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ललित व्यंग्य / शीर्षक की तलाश / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

वे मुझे एक साहित्यकार मानते हैं और इसलिए अक्सर मुझसे उलटे-सीधे सवाल करते रहते हैं | मुर्गी पहले आई या अंडा – ठीक इसी तर्ज़ पर वे एक बार मुझसे पूछ बैठे, शीर्षक पहले आता है या रचना? बोले, कृपया घुमा-फिरा के बात न कीजिएगा | आप लोगों के साथ बात करने में बस यही परेशानी है | कभी सीधा उत्तर नहीं देते | साफ़ साफ़ बताइए, पहले रचना या पहले शीर्षक ?

मैं बड़ी द्विविधा में पड़ गया | समझ में ही नहीं आया, क्या जवाब दूँ | मरता क्या न करता; बोला, ‘पहले शीर्षक’ | वे तिलमिला गए | कहने लगे, यानी आप लोगों के दिमाग में पहले शीर्षक आता है और रचना को बाद में उसमें फिट करते हैं | यह तो ऐसा ही हुआ जैसे सिनेमा में होता आया है | पहले धुन बना ली जाती है और बाद में उसमें बोल फिट कर दिए जाते हैं | ‘नहीं’, मैंने उन्हें समझाया, ‘यह तो मैंने आपके, यानी पाठक के दृष्टिकोण से कहा रहा था | पाठक के लिए पहले शीर्षक आता है, और रचना बाद में आती है |वे मान गए |

लेकिन मैं अभी भी पसोपेश में हूँ | न जाने कितनी बार ऐसा हुआ है की एक सुन्दर-सा आकर्षक पद-बंध मेरे दिमाग नें कौंध गया और मुझसे मानों मिन्नतें करने लगा कि इसपर मैं एक लेख/ कविता/ निबंध, कुछ तो भी, लिख दूँ | और इसके विपरीत कई बार ऐसा भी हुआ है कि रचना तैयार कर ली गई है और उसके लिए कोई उपयुक्त शीर्षक तलाश नहीं कर पा रहा हूँ |

शीर्षक चीज़ ही ऐसी है | यह हर रचना का शीर्ष होता है | रचना में यह शीर्षस्थ है | शीर्षस्थ है इसलिए इसका यह दायित्व भी बनाता है कि वह रचना की रक्षा भी करे | यदि वह अपनी रचना की रक्षा नहीं कर पाया, उसके विरुद्ध हो गया, या उससे उदासीन हो गया तो किसी मसरफ का नहीं रह गया, ऐसा शीर्षक ! तो शीर्षक की तलाश बड़े सोच-समझ के करनी होती है | मुझे याद है, जब साहित्य का छात्र था (वैसे छात्र तो साहित्य का मैं अभी भी हूँ ) तो परचे में एक ‘अनसीन पैसेज’ शीर्षक बताने के लिए कहा जाता था | शीर्षक ढूँढ़ पाने में पसीने छूट जाते थे |

कभी कभी रेखांकन करता हूँ | अमूर्त रेखांकन | उनपर मैं कोई शीर्षक नहीं देता | मैं उन्हें एक कला-वीथि में प्रदर्शित करना चाहता था | कला-वीथि के निदेशक महोदय ने रेखांकनों पर एक सरसरी नज़र डाली | बोले, हर रेखांकन का एक शीर्षक दीजिए | बिना शीर्षक के मैं प्रदर्शनी के लिए “केटलाग” कैसे तैयार करा पाऊँगा? लीजिए, शीर्षक-तलाश शुरू हो गयी | बड़ी मुश्किल में फंस गया | चित्र अमूर्त है | कोई भी शीर्षक क्यों न दूँ, वह चित्र के बिलकुल अनुरूप तो होगा नहीं | बल्कि वह देखने वाले की दृष्टि को सीमित ज़रूर कर देगा | अब आप ही बताइए, ऐसे में क्या शीर्षक की तलाश वाजिब कही जा सकती है?

लेकिन साहेब, शीर्षक तो चाहिएच | मराठी और हिन्दी देव नागरी लिपि में लिखी जाती है | और देवनागरी लिपि में हर अक्षर के पास एक शीर्षक है | अ से लेकर ज्ञ तक कोई अक्षर छूटा नहीं जिसके शीर्ष-रेखा न हो | जब अक्षरों तक पर शीर्षक है तो भला शब्दों की क्या बिसात ! हर शब्द शीर्ष-रेखा से सजा हुआ ! ऐसी है हमारी देव-नागरी !

शीर्षक से वंचित तो इंसान भी नहीं रहना चाहता | हर प्राणी एक अदद शीर्ष लेकर पैदा हुआ है | हर इंसान के भी एक सिर है लेकिन वह उसे नाकाफी मानता है | शीर्ष के ऊपर भी कोई शीर्षक होना ही चाहिए, इसीलिए वह अक्सर कोई न कोई शीर्ष-पट धारण ज़रूर करता है | वह पगड़ी हो सकती है, साफा हो सकता है, टोपी हो सकती है, टोपा हो सकता है, हैट हो सकता है -कुछ भी | बिना शीर्षक के सिर कितना खाली-खाली लगता है ! सारी लड़ाई और सारा मेल मिलाप बस शीर्ष-पट का ही है | गांधी टोपी लगाई है, हरी टोपी लगाई है, लाल टोपी लगाई है या काली टोपी ? सब अपनी अपनी टोपी के साथ हैं और सब टोपियाँ एक दूसरे की बैरी है |
कुछ भी हो शीर्षक की तलाश जारी आहे और हमेशा जारी रहेगी | डिमोक्रेसी में चुनाव से शीर्षक तय होते हैं | हर पार्टी का एक शीर्षक है और हर दल के शीर्ष पर एक शीर्षक बैठा है | जो अभी तक शीर्ष पर नहीं पहुँच पाए वे किसी न किसी शीर्षक की तलाश में है कि जिसकी पूछ पकड़ कर वैतरणी पार की जा सके |

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डॉ.सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद (उ. प्र) -२११००१

मो. ९६२१२२२७७८

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वाह,शीर्ष को भी शीर्षक चाहिये।पढ़ कर बहुत मज़ा आया।

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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