रविवार, 17 अप्रैल 2016

शबनम शर्मा की कविताएँ व लघुकथाएँ

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मज़बूरी

फड़फड़ाते हैं वक्त

के परिंदे,

जी चाहता है, दूर-अति दूर,

आकाश में दौड़ लगाऊँ,

देखूँ ये धरती,

समुद्र, व उसका रचा संसार,

क्यूँ बाँध रखा है

खुद को मैंने,

इक कमरे की चारदीवारी में,

रोकता भी कोई नहीं,

परन्तु इक मजबूरी,

तेरी मासूम सी सूरत,

रोकती है मुझे,

बंधी हूँ तुझसे,

किन धागों से

दिखते भी नहीं

टूटते भी नहीं

पर नहीं जाने देते मुझे

तुझसे दूर।

--

 

वो वृद्ध

कितने सिमट से गये हम,

पड़ोसी को पड़ोसी की खबर नहीं,

गाँव तो बहुत दूर रहा।

बता रहा था किशन चौपाल में,

आए थे कुछ लोग बैंक से,

उसे सिखाने ‘‘नैट बैंकिंग’’

साफ मना कर दिया उसने,

चलाता है वो कम्प्युटर

करता है ढेरों बातें दोस्तों से,

पर सोचता कि ग़र सब

काम हो जाएंगे मोबाईल से,

तो कैसे निकलेगा, वो घर

से बाहर? कौन पहचानेगा उसे?

मंगा लेगा कपड़े, जूते, बर्तन

घर पर,

तो कैसे देखेगा रौनक बाज़ार,

पढ़ा लेगा सब पाठ नन्हों को

घर पर ही

तो कैसे जायेंगे शाला व

सीखेंगे संस्कार

दे देते आज हम बधाई फोन पर ही,

फिर कौन मिलायेगा हाथ,

मिलेगा गले, देगा आशीषें

छुएगा पाँव।

रहती है सत्तो ताई अकेली

देखने जाना है उसे भी

बीमार है सरपंच साहब,

पूछने जाना है उन्हें भी,

दो घूंट चाय की चुस्की संग

देखनी है मुस्कान इन चेहरों पर,

खानी है मिठाई शादी-सगाई

वाले घरों से,

नहीं करना है उसे एस.एम.एस.

नहीं करनी उसे ऑनलाईन शॉपिंग,

ऑनलाईन बैंकिंग,

नहीं सिमटना है उसे एक ही कमरे में,

जि़न्दगी आज है, कल नहीं

जीनी है उसे, सबके दुःख-सुख

हँसी-मज़ाक के साथ।

 

---

गलती

मुझे स्कूल से घर आकर 1-1½ घंटा आराम करना बहुत अच्छा लगता है। उस दिन जैसे ही मैं लेटी, मुझे किसी बच्चे की चीखों ने बेचैन कर दिया। उठी व गलियारे में खड़ी होकर अन्दाज़ा लगाने लगी कि कौन हो सकता है? ध्यान से सुना तो पड़ोस वाली औरत गुस्से में अपनी बेटी को पीट रही थी। ‘‘लड़की तो इतनी होशियार व सुशील है, पर इसकी माँ को इतना गुस्सा क्यों आया?’’ मैंने सोचा व सीढि़याँ उतरकर उनके घर जा पहुंची। देखा वीनू ज़ोर-ज़ोर से रो रही थी, उसके कान से खून बह रहा था। माँ पास खड़ी फिर भी चिल्लाए जा रही थी। मुझे देखकर माहौल शान्त हुआ। मैंने कारण पूछा, तो पता चला वीनू के 2 नम्बर हिन्दी में कट गये थे जिसकी वजह से उसकी माँ ने क्रोधित होकर उसे डंडे से मारा व बच-बचाव में डंडा वीनू के कान पर लग गया व खून बहने लगा। मैंने समझाने की कोशिश की, परन्तु उसकी माँ की दलीलों के सामने मेरी एक न चली। मैं घर वापस आ गई।

कुछ दिनों बाद पता चला कि आठवीं की परीक्षा में वीनू नकल करते पकड़ी गई और उसके माता-पिता को मुख्याध्यापक ने ऑफिस में बुलाया। दोनों में काफी बहस हुई व मुख्याध्यापक ने वीनू को स्कूल से निकाल दिया। स्थिति गंभीर हो गई। वीनू को अपने मामा के पास पढ़ने के लिये भेज दिया गया। उसका मन तनिक भी वहाँ जाने को न था। गर्मियों की छुट्टियों में वो घर आई हुई थी। उसकी छोटी बहन का जन्मदिन था। पड़ोसी के नाते हमें भी जाना था। मैं अन्दर वाले कमरे में बैठ गई और वीनू मेरे लिये पानी लेकर आई। बाहर जन्मदिन की तैयारियाँ चल रही थी। वीनू के चेहरे पर तनिक भी खुशी न थी। मैंने उससे कारण पूछा। वो बचपन से मेरे साथ खुली हुई है। उसकी आँखें डबडबा गईं, आवाज़ काँपने लगी, बोली, ‘‘आँटी, आपको सब पता है, उसे दिन मुझे कितनी मार पड़ी, उस डर से मैंने 3-4 प्रश्नों के उत्तर किताब से फाड़कर रख लिये थे, उनमें से 2 प्रश्न आए। मैं देखने लगी और पकड़ी गई। फिर भी माँ को समझ नहीं आया, मुझे मामा के घर भेज दिया, वहाँ स्कूल जाने से पहले मामी के साथ काम कराओ, उनके बच्चे संभालो, शाम को रसोई बनवाओ, फिर भी अहसान व तानें सुनो।’’ ‘‘तू वापस आ क्यूँ नहीं जाती?’’ ‘‘कैसे आऊँ, मम्मी-पापा की इज्ज़त का सवाल है, वो अब मुझे यहाँ लाना नहीं चाहते।’’ बोलकर वो तेज़ी से मेरे कमरे से चली गई।

 

--

 

मंत्र

विजय का जन्मदिन है, घर पर सुबह से ही माँ ने रसोई संभाल रखी थी। बच्चे इधर-उधर का काम फटाफट निबटा रहे थे। विजय का घर मेरे घर के पास ही है। अच्छी जान-पहचान है, पर सिर्फ थोड़ी सी बातचीत ही होती है हम दोनों परिवारों में। अपनी-अपनी व्यवस्तताएँ सबको जकड़े हुए हैं, फिर भी हम एक-दूसरे के दुःख-सुख में चले ही जाते हैं। सुबह से चार बार विजय घर के चक्कर लगा चुका है। वह मुझे बुलावा दे चुका है, पर बार-बार पूछ रहा है, ‘‘मैम कब आओगे?’’ उसकी उत्सुकता, प्यार मुझे ज़्यादा देर तक रोक ना पाया। मैं शाम को करीब 6 बजे उनके घर चली गई। बड़ी शालीनता से उसके मम्मी-पापा ने मुझे बिठाया। बच्चे अपने दोस्तों के आने का इन्तज़ार करने लगे। उसके पापा सब बच्चों से बहुत प्यार से बात कर रहे थे। विजय कक्षा में मुझे वक्त-वक्त पर गाना सुनाता है, उससे मैंने गाना सुनाने को कहा। उसके पिता बीच में ही बोल पड़े, ‘‘मैडम, आज इससे गाना नहीं, संस्कृत के मंत्र व श्लोक सुनिये, ये आपको गाकर सुनाएगा।’’ विजय ने गाना शुरू किया। लम्बे-लम्बे मंत्र उसे कंठस्थ थे। इतना छोटा बच्चा व इतने कठिन शब्दों का उच्चारण, मैं हतप्रभ थी। समाप्ति पर पूछ ही बैठी, ‘‘ऐसे इसने कैसे याद किये?’’ उसके पापा बहुत ही सहजता से बोले, ‘‘मैडम, जब ये पैदा हुआ, तब से 3-3½ वर्ष तक इसकी दादी जब भी इसे सुलाती, तो इन्हीं मंत्रों का उच्चारण करती, ये सुनता-सुनता सो जाता और जब इसने बोलना चालू किया तो ये सब साथ-साथ बोलने लगा और पता ही न चला कब कंठस्थ हो गये। अब हर रोज़ शाम की संध्या में ये ही हमें सब हर रोज़ सुनाता है।’’ मेरा मन खुशी से झूम उठा कि आज इस कलयुगी माहौल में भी ऐसा सुन्दर माहौल बन सकता है ज़रा सी सूझ-बूझ से।

 

शबनम शर्मा

अनमोल कंुज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र. - 173021

मोब. - 09816838909, 09638569237

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