गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

व्यवहार में लाएं मानव धर्म - डॉ. दीपक आचार्य

व्यवहार में लाएं

मानव धर्म

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

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बातें तो हम सभी इंसानियत की करते हैं और इन्हीं पर भाषण-उपदेश झाड़ते रहते हैं। लेकिन असल में हम कितने फीसदी इंसानियत अपना रहे हैं, इस एक मात्र प्रश्न का जवाब हम तलाश लें तो हमारे जीवन की सारी सच्चाई सामने आ जाए।

इंसान किसी भी जात-पात या धर्म-सम्प्रदाय का हो, चूंकि पहले वह मनुष्य है इसलिए उसके लिए मानव धर्म सर्वोपरि है। हर धर्म इंसानियत की बात करता है, इंसानियत पर चलने की राह दिखाता है और इसी को हर इंसान के जीवन का लक्ष्य स्वीकार करता है।

जो इंसानियत को पूरी तरह अंगीकार करता है वह सच्चा इंसान है बाकी सारे आंशिक या नकली इंसानों की श्रेणी में शुमार किए जा सकते हैं। हर समझदार इंसान को अच्छी तरह पता है कि इंसान को कैसा होना चाहिए, इंसान के धर्म लक्षण क्या हैं और उसका दूसरे इंसान तथा समाज के साथ कैसा बर्ताव होना चाहिए।

लेकिन हम लोगों ने अपने-अपने स्वार्थों और ऎषणाओं को देखकर परिभाषाएं गढ़ ली हैं और इसका खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ रहा है जहाँ इंसानियत के मूल तत्वों पर मलीनताएं और दुराग्रह-पूर्वाग्रह हावी हैं।

हम सभी लोग सामाजिक समरसता, सामूहिक विकास, वसुधैव कुटुम्बकम्, अनेकता में एकता और इस जैसे कई नारों और स्लोगन्स पर घण्टों चर्चा करते रहते हैं, बोलते हैं, भाषण झाड़ने का माद्दा रखते हैं लेकिन व्यवहार में हम कितने मानवीय हैं , यह प्रश्न हम सभी को अपने आप से पूछने की जरूरत है।

जो इंसान मानवता को स्वीकार करता है, मानव धर्म को दिल से अंगीकार कर लेता है उसके लिए संसार भर में कहीं कोई समस्या रहती ही नहीं,  वह सभी प्रकार के राग-द्वेषों और संकीर्णताओं से ऊपर उठ जाता है।

वस्तुतः आज की सारी समस्याओं की जड़ सिद्धान्तों और व्यवहार के बीच की बढ़ती जा रही खाई है और इसी का परिणाम है कि गरीबी, अभाव और समस्याएं बढ़ती जा रही हैं।

हम लोग खुद का घर भरने और अपने ही अपने लिए जीने के इतने आदी हो गए हैं कि हमें यह पता ही नहीं रहता कि हमारे आस-पास के लोग कितने अभावों में जी रहे हैं, उन्हें सामान्य जीवन निर्वाह में कितनी समस्याएं आ रही हैं। पता रहे तब भी हमारे भीतर की मानवीय संवेदनाएं इतनी गायब हैं कि हम दूसरों के दर्द, पीड़ाओं और समस्याओं को देख कर भी मुँह फेर लिया करते हैं, कन्नी काट लेते हैं।

हमने अपने लिए जीने की ऎसी बीमारी पाल ली है जहां हमें अपने सिवा कोई और दिखता ही नहीं। घोर कलियुग के प्रभाव में आए हम लोग पैतृक जमीन-जायदाद और संसाधनों के लिए अपने माँ-बाप, भाई-बहनों तक को धकिया दिया करते हैं, उनसे छीन कर अपने नाम कर लिया करते हैं, और कई बार तो परिवारों में खूनी संघर्ष और हत्या की घटनाएं कारित कर दिया करते हैं, ऎसे में कहाँ गया हमारा परिवार, समाज और क्षेत्र। बंधुत्व और सौहार्द्र से लेकर सब कुछ जाने किस खूंटी पर टांग दिया है हमने। 

अपने आपको परम धार्मिक, अहिंसक और संवेदनशील बताते हुए लोकप्रियता पाने के सारे जतन करते हुए हम कभी यह नहीं सोचते कि हम जो कुछ कर रहे हैं वह आडम्बर और सौ फीसदी झूठ के सिवा कुछ नहीं है। हमारे दिल में न मानवता है, न संवेदनाएं रची-बसी हैं। केवल भरमाने और अपने आपको प्रतिष्ठित बनाए रखने के लिए हम इंसानियत, सेवा और परोपकार की बातें करते हैं।

हममें से कितने लोग हैं जिनका दिल दीन-दुखियों को लेकर द्रवित होता है, कितने लोग हैं जो अपनी कमाई का कुछ हिस्सा गरीबों, जरूरतमन्दों और अभावग्रस्तों के लिए खर्च करते हैं। अपनी पूरी कमाई का हिसाब लगा लें और उसमें इस बात का आकलन करें कि क्षेत्र के जरूरतमन्दों की सेवा में हमारा योगदान कितना है, तो शर्मनाक स्थिति ही सामने आएगी।

दोष सभी का है। हम सभी लोगों ने समाज को दरकिनार कर अपने आपको स्वयंभू बना लिया है। हममें से बहुत से लोग हैं जो समाज के नाम पर प्रतिष्ठित तो हो जाते हैं लेकिन समाज के लिए कितना योगदान देते हैं?

जिस समाज या क्षेत्र में लोगों को सामान्य जीवन निर्वाह में किसी भी प्रकार की कोई दिक्कतें हों, अभावों के कारण जीवन दयनीय हो रहा हो, उन इलाकों में रहने वाले वैभवशाली लोगों की संवेदनाओं को देखें तो साफ सामने आएगा कि इन लोगों को अपनी हवेलियों, फार्म हाउसों और मौज-शौक से ही फुर्सत नहीं है। गरीबों, अभाव ग्रस्तों और विपन्नों को वे हमेशा हेय समझते हैं और तिरस्कार करते हैं।

हमारे होते हुए अपने आस-पास या क्षेत्र में इंसान दीन-दुःखी रहे, अभावों में जीने को विवश हो, उसकी जरूरतों की पूर्ति न हो पाए, तो हमारा जीना व्यर्थ है। इससे तो अच्छा है कि हम विदेशी भोग भूमि में पैदा होते जहां मानव धर्म की अपेक्षा भोग-विलासिता, स्वार्थ और अपने लिए जीने को प्रधानता प्राप्त हो।

कहना न होगा कि देश में पूंजीपतियों और पूंजीवादियों के कारण से सामाजिक विषमताएं व्याप्त हैं। जो पैसा समाज और देश के लिए खर्च होना चाहिए वह कुछ फीसदी लोगों की गिरफ्त में है। और ये लोग धर्म के नाम पर पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं जिसका कोई उपयोग नहीं हो पा रहा है।

आज डॉ. भीमराव अम्बेड़कर जयन्ती है। हम सभी बाबासाहब के उपदेशों को दिल से स्वीकारें, व्यवहार में लाएं और सामाजिक समरसता के साथ सामूहिक विकास एवं राष्ट्रीय उत्थान में भागीदारी निभाएं।

सभी को अम्बेडकर जयन्ती की शुभकामनाओं सहित ......।

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