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संस्कृति के त्याग से पृथ्वी हो रही असंतुलित / डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

22 अप्रैल विश्व पृथ्वी दिवस पर विशेष

० उपभोक्तावादी दृष्टिकोण अधिक जवाबदार


वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन एक व्यापक विमर्श का विषय बन चुका है। चिंतनशील लोगों के साथ सामान्य व्यक्ति भी यह महसूस करने लगा है कि मौसम में भयानक तब्दीली आई है। यही कारण है कि पृथ्वी का संतुलन बिगड़ता जा रहा है। यह एक सामान्य व्यक्ति ही नहीं कह रहा, बल्कि वैज्ञानिक भी इस बात के दावे पेश कर हैै कि पृथ्वी  पर लगातार तापमान बढ़ रहा है। हाल के वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं में हुई वृद्धि भी हमें ऐसा सोचने के लिए विवश कर रही है। प्रकृति अथवा पृथ्वी में आ रहा परिवर्तन कोई अचानक पैदा हुई समस्या नहीं है, बल्कि सभ्य मनुष्य की उपभोक्तावादी संस्कृति का ही परिणाम कहा जा सकता है। अब स्थिति हमारे नियंत्रण से बाहर होती दिखाई पड़ रही है। हालात यहां तक बिगड़ चुके है कि संसाधनों के अंधाधुध उपयोग एवं प्रदूषण की मात्रा में रोक लगा पाना असंभव सा लगने लगा है। इन्हीं सारी विपरीत परिस्थितियों ने वायु मंडल में कॉर्बन की लगातार वृद्धि की है। मौसम विशेषज्ञ के रूप में ख्याति प्राप्त विलियम हेग ने कहा है कि ‘हमें जलवायु परिवर्तन की वास्तविकता का सामना करना होगा, यह यकीनन सबसे बड़ा खतरा है, जिसका आज हम सामना कर रहे है।’


जलवायु परिवर्तन और मौसम के बिगड़ते मिजाज को लेकर दुनियाभर के पर्यावरणविद् चिंता प्रकट कर रहे है। ऐसा लगता है कि इन परिवर्तनों में वास्तविक धरातल पर कोई चिंता दिखाई न देने से समस्या और भी गहराती जा रही है। पर्यावरण में हो रहे इन परिवर्तनों के कारण एक ओर जहां लगभग सभी देशों की आर्थिक समृद्धि प्रभावित हो रही है, वहीं अन्न, जल का अस्तित्व भी खतरे में पड़ रहा है। हम जैसे-जैसे आधुनिकता की गिरफ्त में आते जा रहे है, वैसे-वैसे दुनिया भर में लोगों का भोजन  और उसे प्राप्त करने की परंपराएं भी बदल रही है। हालात यदि ऐसे ही बने रहे और दुनिया पर्यावरण संरक्षण को लेकर सार्वजनिक तथा निजी स्तर पर सचेत न हुई तो आने वाले वर्षों में दुनिया की 30-40 प्रतिशत प्राकृतिक संपदा का चेहरा बदल जाएगा या वे चीजें दुनिया से लुप्त हो जाएंगी। पहले के समय में मौसम परिवर्तन पर घाघ की कहावतें 100 फीसदी सच हुआ करती थी, जो बदली परिस्थितियों में गलत हो रही है। भारत वर्ष का मौसम कभी इतना अबुझ नहीं रहा। यहां सर्दी और गर्मी भी इतनी नहीं पड़ी कि जीवन संकट में पड़ जाए। अब आधुनिक युग के विकास की जो गति दिखाई पड़ रही है, उसके चलते बहुत सी मुश्किलें खड़ी होती जा रही है।


पर्यावरण संरक्षण के जिस भारतीय दर्शन की बुनियाद भारत वर्ष के तपस्वियों, ऋषियों-मुनियों ने रखी, उसे हमारे सम्राटों व शासकों ने राजकीय संरक्षण भी दिया। उन्होंने जनहितकारी कार्यों को जो वरीयता दी, वह पर्यावरण से प्रत्यक्षत: जुड़े हुए थे। मसलन बड़े-बड़े सरोवरों और जलाशयों के साथ कुंओं आदि का निर्माण कराया गया। फलदार व छायादार वृक्ष लगाए गए। इसे यदि ऐतिहासिक रूप में समझना हो तो हमें इतिहास के स्वर्णकाल के पन्नों को पलटना होगा, जिसमें विकास कार्य के साथ पर्यावरण संरक्षण का पूरा ख्याल रखा जाता था। उस समय के सम्राट शेरशाह सुरी ने अपने शासनकाल में सबसे लंबी सडक़ का निर्माण कराया, जो पूर्वी बंगाल के सोनारगांव से आगरा, दिल्ली और लाहौर होते हुए सिंधु नदी पर समाप्त हुई। उस समय उक्त सडक़ को ‘सडक़-ए-आजम’ के नाम से जाना गया। बाद में वहीं जीटी रोड कहलाने लगी। इस सडक़ के निर्माण के समय प्रशासनिक अमले को इस बात की सख्त हिदायत दी गई, कि बहुत आवश्यक होने पर ही हरे पेड़ों को काटा जाए और निर्माण के बाद सडक़ के दोनों किनारों पर नीम, आम, अशोक, पीपल, बरगद आदि के छायादार वृक्ष लगाए गए। यही कारण है कि मध्य काल में आज की तरह पर्यावरण की समस्या नहीं थी और न ही प्रदूषण की आज जैसी भयावह स्थिति थी। आज विकास, विनाश का पर्याय बन गया है और ऐसे निर्माण करते हुए पर्यावरण की जमकर अनदेखी की जा रही है।


हमारे धार्मिक और सांस्कृतिक भारत वर्ष से हमें प्राप्त आचार-विचार के चलते प्रकृति और पर्यावरण के प्रति हमारा सम्मान भाव कुछ हद तक कायम है, यही कारण है हम वृक्षों सहित सरोवरों और कुंओं की पूजा करते आ रहे है। पर्यावरण की दृष्टि से विश्व के अन्य देशों की तुलना में भारत वर्ष की स्थिति अच्छी कही जा सकती है। ‘नेशनल ज्योग्राफिक सोसायटी’ द्वारा कराए गए एक सर्वे में ग्रीन डेस्क सूचकांक में हमारे देश को अव्वल स्थान दिया गया है। अमेरिका जैसा विकसित और उन्नत देश इस मामले में अंतिम स्थान पर है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत वर्ष के उपभोक्ता पर्यावरण और हरियाली के प्रति कहीं अधिक सजग, चेतन और संवेदनशील है। सर्वे रिपोर्ट यह भी कहती है कि भारत में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन सबसे कम है और यहां के लोग पर्यावरण के प्रति गंभीर है। सबसे खास बात यह कि भारत की इस उपलब्धि का श्रेय उसकी उस सनातन संस्कृति को दिया जाता है, जिसमें प्रकृति को देवतुल्य माना गया है। स्पष्ट है कि पर्यावरण संरक्षण का भारतीय दर्शन आज भी विश्व में अग्रणी है और हम पर्यावरण के प्रति अपने दायित्वों को पूरे समर्पण और आस्था के साथ निभाते चल रहे हैं।


आज हम अपने सनातनी धर्म को भुल चुके हैं। पर्यावरण की असंतुलित स्थिति ने हमें भी विश्व के साथ अनेक समस्याओं से जोड़ दिया है। अब भारत वर्ष भी पर्यावरणीय समस्या से दो-चार हो रहा है। स्वार्थी मनुष्य निरंतर प्रकृति का दोहन कर रहा है। जिस धरा को हम धरती माता कहकर संबोधित करते रहे है, उसी धरा की छाती को स्वार्थ में अंधे होकर छलनी कर रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भी धार्मिक मान्यताओं की अहम भूमिका है। नदी, कुंआ, तालाब एवं पवित्र पेड़ पौधों की पूजा इसी उद्देश्य से की जाती है कि इनका संरक्षण हो। मानसून के समय गंगा में मछुआरों द्वारा मछलियों का शिकार नहीं किया जाता है, इससे गंगा की संकटापन्न मछली की प्रजाति ‘हिलसा-इलिसा’ को पनपने की मौका मिलता है। भारतीय संस्कृति में जानवरों के शिकार के भी नियम है, जैसे गर्भवती हिरणी का शिकार नहीं किया जाता, बंगाल में कच्चे बेर नहीं तोड़े जाते। ये सभी मान्यताएं जैव विविधता के साथ प्रकृति को संरक्षण प्रदान करने वाले है। यह भी शाश्वत सत्य है कि धर्म हमेशा मनुष्य की पहचान रहा है। सभी धर्मों का मूल सिद्धांत प्रकृति एवं मनुष्य के बीच समन्वय है। धार्मिक मान्याएं हमेशा से प्रकृति के संरक्षण में निहित रही है। कोई भी धर्म प्रकृति के विरूद्ध चलकर अस्तित्व में नहीं रह सकता है।


जैन धर्म में अहिंसा शब्द पर्यावरण संरक्षण से ही जुड़ा हुआ है। सभी जैन मुनि मुंह पर कपड़े की पट्टी मॉस्क की तरह लगाकर रखते हैं, ताकि छोटे से छोटा जीव भी उनके सांस लेने या बोलने से नष्ट न हो जाए। जैन धर्म में अपरिग्रह भी इस बात का संदेश देते है कि ज्यादा संग्रह की प्रवृत्ति से पर्यावरण को नुकसान होता है। इसी तरह बौद्ध धर्म की मूल शिक्षा प्रकृति एवं मनुष्य के बीच आत्मिक संपर्क से संबंध रखती है। इस धर्म में वृक्षों को काटना जघन्य अपराध माना गया है। भगवान बुद्ध को बरगद के पेड़ के नीचे ही बोधिसत्व प्राप्त हुआ था। इसाई धर्म में प्रकृति के जुड़ाव को प्रमुखता दी गई है। बाईबिल में कहा गया कि पेड़ पौधे ईश्वर की देन है, एवं उनकी रक्षा करना हर ईश भक्त का परम धर्म है। यही कारण है कि इसाईयों का प्रमुख पर्व क्रिसमस पर ‘क्रिसमस ट्री’ को सजाया जाता है, जो उनकी हर इच्छा को पूरा करने वाला कल्पवृक्ष माना जाता है। इस्लाम धर्म में पेड़ पौधों को अल्लाह की नियामत कहा गया है एवं उनकी देखभाल तथा सुरक्षा का संदेश कुरान में मिलता है। इस्लाम में खजूर की पेड़ की विशेष इबादत की जाती है। विश्व परिदृश्य में देखे तो चीन तथा जापान में बौद्ध मठों में ‘गिक्लो बाईलोबा’ नामक वृक्ष उगाया जाता है। धार्मिक आस्था के कारण उक्त वृक्ष को जीवित जीवाश्म के रूप में पूजा जाता है।

 


                                         
                                       (डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                                    मो. नंबर 94255-59291
                                    dr.skmishra_rjn@rediffmail.com

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