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रचना और रचनाकार (२४) : त्रिपाठी जी की द्विपंक्तियां / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

उर्दू में एक शब्द है, सुखन. किसी भी उम्दा कथन को सुखन कहते हैं. कविता को भी सुखन कहते हैं. कविता वस्तुतः एक उम्दा कथन ही तो है. रमेशकुमार त्रिपाठी ने अपनी जिन रचनाओं को ‘द्विपंक्ति’ कहा है, वस्तुतः वे दो-दो पंक्तियों में कहे गए उम्दा कथन हैं, उन्हें यदि सुखन कहा जाए तो शायद ज्यादह ठीक होगा.

आजकल कविता की पहचान बहुत-कुछ धूमिल पड़ गई है. एक ज़माने में कविता काफी बनी-संवरी, सलीख़े से कटी-छंटी, तुकांत और गेय हुआ करती थी. अब ऐसा नहीं है. आज आप गद्य में भी कविता तलाश सकते हैं. ज़रूरी सिर्फ इतना है कि उसके कथन में लय हो, वैचारिक तरलता हो और सम्वेदनशीलता हो. उसकी दिशा एक बेहतर आदमी बनाने की तरफ हो. त्रिपाठी जी की द्विपंक्तियों में आज की कविता के ये सारे गुण बिखरे पड़े हैं.

‘चेतना के द्वार’ (उमेश प्रकाशन, इलाहाबाद २००८) में संकलित द्विपंक्तियों में एक विचारक के वचन हैं. बूंद-बूंद अनुभव के शाब्दिक बिंदु हैं. इनमें उक्तियों का सौंदर्य और कविता की झलकियां हैं. ये ‘शबद’ हैं जिहें सूक्तियों की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है और जिनका प्रायः कविताओं की तरह रसास्वादन किया जा सकता है. इनमें अतिशयोक्तियां भी हैं और अन्योक्तियां भी हैं. इनमें चमत्कारोक्तियां भी मिल जाएंगीं और विपरीतोक्तियां भी. लेकिन सबसे पहले इनमें से मैं आपके समक्ष कुछ ऐसी रचनाएं प्रस्तुत करता हूं जिनमें लोकोक्ति बन जाने की क़ूबत है –

0 देखो तो खंडहर है/ समझो तो इतिहास (पृ.35)

0 साफ बात की झाड़ू से/ मन का कूड़ा साफ किया (पृ.37)

0 कुछ बीती बातें/ बीत नहीं पाती (पृ.44)

0 अपने लागे/ लगे लगाव (पृ.46)

0 मन भिखमंगा/ मांगे शंसा (पृ.55)

0 अपने का भाव/ भावों में भाव (पृ.58)

0 पत्र न आया/ आंसू आए (पृ.58)

लोकोक्ति हो जाने के लिए यह ज़रूरी है कि कथन सामान्य-बुद्धि (कॉमन-सेंस) से हटकर न हो और साधारण भाषा (ऑर्डिनरी लैंगुएज) में कहा गया हो. मैं यहां ये दोनो शब्द दर्शनशास्त्र की पारिभाषिक शब्दावली में इस्तेमाल नहीं कर रहा हूं (बताता चलूं कि डॉ. त्रिपाठी का शोध-प्रबंध मूर के कॉमनसेंस दर्शन पर ही है).लेकिन जहां तक उनकी द्विपदियों का सवाल है वे सामान्य अर्थ में ही कॉमनसैंस पर आधारित हैं और बेशक बोलचाल की साधारण भाषा में कही गई हैं. यही इनकी शक्ति है और शायद दुर्बलता भी.

वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान, -कविता की इस प्रसिद्ध पंक्ति की गूंज त्रिपाठी जी की द्विपदियों में स्पष्ट देखी जा सकती है. –

0 उदासी की कोख में/ जन्में सृजन के पल अनमोल (63)

0 ये कविताएं मिली हमें/ पीड़ा के पुरस्कार में (70)

0 दुःख में अंदर सिमट कर/ सृजन की ज्योति छिटकाई (63)

0 दिल में पीर उठी/ मन में गीत उठे (14)

कवि का गान पीड़ा से भले उपजा हो पर वह पीड़ा और दुःख में बह नहीं जाता. वह अपनी आशावादिता सुरक्षित रखता है.

0 तुम जहां देखते निशा गहन/ मैं वहां देखता उज्ज्वल दिन (10)

0 धुंध दिल की मिट गई है/ आंसुओं की रोशनी में (60)

कवि मूलतः अपनी पीड़ा को अभिव्यक्ति देकर ही उससे मुक्त होने की कोशिश करता है. यह अभिव्यक्ति आंसुओं से भी हो सकती है और कविता से भी. इसके अलावा प्रेम और प्रकृति भी उसकी पीड़ा घटानें में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. प्रेम की उदात्त भावना तो उसे मृत्यु-भय से भी मुक्त कर देती है. वह पूछता है, ‘प्रेम में पूरित उर में क्या/ होती जगह मृत्यु के भय की!’ (22). वह अपनी प्रेमिका से एक अरसे बाद मिलता है और मानों जी उठता है, ‘जी उठे हम देखकर/ बाद मुद्दत आज तुमको’ (9). उसका आना कवि के लिए बसंत की बयार की तरह है ‘तुम वायु बसंती/ हर्षदा स्फूर्तिप्रदा’ (44)

कवि का प्रेम केवल अपनी प्रेमिका तक ही सीमित नहीं रहता. वह पूरी प्रकृति के लिए है. प्रकृति का सानिध्य उसे हर्षाता है और दुर्भावनाओं को स्वच्छ करता है. रमेश कुमार जी सारी प्रकृति में एक अनवरत संगीत पाते हैं लेकिन हम (अपनी) ख्वाहिशों के कारण उसे सुन नहीं पाते.(79)

कुछ द्विपदियां चिंतनपरक भी हैं. कवि जीवन और जगत के रंग-ढंग से असंतुष्ट है. आज की आपाधापी और चूहा-दौड़ ने उसे व्यथित कर रखा है ‘इस क़दर हम हो गए हैं व्यस्त /छींकने की है नहीं फुर्सत’ (9). इतना ही नहीं, आज का व्यक्ति एक तरह का दोहरा जीवन जीता है. जितना ही वह स्वयं को धार्मिक बताता है उतनी ही वह वस्तुतः अपनी बदनियति को छिपाता है.

0 बहुत सफाई देते हो/ अंदर से गड-बड़ लगते हो (32)

0 हम बहुत लेते राम नाम/ हम बहुत होते बेईमान (28)

कवि बेशक ‘ज़माने को समझता है/ ज़माना बन नहीं पाता’ (27). वह अपने मानवी गुणों को भरसक बचाए रखना चाहता है. उसकी सम्वेदनशीलता उसकी द्विपदियों में स्पष्ट देखी जा सकती है. बच्चों के बचपन को छिनते हुए जब वह देखता है तो बे-

ख़ास्ता कह उठता है ‘भरी सड़क पर अखबार बेंचते/ खिलौने के सपने आते तो होंगे’ (56). कथनो में गुंथी यह सम्वेदनशीलता ही कवि के वचन को कविता बना देती है.

सत्रहवीं शताब्दी के एक प्रसिद्ध जापानी कवि मात्सुओ बाशो का एक ख्याति प्राप्त हाइकु है (हिंदी अनुवाद) ‘कूदा मेंढक /कांप गया निश्चल/ जल पोखर’. सतही तौर पर यह हाइकु एक अत्यंत साधारण तथ्य को सहज साधारण भाषा में अभिव्यक्ति देता है, किंतु इसमें कोई तो गूढ बात अवश्य है. तभी तो इसकी अनेकानेक व्याख्याएं हुई हैं और अनेक भाषाओं में इसे रूपांतरित किया गया है. तीन शताब्दियों से ऊपर हो गए, इस हाइकु की यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है. रमेशचंद्र त्रिपाठी एक सिद्ध हस्त हाइकूकार भी हैं. बाशो के हाइकु का उन्होंने कोई हिंदी भाषांतर तो नहीं किया किंतु ‘चेतना के स्वर’ की एक द्विपदी में इसकी एक सुंदर अनुगूंज देखी जा सकती है –

0 हृदय पोखर गिरा कॉंकर/ फैली लहर फिर मिट गई (49)

इस रचना में बाशो का तालाब हृदय पोखर हो गया है और उसमें किसी दादुर के कूदने की बजाय एक कॉकर गिरता है. हृदय पोखर में जो कंकड़ गिरा है वह ज़ाहिर है कोई कंकड़-पत्थर न होकर एक ऐसा कोई भाव होगा जो कवि को रास नहीं आया होगा. इस अनचाहे भाव से कवि-मन विचलित हो गया होगा. किंतु यह विचलन टिक नहीं पाती. कुछ ही देर में सब कुछ सामान्य हो जाता है – फैली लहर फिर मिट गई. यह द्विपदी बाशो के हाइकु को आगे बढाती है. यह केवल उसका भावानुवाद ही नहीं है.

अपने आकार की लघुता में ‘चेतना के द्वार’ में संकलित रचनाएं हाइकु का मज़ा देतीं हैं. कवि ने इन्हें द्विपदी कहा है, किंतु इनका मिज़ाज और रूप दो पंक्ति से भिन्न है. अपनी ठसक में तो ये हाइकू के ही अधिक निकट लगती हैं.

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