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कहानी / मुक्ति / रमाकांत यादव

कहानी - ( मुक्ति)

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रविवार का दिन था. सुबह के 9 बज रहे थे. सीमा किताब पढ़ने मेँ मशगूल थी.

अचानक डोर बेल बज उठा. उसने दरवाजा खोल दिया.सामने सूरज को देखकर वह चौँक पड़ी,"अरे !सूरज तुम"

"हाँ मै ,कल तुम कालेज क्योँ नहीँ आई ?"

"कुछ जरूरी काम था"

"कल आओगी ना "

"हाँ"

"अच्छा तो अब मै चलता हूँ ,अपना खयाल रखना."इतना कहकर मोहब्बत भरी निगाहोँ से देखते हुए सूरज अपने घर की तरफ चल पड़ा.

सीमा बी.ए प्रथम वर्ष की छात्रा थी.सूरज उसके साथ ही पढ़ता था. दोनोँ एक दूसरे की मोहब्बत मेँ गिरफ्तार थे.

सीमा जब पाँच बरस की थी ,तभी उसके माता -पिता का देहांत हो गया था.माता -पिता के देहांत के बाद सीमा के चाचा-चाची ही उसके सब कुछ थे मगर वे उसके साथ जानवरोँ जैसा बर्ताव करते थे.चूल्हा-चौका से लेकर जानवरोँ के चारे-पानी तक के सभी काम उसी के जिम्मे थे.सही वक्त पर काम न निपटाने पर उसे तरह-तरह के ताने सुनने पड़ते थे,"अभागिन कहीँ की,पहले माँ-बाप को खा गई अब हमारे पीछे पड़ी है.इस कलमुँही को तो मौत भी नहीँ आती"

चाचा 10 दिनोँ के लिए अपने मायके गई हुई थीँ.चाचाजी भी दो दिनोँ से घर से गायब थे.सूरज के जाने के लगभग दो घंटे बाद चाचाजी ने घर मेँ कदम रखा.उनके कपड़े अस्त-व्यस्त थे. बाल बिखरे हुए थे.मुँह से शराब की दुर्गन्ध आ रही थी. माथे पर पसीने की बूँदे चमचमा रही थीँ . कपड़े बदलने के बाद वे सीमा के बगल मेँ आकर बैठ गए.सीमा उठ खड़ी हुई और डरते हुए उसने पूछा,"चाचाजी ,पिछले दो दिनोँ से कहाँ थे आप?

"तुमसे मतलब? मै कहाँ जाता हूँ और क्या करता हूँ .तुम सिर्फ अपने काम से मतलब रखा करो वरना तुम्हारी पढ़ाई छुड़वा दूंगा होश ठिकाने आ जाएगा."

सीमा चुप हो गई क्योँकि वह पढ़ लिखकर आत्मनिर्भर बनना चाहती थी.उसकी आँखोँ से आँसू निकल आए. वह दीवार पर टंगी अपने माता-पिता के तस्वीर को निहारने लगी.

"अब खड़ी-खड़ी मेरा मुँह क्या देख रही है, जाकर मेरे कपड़े साफ कर दे काफी मैले हो गए हैँ."चाचाजी ने आदेश दिया.

"जी चाचाजी"कहकर वह बुझे मन से बाथरूम की तरफ चली गई.

कपड़े धोते हुए उसे यह महसूस हुआ कि कोई उसके बालोँ को सहला रहा है. पलटकर देखा तो हैरान रह गई . सामने चाचाजी खड़े थे.

"चाचाजी आप यहाँ?"

"चुप"चाचाजी ने अपने होँठोँ पर उंगली रखकर चुप रहने का इशारा किया. सीमा अपने चाचाजी के मनसूबे को भाँप गई.वह बाथरूम से निकलना ही चाहती थी कि चाचाजी ने उसका रास्ता रोक लिया.

"आखिर आप चाहते क्या हैँ?"सीमा को गुस्सा आ रहा था.

"तुम्हारा प्यार "चाचाजी के चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी.

सीमा को अपने पिता समान चाचा से ऐसी उम्मीद न थी.उसने चाचाजी के गाल पर दो थप्पड़ जड़ दिए और धिक्कारते हुए कहा,"बस, चाचा बस . मै आपको इतना नीच और कमीना इंसान नहीँ जानती थी . मै अब इस घर मेँ एक पल भी नहीँ रुकना चाहती"कहते-कहते सीमा घर से बाहर निकल गई.

संध्या का समय था. सीमा अपने बोझिल कदमोँ से रेलवे स्टेशन की तरफ बढ़ रही थी.वह शायद आत्महत्या का निर्णय ले चुकी थी.उसे प्लेटफार्म नं 1 पर तेजी से आती हुई एक ट्रेन दिखाई पड़ी. अपने दिल पर पत्थर रखकर वह ट्रेन के सामने कूदने ही वाली थी कि किसी ने पीछे से उसका हाँथ पकड़ लिया.

"छोड़ दो मुझे,मै अब एक पल भी नहीँ जीना चाहती"सीमा चीख पड़ी.

"सीमा ,होश मेँ आओ .देखो मैँ तुम्हारा सूरज"

सूरज को सामने देखकर वह फफक पड़ी और उससे लिपट गयी. सीमा की व्यथा सुनकर सूरज की भी आँखेँ नम हो गईँ.

"सूरज,तुम इस वक्त रेलवे स्टेशन पर?

"हाँ, मुम्बई से मेरे मम्मी -पापा आने वाले हैँ ,उन्हीँ को रीसीव करने आया था. सीमा,अब तुम्हेँ आत्महत्या करने की कोई आवश्यकता नहीँ है. हम कल ही शादी कर लेँगे "

"तुम्हारे मम्मी -पापा क्या मुझ अभागिन को स्वीकार करेँगे ?"

"क्योँ नहीँ बेटी ? तुम जैसी भी हो हमेँ स्वीकार हो "हाँथोँ मेँ सूटकेस लिए सूरज के मम्मी -पापा बोल पड़े.

"अरे,मम्मी-पापा आप लोग कब आए ?" सूरज चौँक पड़ा.

सूरज की माँ बोली,"बस बेटा,अभी पाँच मिनट पहले. हम कल ही तुम्हारी शादी इस चाँद के टुकड़े से कर देँगे."

"बेटा सूरज, तुम्हारी पसंद लाखोँ मेँ एक है" सूरज के पापा ने भी अपनी भावनाओँ को उजागर किया.

सीमा सूरछ के माँ-बाप के कदमोँ मेँ गिर पड़ी.आज उसे नरकीय जीवन से हमेशा के लिए मुक्ति मिल गयी थी.

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रचनाकार-'रमाकांत यादव"

जन्म-01021996

योग्यता -इण्टरमीडियट

प्रकाशन-पहली रचना 'वक्त की आवाज' दैनिक जागरण अखबार मेँ प्रकाशित

पता-नरायनपुर,नेवादामुखलिशपुर,बदलापुर,जौनपुर,उत्तर प्रदेश-222125

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