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रचना और रचनाकार (१८) साठोत्तरी कविता में मोह-भंग / डॉ.सुरेन्द्र वर्मा

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हम आपके शहर से जा रहे हैं

शायद फिर कभी यहां आना न होगा

(राज कमल चौधरी)

मोह-भंग का यह स्वर आज की कविता का मुख्य स्वर है. यथार्थ में कुल मिलाकर आज की कविता मोह-भंग की कविता है.

कविता के सम्बंध में यह पूछना कि वह क्या है, एक बेमानी सवाल है. इसका जवाब हो ही नहीं सकता. सही सवाल यह है कि कविता क्या करती है. एक ज़माना था जब कविता के नाम पर अमूर्त को, असाधारण को, रूप देना था, मूर्तमान करना था. साधारण बनाकर इसे बोधगम्य करना था. अनुभव की परधि में ले आना था. किंतु जैसे-जैसे विज्ञान की प्रगति होती गई अमूर्त और असाधारण और अनुभवातीत का ग्लैमर कम होता गया और कविता ने भी अपना काम बदल दिया. अब कविता साधारण को असाधारण बनाने लगी. लेकिन यह भी बहुत दिनों नहीं चल सका. छाया और स्वप्न के संसार में भला वास्तविकता कैसे ढूढी जा सकती है! कविता को भी अपना काम बदलना पड़ा. साधारण को असाधारण अभिव्यक्ति देने का मोह समाप्त हुआ. यह मोह–भंग सबसे पहले आज के कवि को ही हुआ. आज का कवि न तो अमूर्त को रूप देता है और न ही सहज को असाधारण बनाता है. ये दोनों ही रोमांटिक वृत्तियां हैं. अब वह वस्तु-स्थिति को सरलता से स्वीकार करता है और उसे सहज अभिव्यक्ति देता है.

आज की कविता में मोह-भंग कई स्तरों पर देखा जा सकता है. विषय-वस्तु के स्तर पर, भाषा और शिल्प के स्तर पर, विकास-क्रम, परम्परा और भविष्य के स्तर पर, अर्थ-सम्प्रेषण और सम्बोधन के स्तर पर. आज के कवि को कुछ भी असाधारण नहीं लगता, इसलिए उसकी कविता का विषय कुछ भी हो सकता है. एक डॉ की पर्ची, कोई रसीद, कोई विज्ञापन आदि, कुछ भी.. दुर्घटना, सम्भोग, हत्या उसके लिए वर्जित विषय नहीं रह गए हैं. सैक्स सम्बंधी दुराव-छिपाव कोई मायने नहीं रखता. वह एक मज़ाक़ की चीज़ बन गया है –

एक कवियित्री चौंक गई/जब मैंने पूछा

एक स्त्री और पुरुष के बीच

और क्या हो सकता है /चाह के सिवा!

(अशोक वाजपेयी)

परम्परागत अर्थ में प्रेम अब कोई मायने नहीं रखता क्योंकि सम्पूर्ण वस्तु-स्थिति ही बदल गई है. –

वह चाहिती थी /कोई याद बनकर आए

वह कुछ गुनगुनाए /और तभी दूर पर

एक तेज़ मोटर की हार्न सुनाई दी

बिल्कुल बग़ल की रेलवे लाइन से एक गाड़ी

चीख़ती हुई चली गई....

(लक्ष्मीकांत वर्मा)

प्रेम ही नहीं समस्त मानवी व्यवहार झूठे पड़ गए हैं. उनकी तथागत गम्भीरता एक मुद्रा मात्र रह गई है –

हम खुश होते हैं /और दुःख मनाते हैं

हम उदास होते हैं /और कहकहे लगाते हैं

हम व्यंग्य करते हैं/ और सम्वेदना दिखाते हैं

हम क्षुब्ध होते हैं/ और रोमांस लगाते हैं

कितने गम्भीर हैं हम/ इस सारे नाटक में

कि अपने हर अभिनय को/ बेहद सच मानते हैं

अपनी हर मुद्रा से /हम आश्वस्त हैं, निरुत्तर हैं

(गिरिजा कुमार माथुर)

निरर्थकता और एब्सर्डिटी का यह बोध जब इतना व्यापक और व्याप्त है तो पाठक कविता में ही अर्थ क्यों ढूंढने लगे. आखिर कवि मानव स्थिति से अलग तो नहीं है. आज की कविता इसीलिए कभी-कभी ऊलजलूल और बेतुकी लगती है. लेकिन क्या फर्क पड़ता है! मुद्रा राक्षस की ‘एब्सर्डिटियां’ वास्तव में निरर्थक हैं या वे मानव स्थिति पर आच्छादित निरर्थकता को अभिव्यक्ति देतीं हैं, पता नहीं. कविता सार्थक, अर्थवान है या निरर्थक, अनर्थकारी है - कवि का शायद इससे कोई वास्ता नहीं रह गया है. उसके लिए अर्थ और अनर्थ दोनो ही सहज हैं.

और जहां अर्थ नहीं है वहां सम्बोधन भी नहीं है. अकविता पाठक के लिए नहीं लिखी जाती, यानी एक ऐसे पठक के लिए जो चाहता है कि कवि उसकी रुचि का परि- मार्जन करे. कवि को उसकी रुचि-अरुचि से भला क्या लेना-देना है! जब पाठक का भी कवि के साथ मोह-भंग होगा कविता आप ही सार्थक हो जाएगी. मनुष्य अपने को वस्तु- स्थिति से समायोजित करने में समय लेता है. आदतें बनती तो देर से हैं, छूटती और भी देर से हैं.

यथार्थ में आज की कविता की भाषा और शिल्प परम्परागत कविता की भाषा और शिल्प से इतनी अलग-थलग है कि साधारण पाठक ठगा सा रह जाता है. यह कविता कई स्तर पर सम्प्रेषण कर सकती है – शब्दार्थ के स्तर पर, ध्वनि के स्तर पर या चाक्षुष स्तर पर या तीनो ही स्तरों पर एक साथ. कविता केवल शब्द या व्याकरण पर ही निर्भर नहीं है. शब्द और व्याकरण का मोह कवि को बांध नहीं पाता. ऐसा मोह उसके लिए हास्यास्पद है –

शब्द की केंचुल उतार

अर्थ आगे बढ गया

मैं निरर्थक

शब्द पकड़े रह गया

ओह !

कैसा मोह ! (सुरेंद्र वर्मा)

जब शब्द काम नहीं करता कवि नई सम्भावनाएं खोजता है. ध्वनि और चित्र को कविता में समायोजित करता है. यह एकदम नई बात है. परम्परा भंजक, लीक से हटकर चलते हुए लोगों को देखना भी (खुद चलना तो दूर रहा) बहुत कठिन काम है. हिंदी का पाठक बहुत अच्छी तरह जानता है कि ठोस कविता की यहां कैसी तू-तू मैं-मैं हुई थी.

कविता की इन प्रवृत्तियों को अतीत में ढूंढना या उन्हें परम्परा से जोड़ना और विकास का एक चरण घोषित करना –दोनों ही बातें असम्भव हैं. समय कोई रील नहीं है जो आगे खुलती ही चली जाए. घटनाएं आतिश-बाज़ी की तरह छूटती हैं और समाप्त हो जाती हैं. उनका एक दूसरे से कोई सम्बंध नहीं होता. वे स्वतंत्र होती हैं. हर क्षण की जन्म के साथ मृत्यु हो जाती है. समय की प्रक्रिया में निरंतरता का मोह भ्रामक है. बीता हुआ कल एक टूटी हुई सांस है और

कुछ शब्द हैं जैसे भविष्य उनके

जादू से बचना चाहिए, (कैलाश वाजपेयी)

इसीलिए तो कहा है,

मुझे आने वाली पीढियो की दुहाई मत दो

(क्योंकि) मैं पल-पल जीता हूं

और हर क्षण भोगता हूं

और जीने और भोगने के बीच

मैं हर घड़ी/मृत्यु का मेहमान होता हूं

(सुरेंद्र वर्मा, लहर, अप्रेल,1966)

आज की कविता में मोह-भंग बहुत व्यापक है. उसे न शिल्प का मोह है न भाषा का, न विषय का मोह है न नियति का. वह इतनी तटस्थ है कि उसे सार्थकता और सम्बोधन का भी कोई मोह नहीं है,. घटनाएं उसे छूती नहीं, -

मेरा जन्म

एक नैसर्गिक विवशता थी

दुर्घटना

आत्म हत्यारी स्थितियों का समवाय

(दुष्यंत कुमार)

घटनाओं में कोई तुक नहीं है

और कल्पनाओं में भी कहीं है तुक

न दिशा, न आकाश/ न अवकाश, न काल

(भवानी प्रसाद मिश्र)

और ठीक भी है,

मछलियां,

सूखे पर ज़िंदा रहने की/ज़िद कर बैठी हैं

(अब तड़पने के लिए उपमान

दूसरा चुनेंगे)

(मणिका मोहिनी)

यह एक अनिवार्य स्थिति है. छायावद और नवछायावाद का खोखलापन स्पष्ट हो चुका है. वैज्ञानिक घटनाएं बहुत तेज़ी से घटी हैं. अब कुछ भी आश्चर्य करने के लिए नहीं रह गया – न राजनीति न दर्शन. ईश्वर की परिकल्पना, आत्मा की अमरता, संकल्प की स्वतंत्रता, समय की निरंतरता, प्राकृतिक व्यापारों के पीछे प्रयोजनात्मक शक्ति आदि, सभी मान्यताएं झूठी पड़ गईं हैं और उनका स्थान प्रकृति मनुष्य और मृत्यु ने ले लिया है. अतृप्ति, प्यास और लालसा चेतन स्तर पर आ चुके हैं. कुंठा और विक्षोभ, विवशता और निराशा, अनास्था और मृत्यु रेखांकित हो चुके हैं. यह स्वप्न-भंग और मोह-भंग की स्थिति है. साठोत्तरी कविता इसी स्थिति की अभिव्यक्ति है.

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