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किसी काम के नहीं चिल्लाने-झल्लाने वाले - डॉ. दीपक आचार्य

पूरी दुनिया के तमाम आदमियों को दो भागों में बांटा जा सकता है। एक वे हैं जो वाकई तल्लीनता से काम करते हैं और चुपचाप अपने कामों में लगे रहते हैं। इनसे किसी को कोई शिकायत नहीं होती।
दूसरे वे हैं जो कोई काम-धाम नहीं करते मगर चिल्लाने और झल्लाने में ही माहिर हैं। ये लोग जिन बाड़ों और परिसरों में होते हैं वहां अपनी मौजूदगी और प्रभाव दिखाने के लिए चिल्लाते रहते हैं। इनका भ्रम होता है कि ऐसा करने से दूसरे लोग दबकर रहते हैं और उनके या उनके कुकर्मों के खिलाफ कोई टिप्पणी करने से भय खाते हैं और इस आदर्श स्थिति का फायदा उठाकर वे अपनी मनमानियां करते रहते हैं। इन लोगों की जिन्दगी और चिल्लाहट दोनों पर्याय और पूरक हो जाते हैं।


ऐसा नहीं कि ये अपने चरागाहों, बाड़ों और गलियारों में ही चिल्लाने के हुनर का पूरी बेशर्मी के साथ खुला प्रदर्शन करते हों, बल्कि इन लोगों के कारण से इनके घर भी सब्जी मण्डी, बस स्टैण्ड या काईन हाउस से कम नहीं लगते। और तो और इनके घर वाले और आस-पड़ोस के लोग तथा मित्र भी इनसे परेशान रहते हैं। केवल इनके जैसे चिल्लपों सम्प्रदाय के लोग ही प्रसन्न रहते हैं जो कि इन्हीं की तरह चिल्ला-चिल्ला कर जिन्दगी गुजार लेने के आदी हो जाते हैं।


इंसान दोनों में से एक ही काम कर सकता है। या तो वह बेवजह चिल्लाने और झल्लाने वाला होगा या फिर काम करने वाला।  चिल्लाने वाले लोग चिल्ला-चिल्ला कर मजमा जमा कर सकते हैं, अपने आपको महान सिद्ध करते हुए सारे तात्कालिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं, सैटिंग और समझौते करते हुए अपने आपको सफल मान सकते हैं और खुद को स्वयंभू के रूप में स्थापित करते हुए आत्ममुग्धावस्था में जी सकते हैं लेकिन ये लोग न जीवन का शाश्वत आनंद प्राप्त कर सकते हैं, न औरों के लिए किसी भी प्रकार से उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।


ये लोग पूरी जिन्दगी चिल्लाते हुए निकाल दिया करते हैं। कर्मधाराओं में रमे हुए लोग शान्त, स्थिर चित्त और मस्त हुआ करते हैं क्योंकि उन्हें आनंद के लिए बाहरी दुनिया की बैसाखियों की कोई आवश्यकता नहीं होती।ये लोग अपने ही अपने कर्मयोग को इतनी अच्छी तरह जी लिया करते हैं कि इन्हें कोई सहारा चाहिए ही नहीं होता। बल्कि ये लोग किसी बाहरी आनंद को अपने कर्म और लक्ष्य के लिए अवरोध मानते हैं और इस कारण से उन सभी प्रकार के प्रपंचों से दूर रहते हैं जिनकी वजह से इनके दैनंदिन कर्म के आनंद में कहीं भी किसी भी प्रकार की बाधा पहुंचने का अंदेशा हो।
इसके विपरीत नाकाबिल, कमजोर और अपात्र लोगों के लिए जीवन की सबसे बड़ी मजबूरी हो जाता है दूसरों की कृपा या दया पाना। इसके लिए तरह-तरह के स्वाँग रचना, लल्लो-चप्पो करना, चापलुसी, मिथ्या जयगान करते रहना और बहुरूपियों या वृहन्नलाओं की तरह जीवन जीना इनकी सबसे पहली जरूरत और मजबूरी हो जाता है।


इन दोनों ही किस्मों में एक बीच की प्रजाति होती है जो काम तो राई भर करती है और मुखर होकर जताती है जैसे कि पहाड़ से काम कर डाले हों। अलबत्ता कुछ नगण्य लोग ऐसे जरूर हैं जो काम करते भी हैं और श्रेय पाने के लिए उतावले भी रहते हैं। इनका यह कदम ठीक कहा जा सकता है क्योंकि ये उसी का श्रेय प्राप्त करने की उत्सुकता में रहते हैं जो काम इनके द्वारा किए जाते हैं।
कर्म के मामले में उन पर जरा भी भरोसा नही किया जा सकता जो लोग चिल्लाने का ही अपने जीवन का मूलाधार समझते हैं। ये लोग अपनी चवन्नियां जब कभी चल नहीं पाती, खोटे सिक्के अवधिपार हो जाते हैं तब झल्लाने में भी कोई कसर नहीं रखते। चिल्लाने और झल्लाने वाले ये सारे के सारे लोग कर्महीन और र्भायहीन होकर जीते हैं। भगवान बचाए इनसे।
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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

www.drdeepakacharya.com

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