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अला - बला / रहस्य रोमांच की कहानी / रामकिशोर पंवार

रहस्य रोमांच से भरपूर एक दिल को दहला देने वाली कहानी

 

अला - बला

कहानी :- रामकिशोर पंवार

उस समय रात के बारह बज रहे होंगे . सही समय जानने के लिए मेरे मन में उठ रही जिज्ञासा की शांती के लिए जैसे ही मैंने अपने बाये हाथ घड़ी की ओर देखना चाहा तो कुछ पल के लिए मेरी मोटर साइकिल लहरा गई . वह तो अच्छा हुआ कि आगे या पीछे से कोई गाड़ी नहीं आ रही थी , वरना अपना तो राम - नाम सत्य हो जाता ?. मैंने माँ काली को याद किया और फिर आगे की ओर निकल पड़ा . आज फिर वही काली अमावस्या की दिल को दहला देने वाली भयवाह डरावनी रात थी . ऐसी काली अमावस्या रात का जिक्र ही पूरे बदन में सिरहन पैदा कर देता है तब जब आदमी अकेला सफर कर रहा हो .........! आज एक बार फिर मैं अपने माँ - बाबू जी की हिदायतों को दरकिनार कर अपने पैतृक घर से बदनूर जाने को निकल पड़ा था . आज की वही सुनसान चारों ओर चीखता सन्नाटा और उस काली डरावनी रात में बरेठा होते हुए बदनुर की ओर सुनसान रास्ते पर मैं अपनी सी.डी.डान मोटर साइकिल पर जब घर से अकेला निकल रहा था तब मुझे लगा कि मैं आज भी सबसे बड़ी गलती कर रहा हूँ पर क्या करूं...........!

लगता है आज मेरी बारी आ ही गई थी.....! मुझे रह- रह कर अपनी मूर्खता पर गुस्सा भी आ रहा था . अब जो होगा देखा जाएगा यह सोच कर मैं अपनी अराध्य देवी काली माँ के नाम को गुनगुनाता चला जा रहा था . हमारा परिवार बनदूर के पास बसे एक छोटे से गांव रोंढ़ा का मूल निवासी है लेकिन बाबू जी के जंगल विभाग में पदस्थ होने के कारण हम सब परिवार के लोग उनके पास एन.सी.डी.सी. में ही आकर रहने लगे थे . एन.सी.डी.सी. की कोयला खदानें और सतपुड़ा थर्मल पावर स्टेशन दो मात्र ऐसे रोजगार के क्षेत्र थे जहाँ पर पूरे भारतवर्ष के अलाव बदनूर के आसपास के लोग भी काम धंधे की तलाश में आकर बस गए थे . एन.सी.डी.सी. से बदनूर की दूरी लगभग साठ किलो मीटर रही होगी. बदनूर को अग्रेजों के जमाने में ही डिस्ट्रीक हेड क्वाटर बना दिया था . जंगल सत्याग्रह कह वजह से बदनूर उस जमाने का जान- माना डिस्ट्रीक हेड क्वाटर था . मुझे भी नई दिल्ली से छपने वाले एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र के ब्यूरो चीफ बनने के बाद से पिछले डेढ़ - दो साल से मुझे बदनूर में पत्नी और एक छोटे बेटे मोहित के साथ किराये के मकान में रहना पड़ा . वैसे भी बदनूर के जिस मोहल्ले में मैं रहता था वहाँ से कत्तल ढाना जाने का रास्ता पड़ता था और इस रास्ते पर हमेशा गुण्डे मवाली अकसर उधम मचाते रहते थे . रात के समय में पत्नी और बच्चे को अकेला छोड़ कर आ जाने के कारण मुझे एन.सी.डी.सी. से देर रात को आना पड़ा रहा था .

बदनूर जाने के लिए दो रास्ते हैं. एक बरेठा होकर दुसरा रानीपुर होकर जाता है. बरेठा वाले रास्ते में पक्की सड़क तथा रानीपुर वाले में कच्ची सड़क पड़ती है. रानीपुर वाले रास्ते में अकसर रात को हनुमान डोल के पास शेर -चीता के मिल जाने का डर बना रहता था. लोग तो कहते हैं कि कुछ मिले ना मिले लेकिन इस रास्ते में कोई ना कोई खतरनाक जंगली जानवर मिल ही जाता है. इसलिए यह रास्ता जोखिम भरा कहा जाता है. शायद यही वजह है कि कोई भी देर रात को इस रास्ते से आने - जाने की रिस्क नहीं लेता है. आज जब मैं घर से बदनूर के लिए अकेला निकल रहा था तो बाबू जी ने मुझे रोका लेकिन मैं जिद् करके घर से बदनूर के लिए निकल पड़ा. एन.सी.डी.सी. से निकलते समय रात के सवा दस बज रहे थे लेकिन बरेठा तक पहुँचते ही घड़ी का काटा पौने बारह को पार कर गया था. बरेठा आते ही जैसे ही मैंने बदनूर जाने के लिए अपनी मोटर साइकिल मोड़ी तो मेरी गाड़ी का अचानक संतुलन बिगड़ गया और मैं स्लिप होते- होते बचा . एक पल के लिए तो मैं इस फिसलन के चलते सर से पांव तक कांप गया था इसके बावजूद मैंने हिम्मत नहीं हारी और मैं चल पड़ा.

आज रात मैं अपने कुछ काम के चलते तथा आते समय माँ - बाबू जी से मिल कर आते समय काफी लेट हो गया था . वैसे भी आज मैं अकेला था. यूँ तो मुझे हर सप्ताह माँ - बाबू जी से मिलने जाना ही पड़ता है. आज जब मैं अपने घर से एन.सी.डी.सी. बाबू जी से मिलने जा रहा था तब मोहित की मम्मी ने मुझे कहा था सुनो जी आज फिर काली अमावस्या है...............? इसलिए देर मत करना और जल्दी से घर आ जाना....... लेकिन मैं क्या करूं आज फिर लेट हो गया. माँ बाबू जी कह रहे थे कि तू इसको समझाती क्यों नहीं...............रात हो गई है इसे मत जाने दे.......... माँ ने भी कहा बेटा तू मत जा पर मुझे जाने की जल्दी थी. अकसर अमावस्या - पूर्णिमा को मेरी तबीयत बिगड़ जाती है. गले और हाथ में बाबा - फकीरों के ताबीज और धागे बांधे रहने के बाद भी मैं इन रातों को अचानक बेहोश हो जाता हूँ. इसलिए घर के सब लोग मुझे रात - बिरात कही आने - जाने नहीं देते हैं . आज बाबू जी कह भी रहे थे कि रामू ........... तू जिद मत कर अकेला मत जा अपने साथ छोटे भाई को ले जा पर मैं नहीं माना और अपनी मोटर साइकिल को स्टार्ट कर चला आया था . इधर मैं श्रीमति को बता कर आया था कि मैं हर हाल में देर रात को आ जाऊंगा क्योंकि मुझे कल ही किसी काम से बाहर जाना था. नवम्बर का महीना था. आज एक बार फिर वही काली अमावस्या की रात मेरी जिंदगी में कोई न कोई हलचल लाने को आतुर थी तभी तो मैं सबकी बातों को दर किनार कर अकेला निकल पड़ा था . उस रात को मैंने आने वाली घटना की परवाह किये बिना ही आगे निकलने का मन बना रखा था. बदनूर आते समय मुझे रास्ते में मिलने वाले सभी यार दोस्तो ने न जाने की बाते कही लेकिन मैं उनकी बातों को नजर अदांज करते आगे की ओर चला जा रहा था .

आज रात को ठंड काफी शबाब पर थी साथ ही ठंडी सर्द हवाएं भी चल रही थी. यूँ तो मैंने काफी गर्म कपड़े पहन रखे थे इसके बाद भी ठंड से मेरा पूरा शरीर कंपकपा रहा था. हाथों में पहने दास्ताने और कानों को ढ़ंकाती टोपी भी सुनसान रास्ते पर 60 - 70 की स्पीड़ से दौड़ती मोटर साइकिल के चलते लगने वाली ठंडी हवाओं के थपेड़ों से मेरे शरीर को कंपकपाने से नहीं रोक पा रही थी. एक घड़ी तो मैंने सेाचा कि मैंने रात में आने की कहाँ मुसीबत मोल ले ली.............? घर में बाबू माँ के कहने पर रूक जाता तो ठीक था ? पर इधर श्रीमति और छोटे बेटे की चिंता ने मुझे रात को ही आने को आने को विवश कर दिया था. ख्यालों में खोने के कारण मुझे पता ही नहीं कि मेरे पीछे से कोई मोटर साइकिल भी आ रही है. इस बीच उस मोटर साइकिल वाले ने मुझे ओव्हरटैक किया और वह तेजी से मेरी आँखों के सामने से ओझल हो गया. मैं अभी कुछ दूर चला था कि मैंने मोटर साइकिल के लार्ईट में देखा कि मोटर साइकिल को रूकने का इशारा कर रही है . इतनी रात को सुनसान रास्ते पर यह बूढ़ी महिला क्या कर रही है...... ? मेरे मन में उसके करीब पहुँचने तक अनेक सवाल कौंध रहे थे. मै उस महिला के पास आने पर एक पल के लिए डर गया . इतनी भयानक काली स्याह रात को सुनसान रास्ते पर जर्जर हो चुका जिस्म और तन पर फटे कपड़े होने के बाद भी उस पौढ़ महिला को न तो ठंड लग रही थी और न वह ठंड से कांप रही थी उसे इस हालत में देख कर मेरी बोलती बंद हो गई .........!

उस महिला के व्यवहार से मुझे कपंकपी छूट गई थी . वह पौढ़ महिला कुछ बोलती इसके पहले ही मेरी मोटर साइकिल अचानक बंद हो गई जिसके चलते मुझे रूकना पड़ा . मेरी मोटर साइकिल के रूकते ही सबसे पहले उस वह पौढ़ महिला ने मेरी मोटर साइकिल को करीब से देखा . उसके बाद उसने मेरे पास आकर मेरा करीबी से मुआयना किया उसकी इन हरकतों से मेरा हाल - बेहाल था . मैंने काफी हिम्मत करके जैसे - तैसे मोटर साइकिल स्टार्ट कर उस महिला का चेहरा देखना चाहा . मैं चाह कर भी उस पौढ़ महिला का चेहरा नहीं देख पा रहा था . मुझे उसके अब तक के रूख से मैं बेहद डर लग रहा था शायद अपना क्या कर लेगी . मैंने ही हिम्मत करके कहा अच्छा ठीक है माता जी आप पीछे की सीट पर बैठ जाइए . मैंने काफी देर बाद एक बार फिर हिम्मत करके उस पौढ़ महिला से पुछा कि ‘‘अम्मा आप इधर कहां सें आ रही है.........? मेरे इस सवाल पर वह बताने लगी कि ‘‘ बेटा मैं बनारस की रहने वाली हूँ.......... मेरा नाम अला है..... ? उस महिला का अजीबो - गरीब नाम सुन कर एक पल के लिए तो मैं कांप गया क्योंकि ऐसा नाम मैंने पहली बार सुना था . इस अजीबो - गरीब नाम से तो यह पता नहीं चल पा रहा था कि मोटर साइकिल पर पीछे बैठी अम्मा जो कि अपना नाम अला बता रही है वह किस जाति या धर्म की होगी ......? मैं उस पौढ़ महिला से कुछ इस बारे में पुछता इसके पहले ही बताने लगी कि बेटा दर असर हम लोग बनारस के रहने वाले है . हमारा पूरा परिवार इस काली अमावस्या की रात को भोपाल से नागपुर जा रहा था कि जिस स्थान पर मैं तुम्हें मिली ठीक उसी स्थान पर .............! वह इसके पहले कुछ बताती कि बरेठा बाबा का मंदिर आ गया . मैंने उसे पौढ़ महिला से कहा ‘‘अम्मा बरेठा बाबा का मंदिर आ गया................ लेकिन जब मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो वह महिला नहीं थी . मुझे काटो तो खून नहीं था .

इस घटना के बाद तो मैं दिसम्बर महीने की इस कड़ाके ठंड में पसीने से नहा चुका था . मेरे साथ इतनी बड़ी घटना घट जाने के बाद भी पर मैंने हिम्मत नहीं हारी और हर बार की तरह अपनी मोटर साइकिल को रोक कर बरेठा बाबा के मंदिर में जाकर बाबा की चरण वंदना की साथ ही बाबा के मंदिर के पास ही बने अपनी आराध्य देवी माँ काली के मंदिर में जाकर उसके चरण स्पर्श किये और माँ काली के त्रिशूल से हरि और लाल रंग की चूडिय़ां निकाल ली और उसे अपनी मोटर साइकिल के हैंडि़ल के पास बांध ली . मैंने जब से मोटरसाइकिल खरीदी है तब से लेकर आज तक मैं अपनी मोटर साइकिल में माँ काली जी की चूडिय़ां बांधता चला आ रहा हूँ जिसके चलते मैं अकसर आने वाली कई विपदाओं से माँ काली की कृपा से बच जाता हूँ . बरेठा मंदिर से जाते समय जैसे ही मैंने आगे की ओर रूख कर गाड़ी का हार्न बजाया . हार्न की आवाज को सुन कर मंदिर का पुजारी जाग गया . वह मुझे अच्छी तरह जानता पहचानता था . जैसे ही उसने झोंपड़ी के अंदर से लाये दिया की रोशनी में मुझे झोंपड़ी के अंदर से बाहर आकर देखा तो वह मुझे देख कर दंग रह गया . दिया लेकर झोंपड़ी से मंदिर के पास आने लगे पुजारी ने मुझसे सवाल किया ‘‘भैया आज इतनी रात को.........................?

मैं उसके सवाल का जवाब देता पर मैं अभी कुछ देर पहले की घटना से अभी भी थर- थर काँप रहा था . मंदिर के पुजारी ने पास आकर मुझे इस हालत में देखा तो उसने ही एक बार फिर मुझसे वही सवाल किया ‘‘भैया आज इतनी रात को वो भी अकेले ...............? मैंने उसके सवालों का जवाब देकर उसे कुछ बताने के बजाय चुप रहने में अपनी भलाई समझी . मैंनें अबकी बार अपने पास आए पुजारी के चरण स्पर्श कर अपनी मोटर साइकिल को स्टार्ट कर आगे की ओर निकल पड़ा .

इस बार मंदिर के ऊपर घाट सेक्सन होने की वजह से मैं बड़ी सावधानी से अपनी मोटर साइकिल को चलाते जा रहा था . मैं अभी मंदिर से बड़ी मुश्किल एक किलोमीटर भी आगे नहीं चल पाया था कि मुझे गाड़ी की रोशनी में एक सोलह सत्रह साल की कमसिन युवती मेरी मोटर साइकिल को रोकने के लिए हाथ देती दिखाई दी. मैं गाड़ी न रोक कर आगे बढऩा चाहा पर अचानक एक बार फिर मेरी गाड़ी आगे की ओर बढ़ ही नहीं पा रही थी . काली अंधियारी रात में मेरी गाड़ी के सामने उसकी लाइट में अपने रूप सौंदर्य को प्रदर्शित कर अपनी ओर मुझे आकर्षित करनी वाली युवती ने मुझसे कहा कि ‘‘ देखिए मुझे पाढऱ तक जाना है , क्योंकि मेरे सारे रिश्तेदार वहाँ पर भर्ती है..............! क्या आप मुझे अपनी गाड़ी में पाढऱ तक चलने के लिए लिफ्ट देंगे..... ? मैंने सोचा अगर इसे पाढऱ तक नहीं ले चला तो हो सकता है ए मेरा कोई अहित कर डाले इसलिए मैंने उससे बिना किसी प्रकार का पंगा लिए कहा कि ‘‘ठीक है आप पीछे बैठ जाइए ................... ! लेकिन वह मेरी गाड़ी के करीब आते ही एकदम दो कदम पीछे हट गई .................!

उसका यह व्यवहार मेरे लिए काफी आश्चर्य जनक था . आखिर मैंने ही उससे सवाल किया ‘‘ आप गाड़ी पर क्यों नहीं बैठ रही.............? वह बोली ‘‘मैं आपके साथ एक ही शर्त पर चल सकती हूँ यदि आप आपकी गाड़ी में बंधी चुडिय़ों को निकाल कर बाहर फेंक दे...............? ‘‘ मैंने कहा ऐसा तो नहीं हो सकता................... तब वह ‘‘ बोली ठीक है मैं चलती हूँ ............... यह कह कर वह पल भी में गायब हो गई . अबकी बार मैं इस कमसिन युवती के साथ घटित घटना से भी बेहद डर गया . उस युवती के गायब होते ही जैसे ही मोटर साइकिल को आगे बढ़ाना चाह गाड़ी जो अचानक रूक गई थी वह आगे की ओर निकल पड़ी .

जैसे - तैसे मैं रात के लगभग तीन सवा तीन बजे घर पहुँचा तो श्रीमति जी को मेरा इस तरह रात में आना बेहद आश्चर्यजनक लगा पहले तो वह मुझसे इसी बात पर काफी नाराज हो गई की मुझे बाबू माँ की बात को अनसुनी करके काली अमावस्या की सुनसान रात में अकेले नहीं आना था . श्रीमति के इस व्यवहार पर मैं उससे अपने साथ घटी किसी भी घटना को नहीं बताना चाहा क्योंकि मुझे मालूम था कि जब मैं उसे उक्त सारी बात बताऊंगा तो वह तो डर जाएगी साथ में अगर उक्त बाते बाबू - माँ को भी बताएगी तो वे तो उन पर क्या बीतेगी...............?

इस घटना के एक सप्ताह बाद जब मैं बदनूर से एन .सी .डी .सी . बाबू - माँ से मिलने जा रहा था तो बरेठा बाबा के मंदिर पर मुझे वही पुजारी मिला . दिन का समय होने के कारण वह एक बार फिर उसने मुझसे वही सवाल करने लगा कि ‘‘ भैया उस रात को आप अकेले क्यों जा रहे थे ...........? और फिर जब मैंने आपसे इसी सवाल को कई बार पुछा तो तो आपने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया.............. ! भैया आप मानो या न मानो उस रात आपका व्यवहार मुझे काफी आश्चर्यजनक लगा . आखिर क्या बात थी.........? इस बार मैंने पुजारी को उस रात की सारी बाते बता दी तों वह मुझसे बोला ‘‘भैया आपकी काली जी ने आखिर आपकी जान बचा ली वरना आप भी उस बला के चक्कर में पड़ जाते........... ! मैंने पुजारी से पुछा कि ‘‘ पुजारी जी कैसे बला .....? कहाँ की बला............? और कैसा चक्कर मैं आपकी बात समझ नहीं पा रहा हूँ............?

बरेठा बाबा मंदिर का पुजारी बताने लगा ‘‘ भैया दर असल में बात आज से पाँच साल पहले की है . आपको याद होगा कि बरेठा के इसी घाट पर आगे आने वाले मोड़ पर बनारस की एक मारूति कार को एक प्रट्रोल डीजल वाले टैंकर ने टक्कर मार कर चकना चुर कर डाला था. इस दुर्घटना में एक पौढ़ महिला के साथ - साथ एक युवती भी घटना स्थल पर मर गई थी. उस कार में सवार उसके परिवार के बाकी सदस्य पाढऱ हास्पिटल में भर्ती होने के कुछ देर बाद मौत की गोद में सो गए . तबसे लेकर आज तक बरेठा के इसी घाट पर अकसर किसी न किसी मोटर साइकिल से लेकर चौ-पहिया वाहन चालकों से वह पौढ़ महिला और उसकी बहन पाढऱ तक जाने के बहाने लिफ्ट मांगती रहती है. जो भी उनके चक्कर में पड़ता है वे उसे इसी बरेठा घाट सेक्सन के बीच में अपना शिकार बना कर उसकी असामयिक मौत का कारण बन जाती है . इन दोनों अला और बला ने अब तक एक दर्जन से भी अधिक लोगों को को काल के गाल में पहुँचा दिया है वह तो माँ काली की आप पर कृपा रही कि आप बाल- बाल बच गए वरणा आपका भी काम लग जाता............. !

मंदिर पुजारी की बात सुनने के बाद मैं आज तक उन दोनों बहनों अला- और बला को नहीं भूल पाया हूँ . मुझे आज भी लगता है कि मेरी मोटर साइकिल की पीछे वाली सीट पर कही अला - या बला तो नहीं बैठ गई है .

 

इति,

कथा के पात्र काल्पनिक है इसका किसी भी जीवित व्यक्ति से कोई लेना - देना नहीं है .

 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कथाकार हैं. संपर्क - ramkishorepawar@gmail.com )

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