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लाइन / कहानी / डॉ. अपर्णा शर्मा

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फोन बिल के काउण्टर पर पुरुषों की लम्बी कतार थी। अभी सुबह के दस ही बजे थे यह महिलाओं की घरेलू व्यस्तता का समय था। अतः महिला कतार में केवल चार महिलाएं थी। नम्बर तीन व चार की महिलाएं अभी आकर कतार में लगी थी। तीन नम्बर महिला हाँफ रही थी। लगता था वह थोड़ी दूर से पैदल चलकर आई है। उम्र चालीस के करीब और शरीर इस उम्र की आम हिन्दुस्तानी महिलाओं जैसा थुलथुल। चेहरा मेकअप से पुता परन्तु आँखें निस्तेज। वह गहरी सांस ले रही थी। लगता था मुटापे का कुटुम्बी रक्तचाप उन्हें मुटापे के साथ मिल चुका था और दिल का रोग दरवाजे पर दस्तखत दे रहा था। ऐसा इसीलिए क्योंकि वह गहरी सांस लेते हुए सीने पर हाथ भी रख रही थी। बैग से बोतल निकाल कर उसने थोड़ा पानी पिया। तभी उसके मोबाइल की घंटी बज उठी। बैग से मोबाइल निकाल कर वह धीमी आवाज में बातें करने लगी। फोन संभवतः उसकी किसी सखी का था जो शायद आस-पास के इलाके में ही रहती थी। वह फोन पर उसे आश्वासन दे रही थी कि वह शीघ्र ही उसके यहाँ पहुँच जाएगी। सखी अधिक कुछ न करे। उसे केवल एक कप चाय पीकर चले जाना है। बच्चों के स्कूल से लौटने से पहले लंच तैयार करना है। समय का अभाव होने पर भी उनकी बातें काफी देर तक चलती रही। इस बातचीत से आस-पास के लोग जान गए कि उसका नाम निशा है और इनके बच्चे शहर के सबसे महंगे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ते है।

निशा ने जब मोबाइल बैग में रखा तब एक नम्बर वाली महिला बिल जमा करने की कोशिश कर रही थी। निशा के चेहरे पर संतोष की झलक दिखाई पड़ी। शायद वह आश्वस्त हो गई थी कि अब कुछ ही मिनटों में उसका नम्बर आ जायगा। निशा ने एक नजर सामने लगी घड़ी पर डाली। एक के बाद एक बिल जमा होते रहे। परन्तु एक नम्बर महिला हाथ में बिल थामे खड़ी रही। उसने कई बार बिल आगे बढ़ाया पर क्लर्क ने उसकी ओर कोई ध्यान न दिया। वह बराबर पुरुष लाइन से बिल पकड़ता और जमा करता रहा। निशा महिला को बिल जमा करने को बराबर उकसाती रही। वह प्रयास भी कर रही थी। पर सफलता नहीं मिल रही थी। निशा के लिए फिर एक फोन काल आ गई। वह दूसरी ओर मुँह घुमाकर आवाज धीमी रखने की कोशिश करते हुए बातें करने लगी। जो शायद संभव नहीं था। बीच-बीच में उसकी ऊँची होती आवाज काउण्टर बाबू के काम में बाधा डाल रही थी। आखिर उसने ऊँची आवाज में बोल ही दिया- “मेहरबानी करके जरा दूर जाकर बात करें।”

बातों का सिलसिला इस बार भी लम्बा चला। निशा के हाव-भाव से और बीच-बीच में ऊँची होती आवाज से साफ पता चल रहा था कि उसकी अपने पति से किसी मुद्दे पर बहस चल रही है। खैर निशा का मोबाइल बैग में गया। उसने पानी की बोतल निकाल कर फिर कुछ घूंट गटके। बोतल बैग में रख रूमाल से थपथपाते हुए पसीना पोछती वह फिर लाइन में आ लगी। अब तक एक नम्बर महिला बिल जमा कर जा चुकी थी। दो नम्बर ने बिल के साथ अपना हाथ खिड़की में डाला हुआ था। निशा ने भी बैग से बिल निकाला और पर्स से पैसे निकाल कर गिने। वे पूरे थे। निशा ने बिल और पैसों को हाथ में मजबूती से पकड़ा और काउण्टर की खिड़की में हाथ डालने की कोशिश करने लगी। वहाँ पहले ही कई हाथ मौजूद थे। निशा का प्रयास व्यर्थ रहा। तब उसने अपना हाथ अपने आगे वाली महिला के हाथ से आगे बढ़ाने का प्रयास किया। परन्तु उसके विरोध के कारण वहाँ से भी हाथ पीछे खींचना पड़ा। बिल लगातार जमा होते रहे और दोनों महिलाएं खिड़की पर झुकी अपनी बारी का इंतजार करती रहीं। शुरू में एक दूसरे को घूरकर देखने वाली इन दोनों महिलाओं में अब कुछ आत्मीय बातचीत होने लगी थी। उनमें कुछ देर के लिए बहनापा सा आ गया था। समान हालातों से जन्मी हमदर्दी धीरे-धीरे संवाद में तब्दील होने लगी। बीच-बीच में वे बाबू से कभी नर्म, कभी गर्म भाषा में बिल जमा करने को कह रही थी। परन्तु लगता था काउण्टर बाबू की वार्णेद्रिय काम नहीं कर रही थी। वे नजर उठाकर किसी को देख भी नहीं रहे थे। थोड़ी-थोड़ी देर में केवल उनका हाथ स्वचालित यंत्र सा पुरुष लाइन की ओर बढ़ता, बिल लेता, जमा करता और रसीद थमा देता। इसका कारण पुरुष लाइन का उनके सीधे हाथ पर होने से बिल लेने में सुविधाजनक होना था या वे अपनी पत्नी से ख़फ़ा होकर आए थे या उनके पड़ौसी की पत्नी बाहरी कार्य बखूबी निबटा लेती थी और उनकी नहीं कर पाती थी अथवा इन सब सामान्य कारणों से भिन्न ही कोई गम्भीर ठोस कारण, नारी विमर्श के इस युग में पुरुष विमर्श खड़ा करने जैसा कोई जज़्बा। ख़ैर कारण जो भी हो पुरुष लाइन तेजी से छोटी हो रही थी और महिला लाइन में एक गई, तीन आई थीं। इस बार जब बाबू ने हाथ पुरुष लाइन की ओर बढ़ाया तो आगे वाली महिला से न रहा गया। उसने हाथ बढ़ाते हुए बोल ही दिया- “इधर की लाइन से बिल नहीं लेना था तो लाइन लगवाई ही क्यों है?” खिड़की की ओर लम्बे होकर फैले दो पुरुष हाथ सहमकर जरा पीछे सरके तो दो नम्बर महिला ने तुरंत अपना बिल आगे बढ़ा दिया। बाबू ने कुछ नाराजगी से पल भर को उसे देखा और- “लाइए।” की एक रूखी सी झिड़की के साथ बिल और पैसे उसके हाथ से ले लिए। बिल जमा हो गया। महिला अस्पष्ट सा कुछ बोलती और निशा की ओर हमदर्दी से देखते हुए चली गई।

निशा ने अपना एक हाथ कोहनी तक काउण्टर पर टिकाते हुए दूसरा हाथ बिल और पैसों के साथ खिड़की में डाल दिया। बाबू ने उसे झिड़कते हुए कहा- “अभी जरा हाथ पीछे रखिए। अब पाँच बिल पुरुष लाइन से जमा होने के बाद आपका नम्बर आएगा।”

निशा पर इसका कोई प्रभाव न पड़ा। वह अपनी स्थिति यथावत् बनाए रही। पहले की भाँति पुरूष लाइन से बिल लिए जाते और जमा किए जाते रहे। वह हर बिल के बाद अपना बिल बाबू को देने का प्रयास करती। हर बार कहती- “अरे भाई साहब हमारा भी बिल जमा कर लीजिए हमें देर हो रही है।”

न निशा की बात का कोई जवाब मिला न बिल जमा हुआ। खैर पाँच बिल पुरूष लाइन से जमा हुए अब निशा ने हाथ को लम्बा कर बिल लगभग बाबू के सामने कर दिया । वह झल्ला गया- “आपको कहा है न, अभी खड़ी रहें।”

निशा ने भी ऊँची आवाज में जवाब दिया- “क्यों खड़े रहें? कब तक खड़े रहें? आपने कहा था पाँच के बाद हमारा बिल जमा करेंगे।”

प्रत्युत्तर मिला- “हाँ, तो, अभी पाँच बिल जमा नहीं हुआ है।”

निशा ने भी तर्क किया- “कैसे नहीं हुआ है? मैं बराबर गिन रही हूँ। पाँच बिल जमा हो गए हैं।”

बाबू ने थोड़ा क्रोध से निशा को देखते हुए कहा- “और हमे गिनती नहीं आती है, यही न।”

इतना कहते-कहते बाबू ने पुरुष लाइन से एक बिल और पकड़ा और जमा कर दिया। साथ ही अगले के लिए उधर ही हाथ बढ़ा दिया। निशा गुस्से में आ गई- “इस बार आप हमारा बिल जमा करें।” पुरूष लाइन में तीसरे नम्बर पर लगे महाशय ने हाथ खिड़की की ओर बढ़ाते हुए कहा- “अरे भैया पहले इधर से लो। दफ्तर को देर हो रही है।” उसके आगे वाले ने भी समर्थन किया- “हाँ भई, महिलाओं को क्या काम है।”

निशा पलट कर बोली- “कोई काम नहीं है महिलाओं को?” साथ ही अपने समर्थन की उम्मीद से उसने अपने पीछे लगी। महिला की ओर देखा। परन्तु उसने बोलने वाले पुरूष की ओर कुछ नफरत से देखा भर, बोली कुछ नहीं। पर निशा अपना धैर्य लगभग खोती जा रही थी और इस विवाद का लाभ उठाकर दो और पुरूषों ने बिल जमा कर दिया। पुरूष लाइन जो गेट के बाहर तक लगी थी। लगभग आधी रह गई। अब निशा ने पूरे पुरूष समाज को चुनौती सी देते हुए कहा- “दफ्तर से आओ और पैर फैला कर बैठ जाओ। बस इतना ही काम है पुरूषों के पास। हम महिलाओं को सैकड़ों काम है। खाना बनाना, कपड़े धोना, बच्चों को स्कूल, कोचिंग भेजना। ऊपर से खरीदारी और मेहमानदारी।”

इस बार निशा के पीछे लगी महिलाओ ने भी उसका साथ दिया। एक बोली- “इतने पर भी सबके नखरे अलग से।”

दूसरी ने कहा- “सब जगह यही है। रिजर्वेशन, फोन, बिजली का बिल, बैंक, पोस्ट ऑफिस हर जगह महिलाओं की लाइन कहने भर को छोटी है। दस-दस के बाद एक बिल महिलाओं का जमा होता है।”

तीसरी ने भी समर्थन किया- “और घर में सबको लगता है। हमी बिल जमा करा दें। झट से कह देते हैं चार छः की ही तो लाइन है। अब यह कौन गिने यहाँ चार के चालीस हैं।”

निशा इन बहनों का समर्थन पाकर उत्साहित सी बोली- “चार दिन होटल में खाना पड़े तो दिमाग ठिकाने आ जाय।”

दूसरी ने बात आगे बढ़ाई- “खाते भी हैं और पछताते भी हैं। पर जल्दी ही भूल जाते हैं।”

वे बोलीं- “भूल क्या जाते हैं। अच्छे-अच्छे की भी औकात नहीं है, जो घर भर को और साथ में अपने मेहमानों को महीने भर होटल में खिला सके। आखिर तो घर के चूल्हे से ही पेट भरता है।”

पुरूष लाइन में धीरे-धीरे कानाफूसी हो रही थी। वे कनखियों से मुस्कुराते हुए इस वार्तालाप का आनंद ले रहे थे। तभी पुरूष लाइन से एक व्यंगपूर्ण वाक्य आया- “अजी घर की बॉस तो महिलाएं ही हैं। सारे डिपार्टमेंट उन्हीं के हाथों में तो हैं।” महिला लाइन में सबसे पीछे लगी महिला ने बोला- “घर भर की अधिकारी नारी, है फिर भी बेचारी नारी।”

कुछ देर को शान्ति छा गई। अब तक इस बातचीत से अलग रही इन महिला की ओर एक साथ कई चेहरे घूम गए। पर वे पूर्ववत शान्त खड़ी थी। बाबू ने भी नजर उठाकर महिला लाइन को अंतिम छोर तक देखा और निशा के हाथ से बिल ले लिया। बिल जमा होने लगा। पंक्तियाँ बोलने वाली महिला विचार रही थीं - साहित्यक-गोष्ठियों, सरकारी योजनाओं, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चाओं में नारी विमर्श करता, नारी के उद्धार की दुहाई देता पुरूष, व्यवहार में नारी को बराबरी देने में इतना कृपण क्यों हो जाता है? शताब्दियों से अभावों को सहती और आज ऊँचाइयों को छूती हुई भी हिन्दुस्तानी औरत अभी तलाक कहना नहीं सीख पाई है। लाख तरक्की के बाद भी ना ही उसकी रसोई का कोई विकल्प बन पाया है। बाहरी लोग इसे बखूबी समझ रहे हैं। वे हिन्दुस्तानी नारी के गुणों के अच्छे पारखी साबित हो रहे हैं। वे उसे जीवन संगनी बनाने को तरजीह दे रहे हैं। परन्तु हिन्दुस्तानी पुरूष का नजरिया बदलने में अभी पीढि़याँ बीत जाएंगी। पर कहीं अधिक देर न हो जाए...।

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लेखिका

डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा ने मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ से एम.फिल. की उपाधि 1984 में, तत्पश्चात् पी-एच.डी. की उपाधि 1991 में प्राप्त की। आप निरंतर लेखन कार्य में रत् हैं। डॉ. शर्मा की एक शोध पुस्तक - भारतीय संवतों का इतिहास (1994), एक कहानी संग्रह खो गया गाँव (2010), एक कविता संग्रह जल धारा बहती रहे (2014), एक बाल उपन्यास चतुर राजकुमार (2014), तीन बाल कविता संग्रह, एक बाल लोक कथा संग्रह आदि दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही इनके शोध पत्र, पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं, कहानियाँ, लोक कथाएं एवं समसामयिक विषयों पर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपकी बाल कविताओं, परिचर्चाओं एवं वार्ताओं का प्रसारण आकाशवाणी, इलाहाबाद एवं इलाहाबाद दूरदर्शन से हुआ है। साथ ही कवि सम्मेलनों व काव्यगोष्ठियों में भागेदारी बनी रही है।

शिक्षा - एम. ए. (प्राचीन इतिहास व हिंदी), बी. एड., एम. फिल., (इतिहास), पी-एच. डी. (इतिहास)

प्रकाशित रचनाएं - भारतीय संवतो का इतिहास (शोध ग्रंथ), एस. एस. पब्लिशर्स, दिल्ली, 1994

खो गया गाँव (कहानी संग्रह), माउण्ट बुक्स, दिल्ली, 2010

पढो-बढो (नवसाक्षरों के लिए), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2012

सरोज ने सम्भाला घर (नवसाक्षरों के लिए), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2012

जल धारा बहती रहे (कविता संग्रह), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2014

चतुर राजकुमार (बाल उपन्यास), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

विरासत में मिली कहानियाँ (कहानी संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

मैं किशोर हूँ (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

नीड़ सभी का प्यारा है (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

जागो बच्चो (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेख पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं एवं कहानियाँ प्रकाशित । लगभग 100 बाल कविताएं भी प्रकाशित । दूरदर्शन, आकाशवाणी एवं काव्यगोष्ठियों में भागीदार।

सम्पर्क -

डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा, “विश्रुत”, 5, एम. आई. जी., गोविंदपुर, निकट अपट्रान चौराहा, इलाहाबाद, उ.प्र., पिनः 211004, दूरभाषः + 91-0532-2542514, दूरध्वनिः + 91-08005313626, ई-मेलः <draparna85@gmail.com>

(अपर्णा शर्मा)

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