेल थोड़े ही है।

न्हारसिंग बरसों से हमारे पड़ोस में रहता रहा है। उसके पास अवार में सबसे अधिक खेती-बाड़ी और पशु हैं-दो कोड़ी बकरियाँ और आधा दर्जन ढोर-डंगर। गोपनीय रूप से दारू की भट्टी भी लगा रखी थी जिससे अतिरिक्त आय होती थी। शरीर से हट्टा-कट्टा था। उसे अपनी सुदृढ़ आर्थिक स्थिति और शारीरिक बल का बहुत गुमान था। उससे दुगुनी ठसक उसकी माँ ’दलु माय’ में थी। बेटे और बवड़ी को अपनी आँखों के सामने धम्म-धम्म काम करते देख वह फूले न समाती। न्हारसिंग ने अपनी घरवाली के सहयोग से आधा दर्जन बच्चों का उत्पादन कर लिया था। दलु माय इन बच्चों की बाल-सुलभ चेष्टाएँ देखती तो प्रमुदित हो उठतीं। अवार में है किसी के ऐसे ठाठ।

जब हमारा मकान बना तो न्हारसिंग ने हमारी भीत के सहारे गुवाण बना ली। मना करने के बावजूद भीत के गोड़ में खूंटे गाड़ दिये। ढोर वहाँ बंधने लगे। इस तरह ढोरों द्वारा भीत को ठोकने का सिलसिला चल निकला। गाय और बैलों की अपेक्षा भैसों को भीत ठोंकना अधिक प्रिय था। शायद उन्होंने भीत को धँसाने का संकल्प ले रखा था।

अपने खून-पसीने से बने घर को कोई इस निर्ममता से ठोके तो बोलो क्या गुजरेगी। लेकिन लड़ाई-झगड़े के डर से मन मसोस कर रह जाना पड़ता है। पानी में रहकर मगर से बैर लेना ठीक नहीं। लेकिन यह सब कुछ सहा भी तो नहीं जाता।

हमने कई बार न्हारसिंग को इस बाबद कहा था। एक बार सरपंच से भी कहलवाया। लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ। उल्टे हम जब भी उसे कुछ कहने जाते तो गालियों से हमारा स्वागत होता। दलुमाय तो ऐसी गंदी-गंदी गालियाँ देती कि कान के कीड़े झड़ जाए। कहती-‘डोबड़ा हम हमरी जमीन माय बांदा तुंधरी थोली।’ अब उसे कौन समझाए कि जमीन तुम्हारी है लेकिन भीत तो हमारी है। तुम भले ही भीत के आसरे रहो लेकिन उसे यूँ नुकसान तो न पहुँचाओ। रोज ठोंककर हमारी नींद तो न उड़ाओ।

ठो...ठो...ठो...ढोरों ने भीत को ठोकने की गति बढ़ा दी तो मुझसे रहा न गया। मुझे जाकर कहना पड़ा-’न्हारसिंग थारा हाथ जोड़ू इनी गुवाण ख हेड़ द नी तो यो भीतड़ो ओदर जायगा। सुण ल भई नी तो हवं जाप्ता सी एकी कारवाइ करूँगा।’ लेकिन न्हारसिंग के कान पर जूँ तक न रेंगी, वह इत्मीनान से बीड़ी पीता रहा जैसे उसने मेरी आवाज को सुना ही न हो। दलुमाय एकदम भभक उठीं-’ए जा तार ती होय जो कर लेजी। हमरा डोबड़ा तो हँयाज बंदायसऽ।’

सुनकर मैं सन्न रह गया। मुझे अपना क्रोध निगलना पड़ा। यदि मैं भी भभक उठता तो संभव था कि हाथापाई की नौबत आ जाती। संभव था कि मैं फालिए से झटका दिया जाता या तीर से छलनी कर दिया जाता। कुछ भी घटित होना असंभव नहीं था क्योंकि वे जानते थे कि हम सज्जन लोग तीर-कामठी या फालिया तो चला नहीं सकते। फिर हमारी ओर बोलने वाला भी कौन था? ये तो उन्हीं का अवार था।

बेजान टाँगों से जब मैं लौटने लगा तो न्हारसिंह के बच्चे मुझे लयबध्द रूप से चिढ़ाने लगे-‘तारो भीतड़ो ओदारसु रऽ...तारो भीतड़ो ओदारसु।’ न्हारसिंग, उसकी घरवाली और दलुमाय इस दृश्य को इत्मीनान से देखते रहे।

अनेक कटु अनुभवों की कड़ी में एक अनुभव और जुड़ गया। अवार ही नहीं पूरे गाँव के प्रति मेरी नफरत और बढ़ गई। नौकरी मिलने के बाद इस गाँव में टिकना नहीं है। मैंने सोच लिया था।

लेकिन नौकरी मिलना भी कोई इतना आसान काम है। हायरसेकण्डरी किए हुए कोई तीन साल हो गए थे लेकिन अभी तक बेरोजगारी का भुगत रहा था। साल-दर-साल ओव्हर एज होने का डर बढ़ता जा रहा था। उम्मीद बुझती नजर आती जा रही थी। बिल्कुल निराश के अंतिम छोर पर था। पिछले दिनों रोजगार कार्यालय से आरक्षक पद हेतु इंटरव्यू काल आया था। शायद इस बार मेरा भाग्य जोर कर जाए। उम्मीद का एक नया बीज चुपचाप अंकुरित हुआ था मन में। पता नहीं कैसे मेरे भाग्य ने करवट बदली। मेरा सेकण्ड डिवीजन और खेलकूद के प्रमाण पत्र सार्थक हो गए। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। आरक्षक पद के लिए मेरा चयन हो गया। मेरे पुलिस बनने की खबर जंगल की आग की तरह गाँव के एक सिरे से दूसरे सिरे तक फैल गई।

साल भर बाद जब गाँव लौटा तो मेरा व्यक्तित्व प्रभावशाली हो गया था। चेहरे पर छायी रहने वाली मुर्दनी के स्थान पर अब रौब और आत्मविश्वास था। शरीर की मांसपेशियाँ उभर आई थीं। मूँछे घनी हो गई थीं। लोग मेरी खाकी वर्दी और निखरे रूप-रंग को मुग्ध भाव से देख रहे थे। वे मेरे लिए बिछे जा रहे थे। अवार के जुआरी अब खुले आम जुआ खेलने में हिचकने लगे थे। आसपास के लोग मुझे ’हेडसाब’ कहने लगे थे। बाबूजी भी अब सबके लिए मोटला बाबा हो गए थे।

ठो...ठो...ठो...! आज जब मैंने ठो-ठो की आवाज सुनी तो मेरा पुलिसिया खून खौलने लगा। मैं दन्न से उठा और सीधा न्हारसिंग के आँगन में जा पहुँचा।

‘न्हारसिंग कल ये गुवाण नहीं दिखना चाहिए। वरना ठीक नहीं होगा...समझा।’

मैंने जानबूझकर खड़ी बोली का प्रयोग किया। उन्हें पहली बार मेरी आवाज बुलंद और कड़क लगी होगी। मुझे भी अपने-आप पर आश्चर्य हो रहा था कि मेरी पहले वाली मरियल आवाज कहाँ खो गई।

‘हव! तू बट तऽ खरी भाय।’ आशा के विपरीत न्हारसिंग का स्वर कोमल और आत्मीय था। दलुमाय और न्हारसिंग मुझसे बैठने का आग्रह करने लगे। खाट पर भड़कीले रंग की खोल चढ़ी गुदड़ी बिछाकर मुझे बैठा दिया गया। एक बच्चे को दौड़ाकर पास की दुकान से मेरे लिए सिगरेट मँगवा ली गई। भीत ठोकने वाली भैंसों को छोड़कर न्हारसिंग दूसरे स्थान पर बाँधने लगा।

‘काल त ह्याँती गुवाणुज हेड़ देसु रऽ बेटा।’ दलुमाय ने नम्रता से कहा। मैं उनके बदले रूप को तीव्रता से महसूस कर रहा था।

दलुमाय खाट की बगल में उकड़ू बैठ गयी। कहने लगी-’हँय तऽ तू पुलिस बण गयो रऽ बेटा’। मैं दलुमाय की चतुराई को समझ रहा था। भाँप रहा था कि उसके मन में मेरे प्रति वात्सल्य क्यों उमड़ रहा है। मैंने सिगरेट का गहरा कश ले कर ढेर सारा धुँआ उगला। कुछ धुँआ मेरी घनी मूँछों में उलझ कर रहा गया।–‘हव माय न दुई चार साल मँऽ थाणदार अळी बण जाइस।’ मैंने अंधेरे में आत्मविश्वास के साथ तीर चलाया।

दलुमाय ने मन ही मन इस सूचना को नोट कर लिया था। निशाना ठीक बैठा था। बच्चे अगल-बगल से मुझे देख रहे थे। न्हारसिंग की घरवाली किवाड़ की आड़ लेकर घूँघट से दो अँगुलियों का झरोखा बना मुझे देख रही थी। मैं सबके आकर्षण का केन्द्र बना हुआ था। न्हारसिंग और दलुमाय के चेहरे पर हल्का-सा भय पुत गया था। वे मन ही मन डर रहे थे कि मैं कहीं उनकी दारू की भट्टी न पकड़वा दूँ या किसी केस में फँसवा कर जेल की हवा न खिला दूँ।

सुबह न्हारसिंग का बड़ा छोरा लोटा भर गाढ़ा दूध दे गया। पैसे देने लगा तो इंकार करके भाग गया। पहले मजबूरी में जब वहाँ से दूध लाते थे तो उसमें आधा पानी होता। पूरे पैसे देने के बावजूद शुध्द दूध नहीं मिलता। कलेजा जलकर राख हो जाता था लेकिन क्या करते, आखि़र गरज हमारी ही थी।

लेकिन अब तो दलुमाय का स्नेह दिन-ब-दिन गाढ़ा होता जा रहा था। आए दिन कुछ न कुछ भेंट-पूजा हो ही जाती। कभी हरे भुट्टे दे जाते तो कभी हरी सब्जियाँ तो कभी कुछ और। रक्षाबंधन के दिन न्हारसिंग की घरवाली ने एक बड़ी राखी बाँध मुझे भाई बना लिया। अब न्हारसिंग के बच्चे मुझे ‘मामा-मामा’ कहने लगे थे।

अब भीत सुरक्षित थी। मैंने सोचने लगता हूँ ये वर्दी न होती तो...। मैंने मन ही मन वर्दी को धन्यवाद दिया।

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-193,राधारमण कॉलोनी, मनावर, जिला-धार(म.प्र.) पिन-454446

मो. 09893010439

ईमेल-govindsen2011@gmail.

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रचनाकार: वर्दी / कहानी / गोविन्द सेन
वर्दी / कहानी / गोविन्द सेन
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