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परीक्षा की घड़ी - व्यंग्य - अरविन्द कुमार खेड़े

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बाइबिल में प्रार्थना आती है,हे पिता ! हमें परीक्षा में न डाल, वरन बुराई से बचा ।“ देख लो, बंदा परमात्मा से हाथ जोड़कर विनती कर रहा है । यह भी बता रहा है कि, इसके बाद भी यदि आपने परीक्षा में डाल दिया तो, उसके बाद जो होगा, उसके लिए हम जिम्मेदार नहीं हैं । हमें नाहक दोष न देना । क्यों कि, हमनें तो पहले ही कह दिया था । हम तो पहले से ही कह रहे थे । हम तो पहले से ही कहते आ रहे थे कि, हमें परीक्षा में न डालो । लेकिन आप सुनो जब न ? बस...हमेशा अपने फायदे की बात ही सुनते रहते ही । कभी-कभी कायदे की बात भी सुन लिया करो । लेकिन सुनो तब न ? बस तभी से परीक्षा और बुराई के बीच चोली-दामन सा रागात्मक संबंध स्थापित हो गया है ।

हमारे साहित्य के शिरोमणि तो इस मामले में बेहद उदार निकले । उन्होंने किसी को भ्रम में नहीं डाला । अच्छे-बुरे के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद में नहीं उलझाया । सीधे-सीधे सारी शंकाओं- कुशंकाओं के सारे आवरण ही हटा दिये । खरी-खरी दो टूक कहकर भक्तों को तार दिया कि,परीक्षा में त्रिलोकी की बुरी बला भरी पड़ी है ।“ अब समझने वाले समझ गये, जो ना समझे वे अनाड़ी साबित हुए ।

इसलिए साहित्य के आचार्य जी के वचन को शिरोधार्य करते हुए भक्तगण परीक्षाओं में जुगत में रहते हैं । किसी भी तरह से इस बुरी बला से निपटना है । नहीं तो सारी जिंदगी सिर पीटना है । यदि नहीं निपटे और पढ़ लिख गये, और कहीं डाक्टरेट, पीएचडी हो गये तो बाबू चपरासी का ओहदा पा लेगें । फ़िर खाते रहो उम्र भर । और यदि जुगत भिड़ा ली तो सात पीढि़यों तक ऐश ही ऐश । ऐश्वर्या ही ऐश्वर्या । इसलिए यही तो असली परीक्षा की घड़ी है । बल्क़ि यूँ कहें की ज़िंदगी के इम्तिहान की घड़ी है ।

अब इम्तिहान का दौर चल रहा हो, और बेचारे मास्टरजी सूख कर कांटा न हो तो वह काहे का मास्टरजी ? सरकार ने साल भर तो मास्टरजी से कोल्हू के बैल की तरह काम कराया । कभी इधर झौंका तो कभी उधर फूंका । और ऐन परीक्षाओं के समय सरकार को सुध आती है । सरकार को याद आता है, अरे ! बंधुआ मजदूरी के तो दिन लद गए हैं ? मास्टरजी की रस्सी छोड़ दी जाती है । छुट्टा कर दिया । अब बेचारे मास्टरजी खुद इम्तिहान के दौर से गुजरने लगते हैं । जीरो रिजल्ट रहा तो सरकार का कोप भाजन बनना पड़ेगा । बच्चों की ओर इस आशा से ताकते कि, बच्चो ! अब आप ही अब हमारे तारणहार हो । देखना, हमारी लुटिया न डूबो देना बच्चो । सरकार ने तो हमें निचोड़ लिया है । कहीं का नहीं छोड़ा है ।

बच्चे उत्साह से भर उठते हैं । सोचते हैं, यही मौका है कुछ कर गुजरने का । कुछ दिखाने का । क्योंकि डर के आगे जीत है । बच्चे भी ताव देकर मास्टरजी को तसल्ली देते हैं, मास्टरजी आप चिंता न करो । हमारे होते हुए आपकी लुटिया डूबे तो लानत है हम पर ? वचन देते हैं । अंगूठा भी दे दिये होते । लेकिन क्या करें मास्टरजी ? मजबूरी है । लिखना जो है । यदि अंगूठा दे दिया तो कलम कैसे पकड़ेगे ?

तो भईया, आप बिचारे बच्चों को नाहक दोष देते हो । बच्चे तो युगों-युगों से अपना वचन निभाते आ रहे हैं । अपने मास्टरजी की साख बचाते आ रहे हैं । डूबती लुटिया बचाते चले आ रहे हैं । बेचारों को क्या-क्या नहीं करना पड़ता अपने मास्टरजी के लिए ? कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं ? सिर्फ इसलिए कि, अपने मास्टरजी की पढ़ाई पर कोई उंगली न उठाये । कोई ये न कहे कि, पढाया-लिखाया कुछ नहीं ? बस बैठ-बैठे पगार लेते रहे । वरना अध्यक्ष-उपाध्यक्ष, विधायक, मंत्री-संत्री बनने के लिए कौन-सी ससुरी पढ़ाई-लिखाई की जरूरत है ? बताओ तो भला ? ये क्या बात हुई ?

-अरविन्द कुमार खेड़े

मोबाइल नंबर-09926527654

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परिचय-

नाम- अरविन्द कुमार खेड़े (Arvind Kumar Khede)

आत्मज-श्रीमति अजुध्या खेड़े / स्व.श्री रेवाराम जी खेड़े

वर्तमान पता- २०३ सरस्वती नगर, धार, जिला-धार, मध्य प्रदेश-४५४००१ (भारत)

जन्मतिथि- २७ अगस्त,१९७३

शिक्षा-एम.ए.

सम्प्रति- शासकीय नौकरी.

विभाग- लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग मध्य प्रदेश शासन.

पदस्थापना- कार्यालय मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, धार जिला धार मध्य प्रदेश-पिन-४५४००१ (भारत)

प्रकाशन-

1-पत्र-पत्रिकाओँ में रचनाएं प्रकाशित.

2-कविता कोष डॉट कॉम एवं हिंदी समय डॉट कॉम में कविताएं एवं व्यंग्य सम्मिलित.

3-साझा कविता संकलनों में कविताएं प्रकाशित.

(समय सारांश का-संपादन-बृजेश नीरज/अनवरत भाग-२-संपादन-भूपाल सूद/काव्यमाला-संपादन -के.शंकर सौम्य )

4-व्यंग्य संकलन-भूतपूर्व का भूत-अयन प्रकाशन दिल्ली-२०१५

5-निकट भविष्य में एक व्यंग्य एवं एक काव्य संग्रह के प्रकाशन की सम्भावनाएं हैं.

मोबाइल नंबर-९९२६५२७६५४

ईमेल- arvind.khede@gmail.com

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