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व्यंग्य / एक सरकारी पर्यावरण प्रेम / अशोक गौतम

ऑफिस के कुटेशन के नए नवेले कूलर ने जब दूसरे दिन ही गर्मी के आगे आत्मसमर्पण कर सूरज से अधिक आग उगलनी शुरू की तो उन्हें एकाएक याद आया कि पर्यावरण सच्ची को संकट में है। इसकी रक्षा होनी चाहिए। हर हाल में होनी चाहिए। दिमाग में इधर आइडिया कौंधा उधर उसको व्यवहारिक रूप देने के लिए एक और फाइल ने मुंह सुरसा सा खोला। साहब होने ही ऐसे चाहिएं। काम के बहाने खाने के एक्शन लेने में कोई कोताही नहीं। जनता के कामों में कोताही हो तो होती रहे। लंबी सांस ले साहब ने बड़े बाबू को बुलाया और उनके कुर्सी पर बैठने से पहले ही आदेश दिया,' सुनिए पुजारी जी! हम कल पर्यावरण दिवस मनना चाहते हैं। कमेटियां तुरंत बनाई जाएं।'

' पर सर! इस साल का पर्यावरण दिवस तो मनाया जा चुका है। उसके लिए जो बजट आया था उसका यूसी तक पर्यावरण मंत्रालय को भेजा जा चुका है। अब तो इसे मनाने के लिए हमारे पास बजट नहीं है, ऐसे में....,' कह उन्होंने अपने हाथ में लिए पेन को कुतरना शुरू किया तो साहब ने पचास साल के को ऐसे समझाते कहा जैसे वे अपने छोटे बच्चों को कभी समझाया करते थे ,' अरे पुजारी बाबू! इतने साल हो गए तुम्हें सरकारी नौकरी में आए और बजट का प्रबंध करना अभी भी नहीं समझे?? अरे, हम बजट को इधर से उधर करने के सिवाय और करते ही क्या हैं? सरकारी काम तो बस एक बहाना है। असल में हमें अलॉट बजट को पूरी बेईमानी से खाना है। याद नहीं, पिछले साल जब आबंटित बजट खाने से रह गया था तो निदेशालय ने कितनी फजीहत की थी। अरे यहां जनता का पैसा बचाने वाले नहीं, खाने वाले कर्मचारी सम्मान पाते हैं पुजारी बाबू! अब ऐसा करो, वह जो बाढ़ दिवस मनाने के लिए बजट आया है, उसे आकस्मिक आए पर्यावरण दिवस पर कुर्बान कर दो।'

'पर सर.... फिर बाढ़ दिवस मनाने को बजट कहां से लाएंगे? चाय समोसे कहां से खाएंगे?'

'देखो पुजारी बाबू! तुम तो जानते ही हो पर वर सुनने की अपनी आदत नहीं। हम कहते हैं तो बस कहते हैं। जो अपने मन की न करे वह अफसर की कैसा? अपने हित में हम कोई भी निर्णय बिन सोचे समझे लेते रहे हैं। हमारी यही सबसे बड़ी खूबी है। यह बात तुम मुझसे अधिक तुम खुद जानते हो।'

' सो तो ठीक है पर सर...'

' जरा समझो! आज पर्यावरण की रक्षा होगी तो कल बाढ़ अपने आप ही नहीं आएगी। इसलिए जाओ और दस मिनट में कल मनाए जाने वाले आकस्मिक पर्यावरण दिवस हेतु शीघ्र कमेटियां बना कर लाओ ताकि पर्यावरण दिवस मनाने के लिए हम कोई कसर न छोड़ें। हम हर हाल में पर्यावरण पर छाए संकट को कल ही पर्यावरण दिवस मना निपटाना चाहते हैं। और हां! अखबारों के लिए प्रेस नोट आज ही बना कर दिखा दो। पर्यावरण की रक्षा के लिए मेरी ओर से ऐसा तर्क लिखना कि सुंदरलाल बहुगुणा की जुबान भी उसके आगे बंद होती लगे। कल सबसे पहले अखबार के ऑफिसों में किसी का प्रेस नोट जाए तो बस हमारा। इसे मेरा आदेश माना जाए या जो कुछ और समझना हो, समझ लो। कल पर्यावरण रहे या न, पर मुझे कल हर हाल में पर्यावरण दिवस मनाना है बस! देखो तो, कूलर दो ही दिन चल जवाब दे गया।'

'सर! मैं तो पहले ही कह रहा था कि कूलर की जगह कूलर ही मंगवाओ पर मेरी कोई माने तब न? कूलर के साथ जो फ्री में आइटम आई है वह अपने पास से तो कोई देने से रहा।'

' अरे पुजारी बाबू! तुम भी न..... अच्छा जाओ, अपना काम करके जल्दी लाओ। भविष्य को गर्म होने से बचाने के लिए कल पर्यावरण दिवस मनाना बेहद जरूरी है।'

और पुजारी बाबू कल मनाए जाने वाले पर्यावरण दिवस को मनाने के लिए कमेटियां बनाने का नोटिस तैयार करने में सिर खुजलाते जुट गए। बाजार से गमले लाने का काम मिस्टर के के को सौंपा गया तो पर्यावरण की रक्षा के लिए गमलों में फूल लाने की जिम्मेदारी शर्मा के कंधों पर चस्पा की गई। पूरे ऑफिस में सबको पता है कि वे फूलों के कितने रसिया हैं। गमलों के लिए गोबर लाने का काम साहब के आंखों की किरकरी सूद मैडम को सौंपा गया। पर्यावरण दिवस पर ऑफिस को संबोधित करने के लिए भाषण तैयार करने का काम राई का पहाड़ बनाने वाले प्रेमराज को सौंपा गया। पर्यावरण दिवस के अंत में चाय समोसे के लिए अलग से विशेष कमेटी बनाई गई और उसे विशेष आदेश दिए गए कि जो समोसे ठंडे आए तो उनके पैसे कमेटी के सदस्य अपनी जेब से देंगे।

कमेटियों के सारे सदस्य साहब की नजरों में अपने को एक दूसरे से बड़ा पर्यावरणविद् दिखाने के लिए अपने-अपने दिए काम को पूरा करने नंगे- अधनंगे पांव निकल पड़े। गमले वाले ने पचास के रेट वाला गमला सौ के हिसाब में लाया तो फूल वाले ने बीस वाले फूल का पौधा पचास का। सूद मैडम को गमलों के लिए गोबर लाने का काम सौंपा गया था, सो वे भी पास के मवेशी खाने से भैंसे के गोबर के चार सीमेंट के कट्टे नाक पकड़े ऑटो में ले आईं। ऑटो वाले ने किराया लिया सौ तो उससे बिल लिया तीन सौ का। दो सौ अपना नाक पकड़ने के। पर्यावरण दिवस पर थकने के बाद हेतु बनी कमेटी ने समोसे छोटे बनवाए और रेट पूरा लगवा बाकि की अपने घर के बच्चों के लिए मिठाई ले गए।

अगले दिन सारे काम छोड़ आकस्मिक पर्यावरण दिवस मनाने के लिए सभी अपनी -अपनी मोटी कमर कसे दिखे।

गमले नहला कर ऑफिस के बाहर रख दिए गए मानों उनकी बलि दी जानी हो। तभी एक यक्ष प्रश्न कि उनमें मिट्टी भरे कौन? सब के मुंह गमलों से लटक गए। सभी सिर झुकाए गमलों के सामने ऐसे जैसे कि जिस किसीका ऊंचा सिर गमलों ने देख लिया मानों वे उसे ही अपने पेट में मिट्टी भरने न बुला लें। तभी पीउन को हांक दी गई कि वह गमलों को मिट्टी से भरे, तो सबकी जान में जान आई।

गमलों के पेट पीउन ने मन ही मन सबको गालियां देते मिट्टी -गोबर से भरे तो सबके चेहरों पर ऐसी रौनक मानों अभी- अभी सब ब्यूटी पार्लर से फेशियल करवा कर आए हों। सबसे खुश साहब थे। तय समय पर प्रेस के फोटोग्राफर को पा अखबार के लिए साहब ने गमले में देवदार का पेड़ लगा ऐसा फील किया मानों देवदार से ठंडी हवा के झौंके ने अचानक गर्मी की लू झेलते उनके मन का रोम- रोम शीतल कर दिया हो। उस वक्त वे अपने को चिपको आंदोलन के पुरस्कृत कार्यकर्त्ता से कम क्या ही फील कर रहे थे।

पर्यावरण दिवस पर गमलों में मरियल फूलारोपण के बाद साहब ने सबको संबोधित करते मीटिंग हाल में वो जोशीला भाषण दिया कि कइयों ने तो दांतों तले उंगलियां दबा लीं। सबमन ही मन प्रेमराज के शब्द चयन की भूरि - भूरि प्रशंसा करने से नहीं चूके। साहब को चने के झाड़ पर चढ़ाने वाला सातों लोकों में दूसरा कोई मिल जाए तो वे प्री मैच्योर रिटायरमेंट ले लें।

राष्ट्रगान से पहले चाय- समोसा कमेटी ने अपनी कार्यकुशला का परिचय देते इतने गर्म-गर्म चाय -समोसे परोसे कि कइयों के मुंह और जीभ जल गए। जन गण मन हुई और सभी साहब के माथे कार्यक्रम की सफलता का सेहरे पर सेहरा बांध अपने-अपने घर को दुम दबाए हो लिए। और साहब! जैसे उन्हें अनचाहे गर्भ से मुक्ति मिल गई हो। वे अपने को तब शाहरूख खान से भी अधिक कूल -कूल फील कर रहे थे बिन विज्ञापित पाउडर के।

अशोक गौतम,

गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

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