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सिद्धि पाना सहज यदि शुचिता बनी रहे - डॉ. दीपक आचार्य

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(कलाकृति - के सुरेंद्र सिंह पुंवार)

 

साधना को लेकर अक्सर यह भ्रम रहता है कि इसके लिए बहुत सारा समय चाहिए। खूब सारे बंधनों और मर्यादाओं के पालन की जरूरत है। मनोकामना पूर्ति या सिद्धि पाने के लिए दीर्घकाल तक कठोर साधना करने की जरूरत पड़ती है।

इसी सोच के मारे अधिकतर लोग साधना को दुश्कर मान कर इस दिशा में आगे बढ़ते ही नहीं, बहुत से लोग साधना की शुरूआत तो कर लेते हैं मगर थोड़े दिन बाद निराश होकर छोड़ देते हैं। ऎसे लोग दोष  देते हैं मंत्र-तंत्र-यंत्रों और भगवान को अथवा साधना सिखाने-बताने वाले गुरुओं को।

साधना कोई सी हो, इसका प्रकार कैसा भी हो।  साधना में जो कुछ किया जाता है उससे प्राप्त होने वाली ऊर्जा सबसे पहले मन-मस्तिष्क और शरीर को शुद्ध करने में खर्च होती रहेगी। 

यों देखा जाए तो मनुष्य भगवान का अंश है इसलिए उसके भीतर दैवत्व विद्यमान रहता ही रहता है। शैशव में यह पूर्णता के करीब होता है इसीलिए कहा जाता है कि बच्चों में भगवान होता है। लेकिन ज्यों-ज्यों हममेंं समझ आती जाती है, स्वार्थ, अपना-पराया  आदि सांसारिक भावनाएं आती रहती हैं उस अनुपात में अपने भीतर से शुचिता बाहर निकलती जाती है।

यह शुचिता जब तक अपने भीतर पूरी रहती है तब तक दैव ऊर्जा हमारे भीतर बनी रहकर दैवत्व की पूर्णता का अहसास कराती रहती है। लेकिन एकाध उदाहरण को छोड़ दिया जाए तो बाकी सारे के सारे लोगों पर सांसारिक मायाजाल पसर जाता है और इस कारण शुचिता का क्षरण होता रहता है।

जो लोग शुचिता को बनाए रखते हैं वे लोग दैवत्व के अत्यन्त करीब होने का अहसास करते रहते हैं। इन लोगों के सारे काम संकल्प शक्ति से अपने आप होने लगते हैं। इस घोर कलिकाल में अधिकांश लोगों के मन में अश्रद्धा रहती है कि इस युग में भी भगवान या उनकी विभूतियों को पाना संभव है क्या।

यह प्रश्न हम सभी के जेहन में आना स्वाभाविक है। इसे हम गणित से समझें। सत्, त्रेता और द्वापर युग में ईश्वरीय शक्तियों को मानने, पूजने और वरदान के आकांक्षी लोगों की संख्या विस्फोटक थी और सभी को वरदान दे पाना भगवान के लिए थोड़ा असंभव ही माना जाता था इसलिए भगवान की कृपा या वरदान पाने के लिए दीर्घकालीन और कठोर तपस्या की विवशता थी।

कलियुग में ऎसा नहीं है। भगवान की कृपा पाना अब पहले के युगों के मुकाबले अधिक सरल एवं सहज है क्योंकि अधिकांश लोग आसुरी भावों से घिरे या नास्तिक हैं। ऎसे में ईश्वर के पास देने को अपार है और पाने वालों की संख्या नगण्य है।

कामना सारे करते हैं लेकिन तीव्र इच्छा के साथ साधना कोई नहीं चाहता। इस स्थिति में थोड़ी सी श्रद्धा और प्रेमपूर्वक की जाने वाली साधना से ही भगवान को प्रसन्न किया जा सकता है। तभी कहा गया है - कलौ केशव कीर्तनं। अर्थात केवल भगवन्नाम संकीर्तन और स्मरण ही काफी है। इसी से भगवान पाया जा सकता है। 

इसके बाद यह प्रश्न  स्वाभाविक है कि देश भर में इतने बड़े पैमाने पर धार्मिक अनुष्ठान, कीर्तन, सत्संग और कथाओं की धूम मची रहने लगी है, बहुत सारे लोग साधना और पूजा के नाम पर जाने क्या-क्या नहीं कर रहे हैं, बावजूद इसके प्राकृतिक, दैविक, दैहिक और भौतिक आपदाएं, आतंकवाद और अशांति का माहौल क्यों है।

देश में बड़े पैमाने पर मंत्र-तंत्र साधना करने वालों की भारी भीड़ है, मन्दिरों में श्रद्धालुओं का जमघट लगा ही रहता है। कई टीवी चैनलों पर बाबाओं, सिद्धों, दैवदूतों आदि की भरमार है। तब भी अपेक्षित शांति, आनंद और सहजता क्यों नहीं है। कोई तो सामने आकर यह कहे कि मैं सिद्ध हूं, मैं दैवीय शक्तियों से सम्पन्न हूं। पर ऎसा कुछ दिख नहीं रहा।

सब तरफ धर्म और साधना के नाम पर बहुत कुछ चल रहा है लेकिन जो कुछ हो रहा है उसे विधिविधान से नहीं किया जा रहा है। दुनिया का हर इंसान साधना से सिद्धावस्था प्राप्त कर सकता है लेकिन इसके लिए कुछ वर्जनाओं का पालन  जरूरी है।

साधना में असफलता का मूल कारण यह है कि एक ओर तो हम साधना से सिद्धावस्था या ईश्वर का सामीप्य पाना चाह रहे हैं, दूसरी ओर चाहते हैं कि हमारी सारी की सारी मनोकामनाएं पूरी होती रहें। पर यह भी नहीं हो पा रहा।

इसे देख यह कहना उपयुक्त होगा कि हम जो कुछ पा रहे हैं उसमें रोजाना सेंध लग रही है। इस कारण साधना से ऊर्जा या पुण्य का संचय अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो पा रहा है। इसी वजह से पूरे भर नहीं पा रहे और असफलता मिलने का मलाल बना रहता है।

साधना से प्राप्त ऊर्जा में क्षरण के लिए हमारा खान-पान, झूठ, भ्रष्ट आचरण, हराम की कमाई और अधर्माचरण से लेकर वह सब कुछ है जो हम स्वार्थ से करते हैं। हम जितनी साधना करते हैं वह इस गंदगी को बाहर फेंकने में लग जाती है।

हमारा चित्त इतनी साधना के बाद भी शुद्ध नहीं हो पाता।  सब कुछ खर्च हो जाता है शुचिता पाने में। शुद्धि की परिपूर्णता के बाद सिद्धि का द्वार आरंभ होता है पर हम हैं कि पराया खान-पान करते हुए पूर्ण शुद्ध हो ही नहीं पाते। 

साधक को चाहिए कि सिद्धि पाने के लिए बाहरी खान-पान, अधर्माचरण, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, झूठ, हरामखोरी आदि को त्यागे, तभी साधना का फल मिल सकता है। जो इन सभी को त्याग देता है उसे बहुत कम साधना और कम समय में ही ईश्वर की कृपा और सिद्धि का अनुभव होने लगता है।  इस सत्य को स्वीकारें।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

www.drdeepakacharya.com

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