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संस्कारों की परीक्षा / लघु कथा / ललित साहू "जख्मी"

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छुरा नामक गांव में एक सुखी परिवार रहता था। परिवार का एक बालक राजू पांचवीं कक्षा में पढ़ता था, उसके स्कूल में परीक्षा के पहले तैयारी के लिए सभी विषयों की जांच परीक्षा ली गई। सबसे पहले गणित की परीक्षा हुई, उसमें एक सवाल था कि तुम्हारे पास नौ सेब हैं उसे चार लोगों में बराबर बांटने पर किसे कितना मिलेगा, राजू ने अपने जवाब में लिखा कि चारों को दो-दो सेब मिलेगा और एक सेब मैं रखूंगा जिसे मैं अपनी बूढ़ी दादी को दूंगा उसे सेब बहुत पसंद है। उसके जवाब को पढ़ कर उसे शिक्षक ने पास बुलाया और कहा ये गणित का विषय है इसमें भावनाओं से नहीं सूत्रों से काम लेना पड़ता है, और सही जवाब 2.25 बता कर वापस भेज दिया। राजू यही सोचता रहा की उसने क्या गलती कर दी। फिर दूसरे दिन विज्ञान विषय की परीक्षा ली गई। उसमें एक सवाल था कि दूध का बर्तन आग पर लंबे समय तक रखे जाने से क्या होगा। राजू ने जवाब में लिखा लंबे समय तक दूध का बर्तन आग में रखने से मेरी छोटी बहन को भूखे रहना पड़ेगा और मां को डांट भी पड़ेगी। फिर जवाब की जांच करने के बाद शिक्षक ने राजू को बुलाया और कहा ऐसे भावुकता से जवाब देने पर कोई भी शिक्षक तुम्हें अंक नहीं देगा, और सही जवाब बताकर की दूध के ऊपर महीन आवरण बन जाने की वजह से भाप बाहर नहीं आ पाता जिससे गुबार बनने लगता है जिसे दूध का उफन जाना भी कहते हैं, राजू को भेज दिया। राजू को अब भी अपनी गलती समझ नहीं आई।

फिर तीसरे दिन सामाजिक विज्ञान विषय की परीक्षा थी, जिसमें एक सवाल था कि पौष्टिक आहार क्या है, राजू ने फिर से भावनात्मक जवाब दिया, माँ द्वारा अपने हाथों से बनाया और खिलाया गया भोजन पौष्टिक आहार होता है। शिक्षक राजू को बुला कर कक्षा से बाहर ले गया और कहा राजू शरीर की आवश्यकता को पूर्ण करने वाली सभी प्रकार की विटामिन प्रोटीन जिस आहार से मिलती है उसकी संतुलित मात्रा पौष्टिक आहार कहलाती है अब तुम ही बताओ मैं तुम्हें कैसे अंक दे सकता हूं। इस बार राजू की आंखों में आंसू आ गये फिर शिक्षक ने कडे स्वर में कहा रोने से काम नहीं चलेगा जवाब दो ? राजू ने रोते हुए ही कहा मास्टरजी मैंने जैसा महसूस किया वही लिख दिया और इतना कहकर जमीन की ओर देखने लगा। शिक्षक थोड़ा झेंप कर राजू के सर पे हाथ फेरते हुए बोला राजू बेटा ये स्कूल है यहां सवालों के छपे हुए प्रमाणित जवाब देने पर ही अंक मिलते है तुम्हारे ऐसे भावनात्मक जवाब देने से तुम परीक्षा में फैल हो जाओगे। राजू ने अपने गणित और विज्ञान विषयों में दिए जवाब के बारे में बताते हुये कहा बताईए गुरुजी क्या मेरे सारे जवाब गलत थे। गुरुजी ने गहरी सांस भरी और समझाते हुए कहा देखो राजू तुम्हारे सारे जवाब सही थे पर ये भावुकता भरे अप्रमाणित जवाब है यह जवाब व्यक्ति और स्थित के अनुसार बदलते रहते हैं और इससे हम दैनिक प्रगति और शिक्षा के लिए जरुरी मापदंडों को पूरा नहीं कर सकते।

राजू ने करुण स्वर में सवाल किया क्या शिक्षा में भावना का संवेदनाओं का कोई स्थान नहीं है? शिक्षक ने कडे स्वर में जवाब दिया पहले की शिक्षा व्यवस्था और अब की शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन आ चुका है, बिना अच्छे अंक लाये आपके जवाब का कोई मोल नहीं, इसीलिए जो पढाया जाता है उसी पे ध्यान लगाओ। ऐसा शिक्षक राजू के सवालों के जवाब ना होने की वजह से खिझ कर बोला और चला गया। राजू रोते हुए स्कूल की बातों को सोचते हुए घर पहुंचा । माँ ने राजू को रोते देख व्याकुल होकर उसके रोने का कारण जानने की कोशिश की और राजू को गोद में बिठा लिया, राजू ने विस्तार से सारी बात माँ को बताई, अब राजू की भावना को देख कर माँ की आंखों में भी आंसू भर आये थे। माँ ने गहरी सांस लेकर राजू के सर पे हाथ फेरते हुए कहा शिक्षा के बिना संस्कारों का सही अर्थ समझ पाना शायद संभव नहीं है शिक्षा स्वयं और समाज के कल्याण के लिए अति आवश्यक है, भावना शिक्षा की तर्क शक्ति को बाधित करती है, इसलिए शिक्षा से भावना को थोड़ा दूर रखा जाता है। किन्तु शिक्षा में संस्कार ना हो तो भी वह स्वतंत्र तलवार की भांति हो जाता है अर्थात शिक्षा और संस्कार का एक साथ होना अतिआवश्यक है।

माँ की बात राजू को समझ आ गई थी वह संस्कारों की परीक्षा में पहले ही पास हो चुका था और उसने वार्षिक परीक्षा में भी अच्छे अंक अर्जित किये।

रचनाकार - ललित साहू "जख्मी"
ग्राम - छुरा
जिला - गरियाबंद (छ.ग.)
मो. नं. - 9144992879

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