शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

सम्मान नहीं, दण्ड दें - डॉ. दीपक आचार्य

सामाजिक परिवर्तन और समग्र राष्ट्रीय उत्थान के लिए पुरस्कार, सम्मान और अभिनंदन अपनी जगह हैं और इनसे उन लोगों को प्रोत्साहन प्राप्त होता है जो कि सच्चे मन से अपने कर्म के प्रति वफादार होकर समर्पित कार्य करते हैं, समाज और देश के लिए जीने का माद्दा रखकर निष्काम कर्म करते हैं।

इन लोगों को सम्मानित करने से सामाजिक महापरिवर्तन को सुखद एवं उपलब्धि-मूलक बनाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए सर्वोपरि अनिवार्य शर्त यह है कि जिसे पुरस्कृत और सम्मानित किया जा रहा है वह पात्रता की तमाम कसौटियों पर खरा उतरा हुआ हो, और जिसे सम्मानित करने के बाद समाज और श्रेष्ठीजनों से साधुवाद और आभार प्राप्त हो।

जहाँ कहीं ऎसा होता है वहाँ सम्मान, अभिनंदन और पुरस्कार अपना बेहतरीन प्रभाव छोड़ते हैं लेकिन वर्तमान दौर में ऎसा सभी जगह हो ही, यह संभव नहीं लगता। कुछ लोग सभी जगह ऎसे होते हैं जो केवल पुरस्कारों और सम्मानों की प्राप्ति की दौड़ में रमे रहते हैं।

इन लोगों की कर्म की बुनियाद से कहीं अधिक मजबूत होती है स्टंट और मैनेज करने की नींव। बहुत से लोग ऎसे दिख जाएंगे जिनके बारे में कहा जाता है कि ये कई-कई बार पुरस्कृत और सम्मानित हो चुके हैं, बीसियों बार अभिनंदन का शहद चाट चुके हैं लेकिन समझदार और इन्हें करीब से जानने वाले लोग कभी यह महसूस नहीं कर पाते कि ये इतने महान हैं या सम्मान-पुरस्कार के लायक हैं।

ढेर सारे सम्मान और पुरस्कार बेमानी हैं यदि ये कर्मयोग की कसौटी की बजाय दूसरी तरह के समीकरणों, जायज-नाजायज समझौतों और परस्परोपग्रहोपजीवानाम् की तर्ज पर कागजी आधारों पर प्राप्त कर लिए गए हैं।

बहुधा ऎसा होता है कि एक-दूसरे को सम्मानित करते हुए जमाने भर में अहो रूप-अहो ध्वनि के भाव चरितार्थ होते रहते हैं और कोई भी मन से यह स्वीकार नहीं कर पाता कि ये लोग पुरस्कार या सम्मान के लायक हैं भी।

सामाजिक, धार्मिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और परिवेशीय बदलाव लाने में सकारात्मक विचारों और श्रेष्ठीजनों की भूमिका को और अधिक विस्तार देने तथा समुदाय एवं राष्ट्र के लिए श्रेष्ठ कर्मों में रत लोगों को आगे बढ़ाने, उनका मान-सम्मान बढ़ाने तथा प्रोत्साहन के लिए यह जरूरी है कि सम्मान-अभिनंदन और पुरस्कार प्रदान किए जाएं मगर अब हो यह गया है कि इन पुरस्कारों और सम्मानों से प्रेरणा संचरण और अनुकरण जैसी प्रवृत्तियों की बातें व्यथा सिद्ध हो रही हैं।

अब समाज जिस दिशा में जा रहा है उसमें सज्जनों और अच्छे-सच्चे लोगों को सर्वाधिक दुःख इस बात का है कि सुधार के लिए कुछ नहीं हो पा रहा है, बुरे, नुगरे, कामचोर और भ्रष्ट लोगों की चवन्नियां चल रही हैं और मनमानी करने के बावजूद उन्हें कोई पूछ नहीं रहा।

काम करने वालों की मौत हो रही है और वे बेचारे काम के बोझ के मारे दब रहे हैं। काम के दबाव और इससे जुडे़ अभावों एवं समस्याओं की वजह से अच्छे लोग तनावों में जी रहे हैं और इसका सीधा असर उनके घर-परिवार, समाज और लोक व्यवहार से लेकर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है।

इन समसामयिक हालातों में सभी ज्ञानवृद्धों, अनुभवियों और समझदार लोगों का आकलन यही सामने आता है कि चंद लोगों को पुरस्कृत और सम्मानित कर देने मात्र से समाज और देश का भला नहीं हो सकता।

समाज और देश को उन्नति देने के लिए जरूरी है कि पुरस्कार और सम्मान से अधिक ध्यान दण्ड व्यवस्था को मजबूत करने पर दिया जाए। पुरस्कार-सम्मान से आजकल न कोई अनुकरण करता है न इसका प्रभाव देखा जा रहा है।

इसकी बजाय कामचोरों, नुगरों और नालायकों को छांट-छांट कर दण्डित करने का क्रम शुरू कर दिया जाए तो इसका बेहतर और तीखा प्रभाव सामने आएगा और व्यापक वर्ग अपने आप सुधरने लगेगा।

इसलिए पुरस्कारों और सम्मानों की बजाय शुद्धिकरण और दण्डात्मक प्रावधानों को अमल में लाये जाने पर इसका संदेश पूरे प्रभाव के साथ संचरित होता है और इसका तीव्र असर यह होता है कि बाकी सारे के सारे लोग अपने आप सुधरने लगते हैं। और यह स्थिति हर संस्थान, प्रतिष्ठान, समाज और देश के लिए कल्याणकारी होती है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

www.drdeepakacharya.com

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