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हुनर का दमन न करें - डॉ. दीपक आचार्य

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जीवन में जो कुछ मौलिक हुनर और महत्वाकांक्षाएं हैं वे नैसर्गिक ऊर्जाओं और पूर्वजन्मार्जित ज्ञान एवं अनुभवों से परिपूर्ण होती हैं इसीलिए रह-रहकर स्मृतियों में उभर आती हैं, अवचेतन से बार-बार चेतन में आकर हमें जागृत और उत्प्रेरित करती रहती हैं।

हमें जो कुछ भी अपने आप करने की सूझती है, जिसके लिए किसी और से कुछ भी सीखने की आवश्यकता नहीं होती, वह सब हमारा पूर्वजन्मार्जित है और यही कारण है कि हर इंसान के जीवन में काफी सारा ज्ञान, हुनर, स्वभाव और व्यवहार आदि कई पहलुओं में अन्यतम पाया जाता है और इनमें इंसान इतना अधिक दक्ष होता है कि किसी और से कुछ भी जानने-समझने और सीखने की कोई आवश्यकता नहीं होती। 

बच्चों से लेकर बूढ़ों तक में यह देखा जाता है कि उनके जीवन में कई आदतें और हुनर, इच्छाएं और कर्म ऎसे होते हैं जिनमें उनकी गहरी रुचि होती है और एक बार अपने पसंदीदा कामों या हुनर में रम जाने के बाद उनका जी नहीं होता उस कर्म विशेष को छोड़ने का।

जिन लोगों के  लिए उनकी दिलचस्पी और रुचि के काम ही आजीविका का आधार बन जाते हैं उन लोगों की जिन्दगी अधिक आसान, आनंददायी और यादगार बन जाती है। ये लोग दूसरों की अपेक्षा अधिक उपलब्धियां और आशातीत सफलताएं हासिल कर पाते हैं और इनके कर्म को सर्वत्र सराहा भी जाता है।

रुचिकर प्रवृत्तियाँ ही जब आजीविका निर्वाह का माध्यम बन जाती हैं तब कर्ता का कर्म कालजयी यश देने वाला होता है।  लेकिन इस रुचि को दीर्घकाल पर बनाए रखना भी एक चुनौती है।

रुचि अनुसार कार्य संपादन की यात्रा जब तक बनी रहती है तब तक जीवन का भरपूर सुकून प्राप्त होता रहता है। इसलिए इन लोगों को हमेशा यह ध्यान रखने की जरूरत है कि जो कुछ करें वह अपनी रुचि का ही करें, इसके इर्द-गिर्द ही कर्मयात्रा को बनाए रखें।

इस मौलिक और शाश्वत केन्द्र से बाहर नहीं निकलें बल्कि जो कुछ नवाचार भी करना है तो इन्हीं विषयों और कर्मों में करें ताकि उनकी मौलिकता कर्मयोग को हमेशा सुवासित रख सके।

इसके विपरीत अधिकांश लोग हैं जिनकी रुचि, आदत, शौक और तमन्नाएं कुछ दूसरी थीं और आजीविका निर्वाह के लिए ऎसे-ऎसे कर्मक्षेत्रों में आना पड़ा जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होती है।

इससे उनके व्यक्तिगत जीवन और कर्मयोग दोनों में बहुत बड़ी विषमताएं देखने को मिलती हैं। जीवन निर्वाह के लिए उन्होंने उन कर्म क्षेत्रों मेंं घुसना पड़ता है जिनके बारे में इनकी कोई रुचि नहीं होती। इसलिए सारे काम नए सिरे से सीखने की जरूरत पड़ती है और इन कार्यों में रुचि का भी अभाव।

दोहरी बोझिल स्थितियों की वजह से इनका जीवन कष्टकर हो जाता है। मानसिक तौर पर इन्हें हर क्षण इस बात की टीस बनी रहती है कि उन्हें ऎसा काम मिला है जिसे करने में उनकी कोई रुचि नहीं है, इससे अच्छा था पसंदीदा काम मिल जाता।

इस कारण मानसिक अवसाद हमेशा इनके कर्मयोग में बीच-बीच में याद आता रहता है। इससे उनकी शारीरिक स्थितियों पर भी घातक प्रभाव पड़ता है। इस स्थिति में यदि धार्मिक, नैतिक और आध्यात्मिक बल और अर्थिंग न हो तो इंसान के लिए घर-परिवार और कर्मक्षेत्र सब कुछ तनावों की भेंट चढ़ जाते हैं।

इंसान के लिए इस स्थिति में संतुलन बनाए रखना मुश्किल होता है। इसके बावजूद बहुत से लोग होते हैं जो अपने मौलिक हुनर और रुचियों को आकार देने के लिए कोई न कोई नया रास्ता तलाश लेते हैं और उनकी मौलिकता का प्रवाह उस ओर बहना आरंभ कर देता है जो कि इनकी रुचि और आजीविका को लेकर चलते रहने वाले द्वन्द्व पर काफी हद तक काबू पा लेता है।

इन लोगों की रुचियों और जन्मजात हुनर का मार्गान्तरण हो जाता है और अपनी मौलिक प्रतिभाओं की अभिव्यक्ति या प्राकट्य हो जाने अथवा इनके लिए उपयुक्त मंच मिल जाने से ये जीवन का सुकून पाने की पटरी पर आ जाते हैं।

हर इंसान के लिए यह जरूरी है कि उसे उसकी मौलिक रुचि और इच्छा के काम करने और अपनी मौलिक कल्पनाओं को साकार करने व उसे संसार के समक्ष प्रकट करने के अवसर प्राप्त हों तभी उस इंसान से व्यक्तित्व की ऊँचाइयां पाने और कर्मयोग में आशातीत सफलताएं पाने की कामना की जा सकती है।

असंख्य लोग ऎसे हैं जिनमें अखूट मेधा-प्रज्ञा और प्रतिभा कूट-कूट कर भरी हुई है, वैश्विक कीर्तिमान पाने की अपार संभावनाएं हैं लेकिन अवसरों का अभाव रहता है वहीं माता-पिता, पति-पत्नी, घर-परिवार के लोग और रिश्तेदार उन पर बंदिशें लगा देते हैं, उन्हें अवसरों का लाभ पाने से रोक लेते हैं इस वजह से ये लोग जिन्दगी भर के लिए कुण्ठित होकर रह जाते हैं।

इस अवस्था में ये लोग अपनी सामान्य इंसानी क्षमता और व्यवहार का भी उपयोग नहीं कर पाते और कुण्ठाओं भरी नीरस जिन्दगी जीने को विवश हो जाते हैं। यह स्थिति हममेंं से किसी के लिए भी ठीक नहीं है, समाज और राष्ट्र भी अपार संभावनाओं से भरी इन वैश्विक हुनरमंद प्रतिभाओं से वंचित रह जाता है।

इन प्रतिभाओं को अवसरों से वंचित करना किसी राष्ट्रद्रोह या असामाजिकता से कम नहीं है। इसलिए हमेशा ध्यान रखें कि किसी भी प्रतिभा के भीतर हिलोरें लेने वाले हुनर का दमन न करें बल्कि उसे उसके लायक काम और माहौल देने में हरसंभव मदद करें।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

www.drdeepakacharya.com

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