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रचना और रचनाकार (२२) : क्षणिका का स्वरूप / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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लघुकाय कविताओं के लिए “क्षणिका” शब्द का उपयोग पहली बार रवींद्र नाथ ठाकुर ने किया था. उनकी छोटी छोटी रचनाओं का काव्य संग्रह “क्षणिका” नाम से...

लघुकाय कविताओं के लिए “क्षणिका” शब्द का उपयोग पहली बार रवींद्र नाथ ठाकुर ने किया था. उनकी छोटी छोटी रचनाओं का काव्य संग्रह “क्षणिका” नाम से प्रकाशित हुआ था. बाद में “स्फुलिंग” शीर्षक से एक काव्य संग्रह में उन्होंने कुछ और छोटी रचनाएँ दीं जिनमें, छोटी होने के बावजूद, अर्थ व्यंजना और भावों की गहनता स्पष्ट परिलक्षित होती है. रवींद्रनाथ की इन कविताओं की चर्चा अधिक नहीं हुई है, न ही भारतीय भाषाओं में –हिंदी सहित- इनका अनुवाद ही हुआ है. हाँ, “स्ट्रे बर्ड्स” शीर्षक से ऐसी कविताओं का एक संकलन अंगरेज़ी में ज़रूर आया है.

क्षणिका का क्या अर्थ होता है और क्या सभी लघुकाय कविताओं के लिए यह एक उपयुक्त संज्ञा है? हिंदी शब्द कोश में क्षणिका का केवल एक ही अर्थ मिलता है, बिजली. मेघ-द्युति क्षण भर के लिए चमकती है अतः, क्षणिका. क्षणिका मेघ-विद्युत है. ज़ाहिर है, क्षणिका शब्द क्षण से बना है और क्षण के उपयोग के अनुसार कई अर्थ हो सकते हैं. यह एक लमहा है, समय की गति का एक बिंदु है. साथ ही यह “अवसर” और “अवकाश” के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है. शुभ-काल के लिए, उत्सव और आनंद के लिए भी. क्षण का प्रयोग देखा जा सकता है.“वह क्षण (अवसर) आपने गँवा दिया जिसे आप भुना सकते थे”, “बहुत दिन बाद यह क्षण (अवकाश) मिला है, कुछ देर साथ बिता लें”, आख़िर यह क्षण (शुभ-काल) आ ही गया जिसका इंतज़ार वर्षों से कर रहे थे”. “अब रोको नहीं मुझे इस क्षण (उत्सव) को भरपूर मना लेने दो”.

रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपनी लघु कविताओं को क्षणिकाएँ क्यों कहा होगा? क्या सिर्फ इसलिए कि वे लघुकाय हैं? क्षण भर में उन्हें पढा / सुना जा सकताहै? याद कीजिए, जापानी हाइकु को “एक श्वासी” कविता कहा गया है, हम एक साँस में उसे पढ सकते हैं. क्या छोटी कविताएँ, क्योंकि वे पल भर में पढी जा सकती हैं, केवल इसीलिए क्षणिकाओं की कोटि में आती हैं? लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि रवींद्रनाथ क्षणिकाओं के रूप में कुछ और भी तलाश करते हैं. वे उनमें विद्युत की चमक भी देखते हैं. शायद इसी बात पर बल देने के लिए उन्होंने अपनी छोटी कविताओं के एक अन्य संग्रह को “स्फुलिंग” कहा. स्फुलिंग अग्नि-कण या चिंगारी को कहते हैं. चिंगारी में निःसंदेह, वह कितनी ही क्षणिक क्यों न हो, एक चमक होती है और वह भड़क भी सकती है. उसकी तासीर बिला- शक तेज़ है. सही जगह मिल जाए तो आग लगा दे. कविता में जबतक यह चमक और भावों को उत्तेजित करने की तासीर न हो हम उसे कविता भला कैसे कह सकते हैं? जब हम क्षणिकाओं की बात करते हैं तो ये केवल ऐसी ही लघु कविताएँ हो सकती हैं जो हमारी चेतना को आलोकित कर दें और यदि ज़रूरी हो यो उसे कर्म के लिए प्रज्वलित भी करें. मुझे लगता है रवींद्रनाथ ठाकुर के मन में लघु कविताओं को “क्षणिका” या “स्फुलिंग” कहते समय ये सारी बातें अवश्य रही होंगी.

हिंदी में छोटी-छोटी स्फुट अभिव्यक्तियों के लिए “क्षणिका” नाम अब रूढ हो गया है. वैसे कणिका, शब्दिका, मनका, दंशिका, हंसिका आदि नामों से भी यह पुकारी गई है. अधिकांश ये सूक्ति कथन या परिभाषाएं बनकर रह जाती हैं. ऐसी कविताओं को क्षणिका कहने में हिचक होना स्वाभाविक है क्योंकि इनमें भावों की गहनता और अर्थ-व्यंजना की कमी रहती है.

हिंदी में ऐसी छोटी कविताएँ जिन्हें सहज रूप से क्षणिकाएँ कहा जा सकता है और जिनमें अर्थ-व्यंजना के साथ-साथ भावों की गहनता और व्यापकता, आत्मानुभूति की तीव्रता और काव्य-तत्व है, अज्ञेय के समय से ही लिखी जा रहीं हैं.“अरी ओ करुणामयी” (1959) की दो प्रसिद्ध छोटी-छोटी कबिताओं को उद्धरित करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ. –

सोन मछली : चिड़िया की कहानी :

हम निहारते रूप उड़ गई चिड़िया

कांच के पीछे काँपी, फिर

हाँप रही मछली थिर

रूप तृषा सी हो गई पत्ती

(और काँच के पीछे)

है जिजीविषा

ये कविताएँ भले ही क्षणिका के नाम से न लिखी गईं हों लेकिन इन्हें क्षणिका की कोटि में रखने में किसी को हिचक नहीं हो सकती. श्रीकांत वर्मा ने भी “मायादर्पण” में कुछ बहुत अच्छे चित्र प्रस्तुत किए हैं. “जंगल अवाक” शीर्षक से उनकी एक कविता है –

“जून की दुपहरी, बाज़ का झपट्टा, चिड़िया की चीख़ / जंगल अवाक”

बच्चन के दो काव्य संग्रहों,“कटती प्रतिमाओं की आवाज़” और “उभरते प्रतिमाओं के रूप”

में भी संकलित कुछ छोटी कविताएँ क्षणिकाओं की कोटि की ही हैं. इनमें मुख्यतः व्यंग्य का स्वर है.

तुम और मैं : सीढी :

तुमने हमें मैंने छत पर पहुंच कर

पूज-पूज कर सीढी को उपेक्षा से देखा

पत्थर कर डाला उसने कहा

वे जो हम पर जुमले कसते हैं “अच्छा उतरना”

हमें ज़िंदा तो समझते हैं

भवानी प्रसाद मिश्र ने भी क्षणिकाएँ सरीखी छोटी छोटी कविताएँ खूब लिखी हैं लेकिन ये नीति-वचन और सूक्तियाँ अधिक हैं.

कादम्बनी ने शायद सबसे पहले क्षणिकाएँ और सीपिकाएँ नाम से लघु कविताओं को छापना आरम्भ किया था. वीणा में “मनके” नाम से कुछ छोटी कविताएँ छपीं. जैसे,

“बादल में लुका छिपा / भाग रहा चांद / जैसे ख़रगोश कोई / ढूँढ रहा माँद” इस तरह की सारी कविताएँ बिना किसी संकोच के क्षणिकाएँ ही कही जाएँगी.

आजकल हिंदी में हाइकु लिखने का प्रचलन ख़ूब हो गया है. हाइकु लघुकाय तो है ही (इसमें केवल 17 अक्षरों में सिमिटी 5-7-5 अक्षरों की 3 पंक्तियां होती हैं) कविता की अन्य विशेषताएं जैसे, भावों की गहनता, अभिव्यक्ति की सहजता, अनुभूतियों की तीव्रता आदि भी इनमें देखी जा सकती हैं. किंतु इन्हें क्षणिकाएँ नहीं कहा जा सकता क्योंकि एक श्वासी होने के बावजूद इन कविताओं का अपना एक प्रारूप है – अक्षरों और पंक्तियों की एक निश्चित गणना है. क्षणिकाओं में इस तरह का कोई बंधन नहीं है. यही कारण है कि दोहों, चौपाइयों आदि को भी हम क्षणिकाओं की कोटि में नहीं रखते. हाँ, इन सभी प्रारूपों में एक ख़ास बात है जो क्षणिकाओं में समान रूप से पाई जाती है. क्षणिकाओं की तरह ही ये अपने आप में पूर्ण और स्वतंत्र हैं. पूरी तरह गवाक्ष-हीन, हर दोहा, हर हाइकु, ग़जल का हर शेर, हर क़तः एक मुक्तक होता है.

जब हम क्षणिका के बारे में यह कह सकते हैं कि वह अपने कथन में पूर्ण है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह अपने वातावरण या परिवेश के प्रति उदासीन है. प्रायः क्षणिकाएँ अपने परिवेश के प्रति अति संवेदनशील रहती हैं. सजग और सतर्क रहती हैं. वे सामाजिक विद्रूपताओं और विषमताओं पर पैनी नज़र रखती हैं. यही कारण है कि अधिकतर क्षणिकाओं में कटाक्ष और व्यंग्य के स्वर प्रचुर मात्रा में दिखाई देते हैं.

क्षणिकाएँ जहाँ मुक्त और अपने आप में पूर्ण होती हैं वहीं वे अतुकांत भी होती हैं. उनमें कहीं कोई तुक यदि कभी दिखाई भी देती है तो यह एक निश्चित विधान के रूप में नहीं होती. किसी नियम का पालन नहीं करती. यह केवल कथन को आकर्षक बनाने के लिए लाई जाती है. हाँ, क्षणिका का लघुकाय होना ज़रूरी है. लेकिन उसकी काया कितनी लघु हो, यह भी कहना मुश्किल है. वह चुने हुए अक्षरों की एक पंक्ति भी हो सकती है और 10 – 12 पंक्तियों की एक कविता भी हो सकती है. बस इतनी लंबी न हो कि उसे लघु कहा ही न जा सके.

उमेश महादोषी, बलराम अग्रवाल, सुरेश सपन जैसे उत्साही रचनाकार आज क्षणिका को साहित्य में एक सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए प्रयत्नशील हैं. इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय भाषाओं में क्षणिकाएँ रवींद्रनाथ ठाकुर के ज़माने से लिखी जा रही हैं किंतु साहित्य में वे अभी तक हाशिए पर ही पड़ी हैं. हिंदी में लघु कथाओं और क्षणिकाओं का लेखन लगभग साथ-साथ आरम्भ हुआ किंतु लघुकथा ने अपना स्वतंत्र वजूद हासिल कर लिया. क्षणिका के साथ ऐसा नहीं हो पाया. वह एक छोटी कविता ही बनकर रह गई. बहुत अरसे तक क्षणिकाओं की कोई स्वतंत्र पुस्तक नहीं आई. उमेश महादोषी शायद पहले ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने “आकाश में धरती नहीं है” (1991) शीर्षक से क्षणिकाओं का एक अलग संग्रह निकाला. उन्होंने पहली बार “अंकुर आवाज़” पत्रिका का एक क्षणिका विशेषांक (1988) भी सम्पादित किया.

आजकल “नैट’ पर कुछ बहुत अच्छी क्षणिकाएँ प्रस्तुत की जा रही हैं. उन्हें देख/पढ कर क्षणिकाओं का भविष्य निःसंदेह उजला दिखाई देता है. इनमें वक़्त की आवाज़ है और वक़्त से लड़ने का माद्दा भी है. अविराम ब्लोग पर मार्च 2013 अंक में डॉ. मिथलेश दीक्षित कहती हैं - हँस..हँस दे / कल / न जाने / काल क्या कर दे”. अनिता ललित नवंबर 2012 अंक में दुःखी मन से कहती हैं – “हाथ उठाकर दुआओं में / अक्सर तेरी खुशी मांगी थी मैंने / नहीं जानती थी / म्रेरे हाथों की लकीरों से ही / निकल जाएगा तू” लेकिन ज्योति कालड़ा का दुःख व्यक्तिगत नहीं है. वे कहती हैं, “राम और अल्लाह का वास्ता देकर / पहले झगड़ों को / सुलझाया जाता था / आज / सुलगाया जाता है”. महावीर रवांल्टा एक ग़रीब और शोषित का एक संवेदनशील चित्र कुछ इस प्रकार खींचते हैं – मैंने पसीने से तर / कमीज़ को / निचोड़ना चाहा / लेकिन क्या देखता हूँ कि रक्त का / एक एक क़तरा निकल रहा है”. इतना सब होते हुए भी अनिल जनविजय आशा का दामन नहीं छोड़ते हैं क्योंकि – “बेचैन होते हैं / फड़फड़ाते हैं / पेड़ों से टूट कर गिर जाते हैं / पुराने पत्ते / नयों के लिए / यह दुनिया छोड़ जाते हैं”.

काव्यांचल डॉट कॉम में विष्णु प्रभाकर और भगवत रावत जैसे प्रतिष्ठित कवियों की क्षणिकाओं को प्रकाशित किया है. विष्णु प्रभाकर की इन क्षणिकाओं का आस्वादन करें -

1, इतिहास 2, डूबना

आदमी मर गया कभी का मैंने उसकी कविता पढी

पीढियाँ ज़िंदा हैं शब्द थे केवल उन्नीस

सूरज बुझ जाएगा एक दिन पर मैं डूबा तो

पर आकाश अमर है डूबता ही चला गया

सूरज के बिना अवश अबोध आकंठ

वह आकाश कैसा होगा?

एक अन्य कविता, “बिके हुए लोग में वे कहते हैं – “चुके हुए लोगों से / ख़तरनाक हैं / बिके हुए लोग / वे / करते हैं व्यभिचार / अपनी ही प्रतिभा से”.

विष्णु प्रभाकर जहाँ बिके हुए लोगों की प्रतिभापर व्यंग्य करते हैं वहीं भगवत रावत उनके डर को रेखांकित करते हैं – “हमने उनके घर देखे / घर के भीतर घर देखे / घर के भी तलघर देखे / हमने उनके / डर देखे”. आज की क्षणिकाओं में यथार्थ-बोध की पर्याप्त अभिव्यक्ति हुई है और इसके चलते व्यंग्य का स्वर भी मुखर हुआ है.

पिछले वर्ष (2012) में मेरा एक कविता-संग्रह “उसके लिए” प्रकाशित हुआ था. इसमें मुख्यतः प्रेम और प्रकृति विषयक छोटी छोटी कविताएँ थीं. समीक्षार्थ उसे मैंने “अविराम” के संपादक डॉ. उमेश महादोषी को भेजा. महादोषी जी ने इन कविताओं को क्षणिकाओं की कोटि में रखा है. इसकी कुछ कविताएँ उन्होंने ‘क्षणिका’ शीर्षक से ही “अविराम” में प्रकाशित कीं और कुछ अन्य को “अविराम ब्लॉग” में डाल दिया. मैंने कभी सोचा न था कि ये कविताएँ कभी क्षणिकाओं के रूप में प्रकाशित होंगी. क्या मेरी छोटी कविताएँ सचमुच क्षणिकाएँ कही जा सकती हैं? यह निर्णय तो अब सुधी पाठक ही लेंगे. किंतु इन्हें रचते समय मेरे मन में यह भाव कभी नहीं था कि मैं क्षणकाओं की रचना कर रहा हूं.

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(अविराम साहित्यिकी, अक्टूबर-दिसम्बर 2013)

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रचनाकार: रचना और रचनाकार (२२) : क्षणिका का स्वरूप / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा
रचना और रचनाकार (२२) : क्षणिका का स्वरूप / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा
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