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शादी का निमंत्रण / रहस्य रोमांच की कहानी / रामकिशोर पंवार

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रहस्य एवं रोमांच से भरी दिल को दहला देने वाली कहानी

शादी का निमंत्रण

सत्यकथा :- रामकिशोर पंवार

मई की तपती दोपहर अकेला मुंह को ढ़ाके मैं मोटर साइकिल से चला जा रहा था। धूल से भरे रास्तों पर विशेष कर हनुमान डोल से रानीपुर तक आने तक जान पर आ जाती है। सर्पकार बहने वाली देनवा नदी पता नहीं क्यों इन गांव वालों के लिए हर साल नई मुसीबत लेकर आती है। पहाड़ी पानी आता तो ऐसा है कि सालो तक पानी की कमी नहीं रहेगी , लेकिन पहाड़ी पानी को रूकने का कोई बंदोबस्त नहीं होने के कारण वह आने के साथ ही बह जाता है। जिन नदी में बरसात में पानी आदमी के कद से ज्यादा बहता रहता है उसी नदी में पानी की जगह बड़े - बड़े पत्थरों एवं रेतों के ढ़ेर ने ली थी जिसकी वजह से मोटर साइकिल तो दूर रही साइकिल भी निकाल पाना दूभर रहता है। मैंने भी किसी तरह रेतों के ढ़ेर से अपनी गाड़ी तो निकाल ली और आमढ़ाना गांव की सरहद में आ पहुँचा। जिस गांव में अकसर चहल - पहल रहती थी आज उस गांव में सन्नाटा पूरी तरह छाया हुआ मुझे आशंकित कर रहा था। सोचा था कि गांव के किसी मकान के सामने रूक कर दो घुट पानी पी लूं लेकिन मकानों के किवाड़ बंद रहने से मैं प्यासे कंठ ही गांव की सड़क से अपने घर के लिए निकल पड़ा। अभी दो कदम भी नहीं पहुँच पाया था कि मुझे दूर सड़क पर किसी के खड़े होने की आकृति दिखाई दी।

गांव की सरहद के उस पार नदी के पहले उस सुनसान सड़क पर आखिर कौन खड़ा है यह मैं समझ नहीं पा रहा था। जिस रास्ते पर अभी तक इंसान तो दूर पशु - पक्षी की मई की तपती दोपहर में एक युवती ने हाथ देकर रोकना चाहा। पहले तो मैंने सोचा कि अनजान युवती कहीं मुझे रोक कर कोई मुसीबत में तो नहीं डाल देगी ....? इसी सोच के बाद विचार आया कि शायद इस तपती दोपहर में उसे आगे जाना होगा। कोई बस या गाड़ी के अभी तक न आने की वजह से शायद बेचारी को कोई जाने का साधन न मिला हो... विचारो में खोया मैं अनायास उस युवती के पास रूक गया। मैं खुद हैरान हूँ कि मेरी गाड़ी को जब मैंने ब्रेक लगा कर रोका नहीं तब वह आखिर कैसे रूक गई.....! मैंने अपने चेहरा को ढंक़े कपड़े को हटा कर उस अनजान युवती से उसके द्वारा हाथ देकर गाड़ी रोकने का कारण जानना चाहा इसके पहले ही वह बोली ‘‘क्या मैं आपके साथ आगे तक चल सकती हूँ........!’’ तपती दोपहर में उस तीखे नाक नक्श वाली उस युवती के हाथों में एक प्लास्टिक की थैली थी।

मई की तेज धूप में सुनसान सड़क पर लिफ्ट मांगती अनजान युवती को देख कर मैं कुछ पल के लिए डर गया। आजकल शहरों में अनजान युवतियाँ सुनसान सडक़ों पर अकसर लोगों से लिफ्ट मांग कर उन्हें ब्लेकमेल करती हुई पाई जाती है। ऐसे में हो सकता है कि गांवों में भी इस तरह की शहरी कुसंस्कृति पहुँच गई हो.... तरह - तरह के ख्यालों के बीच जब मेरी गाड़ी अनायास उस युवती के बगल में जाकर अचानक बंद हो गई तो मैं सहम गया। मैं हिम्मत करके उससे कुछ पुछता उसके पहले ही वह अपनी बात कह चुकी थी।

मैं आसपास नजर दौड़ाई मुझे आजू - बाजू - आगे-पीछे जब कोई नहीं दिखा तो मैं उसे बैठने का इशारा करता उसके पहले ही वह मेरी पीछे वाली सीट पर बैठ चुकी थी। उसने अपनी ओढऩी से अपना चेहरा छुपा रखा था। सिर्फ आँखें ही दिखाई पड़ रही थी। मुँह ढंक़ने के बाद भी उसकी बनावट से ऐसा लगता था कि दुबली - पतली उस तीखे नाक नक्श वाली अनजान युवती से मैं उसके बारे में कुछ पुछ पाता वह ही बोल पड़ी -

‘‘आप कहाँ तक जा रहे है.......?

जब मैंने उसे सारनी तक जाने का बताया तो वह बोल पड़ी -

‘‘तब तो मैं आपके साथ रानीपुर तक चल रही हूँ......!’’

मैं अचानक तेज हवा का झोंका न जाने कहां से आया मैं और गाड़ी लहरा कर फिसल जाती इसके पहले ही उस युवती ने कस कर मुझे अपनी बाँहों में दबोच लिया। एक पल के लिए मैं उसकी इस हरकत से हैरानी में पड़ गया लेकिन फिर संभला तो मैंने अपनी लहराती गाड़ी को कच्चे रास्ते से मुख्य सड़क पर लाया और फिर सीधे रानीपुर की ओर निकल पड़ा। आज सूरज आग उगल रहा था। धूल और पसीने से पूरी तरह नहा चुका मैं कुछ पल के लिए तो भूल ही गया कि मेरी पीछे वाली सीट पर कोई बैठी हुई है..........!

एक बार फिर उस अनजान युवती ने बातचीत का सिलसिला शुरू करते हुये बताया कि वह आमढाना के पास के किसी गांव की रहने वाली है। यादव जाति की इस युवती ने स्वयं का नाम संगीता बताया। उसके अनुसार वह दो बहने है तथा उसकी बउ़ी बहन रानीपुर में रहती है। घर में मां और बाबा रहते हैं। जब वह दो महीने की थी तब उसके पापा को धाराखोह के जंगल में शेर खा गया था। ग्वाले जिसे यादव भी कहा जाता है। इस जाति के लोगों का मुख्य पेशा दूध - दही - घी का रहता है। संगीता के परिवार में भी दस गाये और बीस भैंसों का लम्बा - चौड़ा लावा लश्कर है। पूरे जानवरों का दाना पानी उसकी मां ही करती है। दादा जिसे वह बाबा कहती है वह काफी बूढ़े हो चुके है। ग्यारहवीं तक पढ़ी संगीता बी.ए. फायनल कर रही थी कि इस बीच उसकी शादी तय हो गई। वह अपनी शादी के कार्ड लेकर अपने जीजा के घर जाकर अपनी बहन और जीजा को अपनी शादी की तैयारियों के लिए उन्हें सपरिवार लाने जा रही है।

उसकी बातचीत का सिलसिला चल रहा था इस बीच कब रानीपुर आ गया मुझे पता भी नहीं चला। बस स्टैण्ड से कुछ दूर पहले ही आम की अमराई के पहले एक मकान के पास उसने मुझे कहा ‘‘बस यही रोक दीजिए .......!’’ मेरी गाड़ी की गति धीमी होती ही वह गाड़ी से उतरी और सामने की ओर चली गई........ उसने धन्यवाद देना तो दूर इस तपती धूप में पानी तक पीने के लिए नहीं कहा। उसका यह व्यवहार मुझे काफी अटपटा लगा लेकिन मुझे क्या लेना - देना मैंने एक बार फिर अपनी गाड़ी को गति दी और मैं निकल पड़ा अपने स्थान के लिए। लौटते समय मैं बरेठा से आने के कारण उस घटना को लगभग भूल गया था। मई के महीने के पहले सप्ताह की इस घटना के ठीक एक सप्ताह बाद उसी दिन उसी समय मुझे एक बार फिर उसी सड़क से आना पड़ा। आज भी उसी स्थान पर खड़ी वह युवती ने मुझे अपने करीब आता देख हाथ दिया। पहले तो मेरी इच्छा हुई कि चलो चला चले लेकिन यह क्या हुआ ..... मेरी गाड़ी उसके करीब आने पर अचानक बंद हो गई।

आज उस युवती ने इस तपती दोपहर को अपने चेहरों को ढका नहीं था। उससे जैसे ही मेरी आँखें चार हुई कुछ पल के लिए पता नहीं मुझे क्या हो गया। इस बीच वह पीछे की सीट पर बैठ चुकी थी। मैंने अपनी मोटर साइकिल स्टार्ट की ओर हम निकल पड़े उसी रास्ते पर जिससे पहले संग - संग जा चुके थे। आज भी वही हुआ जो इसके पहले हुआ था ठीक उसी स्थान पर तेज हवा का झोंका आया और मैं संभल पाता इसके पहले ही संगीता ने मुझे अपनी बाँहों में जकड़ लिया। आज उसकी यह हरकत मुझे कुछ अच्छी नहीं लगी पर मैं कुछ कह भी नहीं पाया। हम दोनों खामोश चले जा रहे थे। संगीता ने एक बार फिर अपनी चुप्पी तोड़ते हुये मुझे कहा ‘‘आप मुझसे सिर्फ इस बात के लिए नाराज है न कि मैंने आपको पानी तक के लिए क्यों नहीं पुछा ....!’’ मैं एक पल के लिए तो दंग रह गया कि आखिर मेरी दिल की बात यह कैसे जान गई......! मुझे तो काटो तो खून नहीं मैं उसकी बातों को सुन कर दंग रह गया। उसने ही बताया कि उसका जीजा उस पर बुरी नजर रखता है। यदि मैं उसके उसके जीजा के घर चला जाता तो उसे वह सवालों के घेरे में ऐसे घेर लेता कि वह उसका जवाब नहीं दे पाती। संगीता की कहीं -सुनी बातों को मैंने इस कान से सुना और उस कान से निकाल दिया। बातचीत का सिलसिला समाप्त होता इसके पहले वही अमराई और वहीं मकान के आते ही मेरी मोटर साइकिल अचानक बंद हो गई।

संगीता कब उतरी मुझे पता भी नहीं चला। मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो संगीता नहीं थी। मैंने गाड़ी स्टार्ट की ओर आगे की ओर चल पड़ा। अब इसे संयोग ही कहा जा सकता कि मई के तीसरे सप्ताह ठीक उसी दिन उसी समय मेरा एक बार फिर रानीपुर मार्ग से जाना हुआ। आज मुझे पूरा विश्वास था कि आज मुझे संगीता जरूर मिलेगी। अगर मिली तो उससे यह सवाल करूंगा कि संगीता तेरी शादी कब की है .......? क्या वह मुझे अपनी शादी का निमंत्रण नहीं देगी......! संगीता को लेकर मेरे मन में ढेर सारे सवाल उठने लगे। इस बार सवालों में मैं ऐसा खोया कि मुझे पता ही नहीं चली कि वह जगह कब आ गई जहां संगीता मेरा इंतजार कर रही थी। पास आता देख संगीता मुस्करा गई। आज भी मेरी मोटर साइकिल संगीता के करीब आते ही बंद हो गई। संगीता मेरी मोटर साइकिल की पीछे की सीट पर बैठ गई। इस बार उसके हाथों में मेंहदी लगी हुई थी। पूरी दुल्हन के रूप में सजी - धजी संगीता इस तपती धूप में किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी। लाल सूट पहनी संगीता ने मेरी कमर में हाथ डाल कर वह मेरे कानों में बोली ‘‘क्यों आज तुम तो मुझसे कुछ पुछना चाहते थे ’’......! संगीता की बातों को सुन कर मुझे पसीना आ गया। डर के मारे मेरा पूरा बदन थर - थराने लग गया। आखिर संगीता मेरे मन की बातों को कैसे जान लेती है......! ‘‘अरे आप तो मेरे सवालों को लेकर घबरा गये ....! ’’ संगीता बताने लगी कि इसी महीने की 23 तारीख को उसकी शादी है। मैं आज आपसे मिलने के लिए इसलिए ही आई हूँ कि आप मेरी शादी में जरूर आये। 23 मई की शाम को संगीता की शादी थी ...... मेरा जन्म दिन भी 23 मई का था इसलिए मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। मैंने सोचा चलो शहरी चकाचौंध से कोसो दूर इस बार संगीता के साथ ही अपना 43 वां जन्म दिन मनायेगें। मैंने संगीता को जब यह बताया कि मेरा जन्म दिन भी 23 मई को है ..... संगीता बोली मैं जानती हूँ इसलिए मैंने आपको मेरी शादी में आने की दावत दी है। संगीता की यह बात सुन कर मैं चक्कर में पड़ गया। मुझे लगा कि यह लड़की लगता है कि मेरा पूरा बायोडाटा साथ लेकर चलती है......!

उसकी हरकतों को लेकर मैं सोचने को विवश हो गया कि कहीं यह लड़की मेरे की दुश्मन की कोई चाल में पड़ कर मुझे किसी चक्कर में तो नहीं डाल रही है। इस बीच एक तेजी से मोटर साइकिल ने मुझे झकझोर कर दिया। मैंने जैसे ही पीछे बैठी संगीता को मुड़ कर देखा तो वह पीछे की सीट पर नहीं थी। मुझे काटो तो खून नहीं । मैं वही चक्कर खाकर गिरता इसके पहले ही मैंने स्वयं को संभाला और हिम्मत कर आगे की ओर निकल पड़ा। इस बार न तो तेज हवा चली और न ही किसी प्रकार की आंधी आई। मैंने अपनी मोटर साइकिल के सामने की हैंडिल में लगी काली जी की हरी - लाल कांच की चूड़ियाँ देखी , लेकिन यह क्या मेरी गाड़ी की चूड़ियाँ गायब थी। कल मंगलवार को ही मैंने काली जी के मंदिर से हरी और लाल रंग की चूड़ियाँ गाड़ी के दोनों हैंडिलो में लगाई थी। मैं जब - जब भी किसी चक्कर में पड़ता हूँ तब पता नहीं क्यों मेरी गाड़ी की कांच की चूड़ियाँ टूट कर मुझे पहले ही सतर्क कर देती इस बार पता नहीं क्यों मुझे आने वाली किसी अप्रिय घटना की हलचल पता ही नहीं चली। जैसे - तैसे मैंने हिम्मत कर अपनी मोटर साइकिल को लेकर रानीपुर तक पहुँचने का प्रयास किया। रानीपुर के ठीक पहले आम की अमराई आते ही मुझे अचानक ठंड का एहसास हुआ। मुझे याद आया कि संगीता अकसर यही पर रूक कर उतर जाती थी। मैंने अपनी मोटर साइकिल रोक कर पास के एक मकान के सामने चारपाई पर बैठे युवक से संगीता के बारे में पुछा तो उसने जो कहानी मुझे बताई उसे सुन कर मैं हैरत में पड़ गया। मुझे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि यह युवक जो बता रहा है वो सच होगा । कच्चे मकान के सामने आम के पेड़ की छाया में चारपाई पर बैठा युवक गोपाल ने बताया कि अगले साल मई के महीने में उसकी साली संगीता की शादी 23 मई को होना थी।

संगीता मेरी तरह एक युवक की मोटर साइकिल पर उसे और उसकी पत्नी को लेने तथा अपनी शादी का कार्ड देने के लिए मई की तपती दोपहर में घर से निकली थी। रास्ते में एक जीप ने पीछे से उस मोटर साइकिल चालक को कट मारी जिसके चलते उसकी गाड़ी बुरी तरह फिसल कर दूर जा गिरी। मोटर साइकिल चालक स्पीड़ में था जिसके कारण गाड़ी संभल नहीं सकी और वह ऐसी फिसली की पीछे बैठी संगीता का सर एक बड़े से पत्थर से जा टकराया और वह दम तोड़ कर मर गई। हीरो होण्डा कंपनी की सीडी डीलक्स गाड़ी का चालक इस एक्सीडेन्ट में बुरी तरह घायल हो गया। सिर पर चोट लगने के कारण मोटर चालक मोहित की दिमागी हालत आज तक नहीं सुधर सकी। आज भी उसका इलाज दौलतगंज के मानसिक चिकित्सालय में चल रहा है। पिछले दो सप्ताह से अपने मकान के सामने मुझे गाड़ी रोक कर कुछ पल बाद गाड़ी स्टार्ट कर आते -जाते देख वह भी हैरान एवं परेशान था।

गोपाल भी मेरे इस तरह रूकने और जाने से हैरान एवं परेशान था। मुझसे गोपाल की कोई जान - पहचान नहीं थी जिसके कारण वह मुझसे मेरे रूकने और जाने का कारण नहीं जा सका था। गोपाल को जब मैंने दोनों बार मेरे साथ आमढाना से उसके घर तक संगीता को लाकर छोड़ऩे की बात बताई तो अचानक किसी के रोने की आवाज सुन कर मैं दंग रह गया था। गोपाल की पत्नी अनिता मेरी बातों को सुन कर अपनी छोटी बहन संगीता की अकाल मौत की याद ताजा होते ही रो पड़ी। अनिता से छोटी संगीता दोनों बहनों की शक्ल एक जैसी होने की वजह से कोई नहीं बता सकता था कि बड़ी कौन है या छोटी कौन है....? दो बच्चों की मां अनिता को मेरी सुनाई कहानी पर यकीन नहीं हो रहा था। जब मैंने अनिता को संगीता के द्वारा बताई कुछ ऐसी बातों को बताया तो उसे पूरा यकीन हो गया कि मेरे साथ इस महीने में पिछले दो सप्ताह से मोटर साइकिल पर आने वाली कोई और नहीं उसकी छोटी बहन संगीता ही है।

जब अनिता ने कमरे के अंदर से एक फोटो लाकर मुझे दिखाया तो मैं दंग रह गया। फोटो में दिखाई लड़की कोई और नहीं बल्कि वही संगीता है जिसने मुझे इसी महीने की 23 तारीख को अपनी शादी का मुझे निमंत्रण दिया था। इस महीने की 23 तारीख को अभी एक सप्ताह है ऐसे में मुझे संगीता की शादी का निमंत्रण और गोपाल की बताई की कहानी पर यकीन नहीं हो रहा है। आखिर मैं संगीता और अनिता के बीच में बुरी तरह उलझा गया हूँ। मैं आज तक उन दोनों बहनों में से किसकी बात पर यकीन करूं यह तय नहीं कर पा रहा था। मेरी वर्षगांठ और संगीता की शादी 23 मई के करीब आते ही मेरी परेशानी बढ़ती जा रही है। अकाल मौत की शिकार बनी आखिर संगीता को मई की तपती दोपहर मेरी ही मोटर साइकिल का ही क्यों इंतजार रहता था। वह मेरे साथ ही क्यों रानीपुर तक जाती थी। संगीता मेरे से आखिर क्या चाहती थी। ऐसे अनेकों सवालों के बीच खोया मैं यह तय नहीं कर पा रहा था कि अब क्या उस रास्ते आना - जाना करूं या नहीं ।

कहीं ऐसा तो नहीं कि आज भी रानीपुर रोड़ उसी स्थान पर खड़ी संगीता मेरा इंतजार तो नहीं कर रही है .....!

इति,

नोट :- इस कहानी से किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेना - देना नहीं है।

(लेखक  वरिष्ठ पत्रकार व लेखक हैं. संपर्क - ramkishorepawar@gmail.com )

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