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रामनवमी पर विशेष : भए प्रगट कृपाला दीन दयाला / गोवर्धन यादव

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भए प्रगट कृपाला,

दीनदयाला कौसल्या हितकारी हरषित महतारी,

मुनि मन हारी, अद्भुत रूप बिचारी लोचन अभिरामा,

तनु घनस्यामा,निज आयुध भुज चारी भूषन बनमाला,

नयन बिसाला, शोभासिंधु खरारी

कह दुइ कर जोरी, अस्तुति तोरी,

केहि बिधि करौं अनंता माया गुन ग्यानातीत अमाना,

बेद पुरान भनंता करुना सुख सागर, सब गुन आगर,

जेहिं गावहिं श्रुति संता सो मम हित लागी, जन अनुरागी,

भयऊ प्रगट श्रीकंता

 

दोनों हाथ जोड़कर माता बोलीं- हे अन्तरहित ! मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ?. वेद और पुराण कहते हैं कि आप माया, गुण और ज्ञान आदि से परे और परिणाम रहित हैं. श्रुति और संतजन जिनको दया और सुख का समुद्र तथा सब गुणों का धाम कहते हैं. वहीं दूसरों से प्रेम करने वाले लक्ष्मीकान्त मेरे हितार्थ प्रकट हुए हैं.

ब्रह्मांड निकाया, निर्मित माया,

रोम रोम प्रति बेद कहे मम उर सो वासी, यह उपहासी,

सुनत धीर मति थिर न रहै उपजा जब ज्ञाना प्रभु मुस्काना,

चरित बहु बिधि कीन्ह चहैं कहि कथा सुनाई,

मातु बुझाई, जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै

मात पुनि बोली, सो मति डॊली,

तजहु तात यह रूपा कीजै सिसुलीला, अति प्रियसीला,

यह सुख परम अनूपा सुनि वचन सुजाना, रोदन ठाना,

होइ बालक सुरभूपा यह चरित जे गावहिं,

हरिपद पावहिं,ते न परहिं भवकूपा

भगवान श्री राम के अवतार लेने के समय पवित्र चैत्र मास के शुक्लपक्ष में नवमी तिथि प्रभु का प्रिय अभिजित नक्षत्र था तथा नवम दिवस न अधिक शीत और न विशेष सूर्य की तपन, बल्कि संसार को विश्राम देने वाला शुभ दिन था. शीतल मंद और सुगन्धित हवा चल रही थी. देवता हर्षित थे और संतों के मन में चाव था. वन फ़ूले हुए थे. पर्वत-समूह मणियों से युक्त हो रहे थे और संपूर्ण नदियाँ अमृत की धारा बहा रही थी. ऎसे सुन्दर और मनमोहक वातावरण में प्रभु श्रीराम इस धरती पर अवतरित हुए.(*) वेद कहते हैं कि आपके प्रत्येक रोम में माया के रचे हुए ब्रह्मांड के समूह हैं. वही आप मेरे हृदय में रहें. यह हंसी की बात सुन धीर पुरुषॊं की बुद्धि भी स्थिर नहीं रहती. जब माता को ज्ञान पैदा हुआ, तब प्रभु मुस्कुराए. वे बहुत प्रकार की लीला करना चाहते हैं. इसीलिए सुन्दर कथा कह माता को समझाया,जिससे पुत्र-प्रेम प्राप्त हो(*) माता की वह बुद्धि पलट गई, तब वह फ़िर बोलीं-हे तात ! यह रूप त्याग कर अति प्रिय बाल-लीला करो, यह सुख बड़ा अनुपम होगा. यह वचन सुनकर सुजान देवेश्वर ने बालक होकर रोना प्रारम्भ किया. तुलसीदास जी कहते हैं कि जो इस चरित्र को गाते हैं, वे श्री हरि का पद पाते हैं और संसार-कूप में नहीं गिरते.

उपरोक्त छंदों को पढ़ते हुए मन गदगद हो उठता है. नेत्रों से आंसू झरने लगते हैं. शरीर पुलकित हो उठता है. मेरे अपने मतानुसार अब तक किसी भी भक्त कवि ने श्रीराम के जन्मोत्सव को लेकर इतनी सुन्दर रचना शायद ही की होगी. जब तक श्री हरि की कृपा नहीं होगी,सरस्वती उसकी जिव्हा में कैसे विराजमान हो सकती है?.

रामभक्त तुलसीदासजी प्रभु श्रीराम के जन्म के समय प्रकृति चित्रण का वर्णन बड़े ही मनोहरी ढंग से किया है. इसकी पूर्व की चौपायी में वे रावण के अत्याचारों का वर्णन करते हैं. आगे की पंक्तियों में वे देवताओं और ऋषि मुनियों के संग क्षीरसागर के तट पर जाकर श्री हरि से प्रार्थना करते हैं कि वे शीघ्र ही अत्याचारी रावण से मुक्ति दिलावें. भक्ति से प्रसन्न होकर श्री विष्णु प्रकट होते हैं और सभी को धीरज बंधाते हुए कहते हैं कि –जानि डरफु मुनि सिद्द सुरेशा* तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा* अंसन्ह सहित अमुज अवतारा*लेहउँ दिनकर बंस उदारा – हे मुनियों, सिद्धों तथा देवताओं ! मैं तुम्हारे कारण मानव शरीर धारण करूंगा. तुम भय मत करो. मैं उदार सूर्यकुल में अपने अशों के साथ मनुष्य अवतार धारण करुंगा.

भक्त कवि तुलसीदास जी ने ऋषि,मुनियों एवं समस्त देवताओं के मुख से श्रीहरि की जो स्तुति की है, वह अतुलनीय है. जय जय सुरनायक से लेकर नमत नाथ पद कंजा पढ़ते हुए शरीर में रोमांच हो आता है. नयनों से अश्रु बह निकलते हैं, वाणी गंभीर हो जाती है. और लगने लगता है कि हम भी उस पंक्ति में जा खड़े हुए हैं,जहां इतनी सुन्दर स्तुति हो रही होती है.

तुलसीदास जी जिस वातावरण में मानस की रचना कर रहे थे, वह समय संकट का समय था. उन्होंने वक्त की नजाकत को देखते हुए श्रीराम जी को केन्द्र में रखकर पूरा मानस रच डाला. श्री रामजी के अलावा कई अन्य पात्र भी इसमें आते हैं, उन्होंने उनके बारे में काफ़ी संक्षेप में वर्णन किया है. यहां विस्तार देने की जरुरत भी नहीं थी. वे तो सिर्फ़ और सिर्फ़ भगवान श्रीराम को एक ऎसे योद्धा के रूप में जनता के बीच लाकर उपस्थित करते हैं कि वे अपनी नीजि दुख भूलकर उनकी शरण में पहुंच जाएं और अत्याचारों का डटकर मुकाबला कर सकें.

वाल्मीक ऋषि राम के समकालीन थे. यह भी संभव है कि राजा दशरथ के राजमहल में उनका आना-जाना रहा हो. इसका लेखा-जोखा तो कहीं मिलता नहीं है. यह सिर्फ़ एक अनुमान भर है. चुंकि वे भी अपने समय के एक कुशल कवि रहे हैं, और उन्होंने जैसा देखा वैसा अपने कवित्त में उतार दिया. रामजन्म से पूर्व की घटना, दशरथजी का यज्ञ करने का वर्णन उन्होंने विस्तार से लिखा है. वे लिखते है कि शत्रुसूदन महातेजस्वी नरेश श्री दशरथजी पुत्रहीन होने के कारण पुत्रप्राप्ति की इच्छा से पुत्रेष्टि यज्ञ कर रहे थे . इसी समय अग्निकुंड से एक विशालकाय पुरुष प्रकट हुआ,जिसके हाथ में तपाए हुए जाम्बूनद नामक सुवर्ण की बनी थाली बहुत बड़ी थी और दिव्य खीर से भरी हुई थी, महाराज दशरथ को देते हुए कहते हैं

इदं तु नृपशार्दूल पायसं देवनिर्मितम*प्रजाकरं गृहान त्वं धन्यमारोग्यवर्धनम भार्याणामनुरूपाणामश्रीतेति प्रयच्छ वै*तास्सु त्वं लप्स्यासे पुत्रन यदर्थं यजसे नृप (बालकाण्ड का सोलहवां सर्ग- वालमीकी रामायण श्लोक १८-१९)

नृपश्रेष्ठ ! यह देवताओं की बनायी हुई खीर है, जो संतान प्राप्ति कराने वाली है. तुम इसे ग्रहण करो. यह धन और आरोग्य की भी वृद्धि करने वाली है.(*) राजन ! यह खीर अपनी योग्य पत्नियों को दो और कहो-“ तुम लोग इसे खाओ.” ऎसा करने पर उनके गर्भ से आपको अनेक पुत्रों की प्राप्त होगी, जिनके लिए तुम यह यज्ञ कर रहे हो.

कौशल्यायै नरपति पायसार्धं ददौ तदा(*)अर्धादर्धं ददौ चापि सुमित्रायै नराधिपः(२७) कैकेय्यै चावशिष्ठार्थ ददौ पुत्रार्थकारणात(*) प्रददौ चावशिष्ठार्थं पायसस्यामृतोपमम(२८) अनुचिन्त्य सुमित्रायै पुनरेव महामतिः(*) एवं तासां ददौ राजा भार्याणां पायसं पृथक (२९)

नरेश ने उस समय उस खीर का आधा भाग महारानी कौशल्या को दे दिया. फ़िर बचे हुए आधे का आधा भाग रानी सुमित्रा को अर्पण किया, बाद में जितनी खीर बच रही, उसका आधा भाग कैकेयी को दे दिया. तत्पश्चात उस खीर का जो अवशिष्ट आधा भाग सुमित्रा को अर्पित कर दिया. इस प्रकार नरेश ने अपनी सभी रानियों को अलग-अलग खीर बांटी.

प्रोद्दमाने जगन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम(*)कौसल्याजनयद रामं दिव्यलक्षणसंयुक्तम

( बालकांड १८ वां सर्ग-श्लोक १०)

छः ऋतुएं बीत गयीं, तब बारहवें मास में चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र एवं कर्क लग्न में कौशल्या देवी ने दिव्य लक्षणॊं से युक्त, सर्वलोकवन्दित जगदीश्वर श्रीराम को जन्म दिया. उस समय सूर्य, मंगल, शनि, गुरू और शुक्र- ये पांच ग्रह अपने-अपने उच्च स्थान में विद्यमान थे तथा लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति विराजमान थे.

जगुः कलं च गन्धर्वां ननृत्य्श्चाप्सरोगणाः(*) देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिश्च खात पतत.(१७) उत्सवश्च महानासीदयोध्यायां नजाकुलः(*) रथ्याश्च जनसम्बाधा नटनर्तक्संकुलाः (१८)

इनके जन्म के समय गन्धर्वों ने मधुर गीत गाए. अप्सराओं ने नृत्य किया. देवताओं की दुन्दुभियां बजने लगीं तथा आकाश से फ़ूलों की वर्षा होने लगी. अयोध्या में बड़ा उत्सव हुआ. मनुष्यों की भारी भीड़ एकत्र हुई. गलियां और सड़कें लोगों से खचाखच भरी थी. बहुत से नट और नर्तक वहां अपनी कलाएं दिखा रहे थे.

उन्होंने संस्कृत भाषा में राम के समूचे व्यक्तित्व को सूक्ष्मता से वर्णित किया है. इसके अलावा अन्य पात्रों के बारे में भी काफ़ी विस्तार से जानकारियां दी है. मसलन रावण के बारे में काफ़ी कुछ बतलाया गया है,जिसका प्रायः लोग अनुमान भर लगाते हैं. लेकिन वाल्मिकाजी ने उसके जन्म से लेकर उसके द्वारा किए जा रहे अत्याचारों पर भी काफ़ी लिखा है. चुंकि रामायण संस्कृत भाषा में रची गई है, अतः जनसामान्य इसे कम ही पढ़ पाते हैं. गीता प्रेस गोरखपुर ने उसका अनुवाद भी दिया है, अतः इसे जरुर पढ़ा जाना चाहिए.

. तुलसीदास जी ने मानस की रचना उस समय की जब इस देश में मुगलों का शासन था. अकबर सहनशील था और आपसी एकता और समरसता का पोषक था, किन्तु उसकी पृष्ठभूमि में स्थायी और मजबूत मुगल शासन की स्थापना ही उसका मकसद था. उस समय हिन्दू और मुसलमान आपस में खूब लड़ते थे. उधर शैव, शाक्त्य और वैष्णवों में भी आपसी मतभेद थे. दक्षिण में शिव कांची और वैष्णव कांची बन गए थे. समाज में सामाजिक ऊंच-नीच का भेदभाव चरमोत्कर्ष पर था तथा समाज में वर्गभेद पैदा हो गया था. न केवल समाज, राजनीति और साहित्य भी इसके शिकार थे.

संतो ने समाज में समरसता की दिशा में काम किया. इस दिशा में तुलसी ने रामचरित मानस की रचना कर परम उल्लेखनीय काम किया. उन्होंने सर्वत्र अपने काव्य में राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सौहार्द को ऎसा स्थान दिया कि लोग आपस में मैत्री और सदभाव से जीवन जीने को विवश हुए. तुलसी ने उसके लिए समाज, परिवार,आध्यात्म, कर्म, राजनीति आदि सभी क्षेत्रों को चुना तथा समाज में व्याप्त असमानता, पाप, अनाचार, कटुता और धर्महीनता को दूर करने की कोशिश की. वस्तुस्थिति यह बनी की वे भारतीय समाज के लोकनायक बन गए.

उन्होंने भाषाओं में भी समरसता स्थापित की. अवधी और ब्रज दोनों का समन्वय किया. मानस में हिन्दी, संस्कृत दोनों का प्रयोग है. वर्णिक और मात्रिक सभी छंद है. लेखनी में क्लिष्टता और सरलता की समरसता है. इसमें कथाएं भी हैं और स्तुतियां भी. मानस में पुराण, कथा, इतिहास सभी कुछ है. तुलसी ने समाज को स्नेह, सौहार्द, ममता, सहानुभूति का अनुपम उपहार दिया है. इसमें कहीं विषमता, वैमनस्य और आपसी कटुता को जगह नहीं दी. यही समरसता समता तुलसी साहित्य की विशेषता है और यही सच्चे भक्त और साधक की पहचान है.

आज वातावरण फ़िर विषाक्त हो गया है. श्री राम का नाम भी अब राजनीति की दृष्टि से देखा जाने लगा है. बावरी मस्जिद के गिरने के बाद उठे विवाद का फ़ैसला भी आ चुका है कि अयोध्या ही श्रीराम की जन्मभूमि है और उस पर भव्य मंदिर बनना चाहिए. लेकिन आज हिन्दू फ़िर असंगठित हुआ है. केवल कुर्सी के चक्कर में पार्टियों में मतभेद बना हुआ है. बहुत कुछ हो रहा है लेकिन यदि राजनीति का चश्मा उतार दिया जाता है तो इसके निर्माण में देर नहीं लगेगी. जिस तरह श्रीराम हिन्दूओं के आराधक देव हैं, उसी प्रकार वे मुस्लिम भाइयों के भी प्रिय हैं. श्री राम कभी किसी के लिए भी अप्रिय हो नहीं हो सकते.

श्रीराम जी के जन्मोत्सव को भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में रह रहे भारतीय बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं. श्री राम और श्री कृष्ण हमारी संस्कृति के पितृ-पुरुष हैं. अतः हमारा उत्तरदायित्व बनता है कि हम केवल श्रीराम अथवा श्रीकृष्ण को सब कुछ मानकर पूजा-अर्चना ही नहीं करें बल्कि उनके चत्रित्र को अपने जीवन में उतारते हुए, एक समरस समाज की स्थापना करें, जहां न तो कोई ऊँच हो, न कोई नीच, न कोई अनाचार हो और न ही कोई पाप. केवल और केवल हो तो आपस में भाईचारा हो, सौहार्द प्रेम हो अनन्य प्रेम का भाव भरा हो हम सबके भीतर. क्योंकि मानस में पिता, पुत्र, पति, पत्नी, सास, बहू, भाई-भाई, स्वामी, सेवक के बीच सौहार्द की चर्चा से सारा मानस ओतप्रोत है तो फ़िर हमारे बीच दुर्गुण कैसे पनप सकता है.

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गोवर्धन यादव.

103 कावेरी नगर ,छिन्दवाडा,म.प्र. ४८०००१
07162-246651,9424356400

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