आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

लघुकथा / सब के लिए / सुशांत सुप्रिय

बात इतनी पुरानी है कि वे शब्द , जो उसे बयान कर सकते , अब हर भाषा के शब्द-कोष से खो चुके हैं । बात इतनी नई है कि उसे बताने के लिए जो अभिव्यक्ति चाहिए वह अभी किसी भी भाषा में ईजाद ही नहीं हुई है । इसलिए मजबूरी में अब मुझे उपलब्ध शब्दों से ही काम चलाना पड़ रहा है ।

वह जैसे दूध के ऊपर जमी हुई मलाई थी । वह जैसे मुँह में घुल गई मिठास थी । वह जैसे सितारों को थामने वाली आकाश-गंगा थी । वह जैसे ख़ज़ाने से लदा एक समुद्री जहाज़ थी जिसकी चाहत में समुद्री डाकू पागल हो जाते थे । उसके होठ इतने सुंदर थे कि आवाज़ का मन नहीं करता कि वह उनके बीच से हो कर बाहर आए और इस प्रक्रिया में होठों को थोड़ा मलिन कर जाए । उसकी आँखें इतनी सुंदर थीं कि सभी दृश्य उन्हीं में बस जाना चाहते थे । उसका मन इतना सुंदर था कि वह अपने लिए नहीं , औरों के लिए जीती थी । वह स्त्री थी ।

वह माँ थी तो मकान घर था । वह बहन थी तो भाइयों की कलाइयों पर राखी थी । वह बेटी थी तो घर में रौनक़ थी । वह पत्नी थी तो थाली में भोजन था , जीवन में प्रयोजन था ।

अकसर उसके मन के पके घाव उसकी आँखों में से बाहर झाँक रहे होते । उसके घुटनों पर दर्द का शिशु झूल रहा होता । उसके मन का आकाश जब भर आता तो वह उसी पर बरस पड़ता । चिड़िया की चोंच में भरा होता है जितना जल , बस उतनी ही ख़ुशी थी उसके जीवन में ।

एक दिन पुरुष घर आया पर उसे स्त्री कहीं नहीं दिखी । दरअसल स्त्री घर बन गई थी अपने पति और बच्चों के लिए । दरअसल स्त्री एक फलदार और छायादार वृक्ष बन गई थी पुरुष के लिए । दरअसल स्त्री रोटी बन गई थी , कपड़ा बन गई थी , बिस्तर बन गई थी , पालना बन गई थी ...लेकिन पुरुष के पास वे आँखें ही नहीं थीं कि वह स्त्री को पहचान पाता ।

यह दुनिया के सारे पुरुषों की कथा है । यह दुनिया की सारी स्त्रियों की व्यथा है ...

------------०------------

 

प्रेषकः सुशांत सुप्रिय

A-5001 ,

गौड़ ग्रीन सिटी ,

वैभव खंड ,

इंदिरापुरम ,

ग़ाज़ियाबाद - 201014

( उ. प्र. )

मो: 8512070086

ई-मेल: sushant1968@gmail.com

टिप्पणियाँ

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.