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संतुलन रखें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में - डॉ. दीपक आचार्य

 पुरुषार्थ चतुष्टय मनुष्य के जीवन का मूलाधार है और इसी के अनुरूप पूरी जीवन यात्रा चलती है। पुराने जमाने में इंसान की औसत आयु सौ वर्ष मान कर उसी के अनुरूप जीवन को आयु के अनुरूप चार भागों में 25-25 वर्ष के लिए विभक्त किया गया था।

इसी के अनुरूप आश्रमों का निर्धारण था। ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम और संन्यासाश्रम। इसी प्रकार पुरुषार्थ चतुष्टय भी मानव जीवन की मर्यादापूर्ण परिधियों का अहम अंग रहा है।

हर व्यक्ति का जीवन यदि इन चार स्तंभों पर केन्दि्रत और अनुशासित रहे तो कोई कारण नहीं कि हम जीवन के सभी लक्ष्यों में सफलता हासिल न कर पाएं। यही पुरुषार्थ चतुष्टय यानि की धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जीवन को ऊँचाइयां देने का आधार है।

इन आधारशिलाओं पर दृढ़ रहकर कर्म किया जाए तो इंसान के लिए वह सब कुछ प्राप्य हो सकता है जो कि इच्छित होता है। आश्रमों के अनुरूप जीवनयापन कर पाना आज के जमाने में कठिन कार्य है लेकिन पुरुषार्थ चतुष्टय को अपनाया जाए तो कई समस्याओं, विपदाओं, तनावों और सम सामयिक अवरोधों से दूर रहा जा सकता है।

आम आदमी की तमाम समस्याओं और तनावों, मानसिक एवं शारीरिक बीमारियों का एकमात्र कारण यदि कुछ है तो वह है धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के बीच असन्तुलन। इन चारों पायों के बीच जितना अधिक संतुलन होगा, जितने प्रतिशत बराबरी का अनुपात रहेगा, तभी तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहता है।

जैसे ही यह अनुपात गड़बड़ाता है, सारा संतुलन अपने आप बिगड़ जाता है और यहीं से शुरू होता है दैहिक, दैविक और भौतिक संतापों का संत्रास। चारों ही आधारों को समान समय, श्रम, आधार व महत्व दिया जाना जरूरी है तभी हम निरापद, सुखी और समृद्ध जीवन प्राप्त कर सकते हैं। इनके बिना जीवन निरर्थक होने के सारे द्वार खुले रहते हैं।

आज के इंसान के सभी प्रकार के दुःखों का मूल कारण यही है कि वह चार पुरुषार्थों में से केवल दो पर ही भरोसा करने लगा है और इन दो के जंजाल में इतना अधिक फंसा हुआ है कि वह इनसे आगे निकल ही नहीं पा रहा है।

धर्म आरंभिक और मोक्ष अंतिम आधारशिला है जिनके प्रति हम लोग उदासीन हो गए हैं और इनकी बजाय हमने अर्थ और काम को अधिक महत्व दे डाला है। जिस अर्थ और काम में धर्म न हों, वह सभी प्रकार के अधर्मी हो जाता है और इस वजह से मोक्ष प्राप्ति के द्वार भी खुल नहीं पाते।

धर्मपूर्वक जीवन निर्वाह करने वाले लोगों को ही मोक्ष प्राप्त हो सकता है। अधर्माचरण  के साथ अर्थ कमाने वाले और काम में रमे रहने वाले लोग कभी भी मोक्ष प्राप्त नहीं कर पाते। मोक्ष का आशय मृत्यु के बाद जन्म लेने की विवशता का समाप्त होना नहीं है बल्कि मोक्ष का सीधा सा अर्थ है सांसारिक श्रेणियों से ऊपर उठ जाना जहाँ विरक्ति का चरमोत्कर्ष हर मामले में पूर्ण अनासक्त बनाए रखे और किसी भी व्यक्ति या वस्तु अथवा संसार के प्रति किंचित मात्र भी मोह न रहे।

जीवन के सारे वैषम्य के लिए इन चारों आधारों को ही जिम्मेवार माना जा सकता है। इस श्रृंखला से जुड़े चारों पायों के बीच गहरा अन्तः संबंध है। इनमें से एक-एक को पूर्णता के साथ भी प्राप्त किया जा सकता है और एक-दूसरे को पृथक रख कर भी।

जब धर्म की बात करें, धर्म में रमे रहें, इस समय  अर्थ और कर्म को विस्मृत कर जाएं, केवल धर्म मार्ग से मोक्ष प्राप्ति का ही चिन्तन-मनन करते रहें। जब अर्थ में रमे हों तब धर्मपूर्वक अर्थार्जन के प्रति जवाबदेह रहें, काम के विविध पक्षों का निर्वाह ईमानदारी से करें और जब अर्थ एवं काम में परितृप्ति का स्तर प्राप्त कर लें तब धर्माचरण को सर्वोपरि रखते हुए मोक्ष मार्ग का अनुसरण करें। 

आजकल काम और अर्थ को इतना अधिक महत्व दे दिया गया है कि हम धर्म और मोक्ष को पूरी तरह भुला बैठे हैं और केवल शरीर तथा संग्रहण को ही जीवन मान चुके हैं। चारों पक्षों को रोजाना बराबर समय दें। उतना न दे सकें तो जितना संभव हो उतना समय धर्म और मोक्ष के लिए निकालें। इसके बिना काम और संचित अर्थ का कोई उपयोग नहीं हो पाएगा।  पुरुषार्थी बनें, पुरुषार्थ चतुष्टय को जीवन में उतारें और महा आनंद की भावभूमि प्राप्त करें।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

www.drdeepakacharya.com

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