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दरकती संवेदनाएं / सुशील शर्मा

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जीवन और मृत्यु हर प्राणी के जीवन के दो सिरे हैं। इस पृथ्वी पर मनुष्य का आविर्भाव संवेदना के कारण  ही हुआ है। जब हम मानवीय संवेदनाओ की बात करते हैं तो उसका परिक्षेत्र बहुत व्यापक होता है। मानवीय सम्वेदनायें सिर्फ मनुष्य के आपसी व्यवहार तक सीमित नहीं हैं बल्कि इस पृथवी पर चर अचर के साथ मानव व्यवहार से जुडी हुई हैं। आज मनुष्य समाज के बनाये गए प्रतिमानों को खंडित करने पर तुला हुआ है। आज ऐसे प्रतिमानों की स्थापना की जा रही है जिनके साथ समाज नकारात्मक दिशा में जाते हुए दिख रहा है। समाज और व्यक्ति के मतभेद बढ़ रहे हैं।


समाज में पारिवारिकता का ह्रास हो रहा है ,आपसी  रिश्तों की मर्यादायें टूट रही हैं। आधुनिकता का नाम लेकर संबंधों में फूहड़ता पनप रही है। समाजों की नकारात्मक मानसिकता ने पारिवारिक संबंधों,प्रकृति ,पर्यावरण एवं मानवीय संवेदनाओं का क्षरण किया है। हवा,पानी,वृक्ष,जीव एवं सम्पूर्ण धरती इसका शिकार हो रहें हैं। पुरानी परम्पराओं ने इन सब में ईश्वर इस लिए प्रतिस्थापित किया था क्योंकि इनमें जीवन पलता है। किन्तु वर्तमान में इन सब का दोहन करके मनुष्य स्वयं को विखंडित एवं असुरक्षित कर रहा है।


इस पृथवी बल्कि इस ब्रह्माण्ड का सर्वश्रेष्ठ प्राणी होने का दावा करने वाले मनुष्य को व्यवहारिक रूप से निकृष्टता की और बढ़ते देखना एक दुःख स्वप्न की तरह है।
आज कीउपभोक्ता संस्कृति उपभोग करना जानती है। आम जनता की हित , अहित ,सुख दुःख ,लाभ हानि आदि सन्दर्भों से इसका कोई सरोकार नहीं रह गया है। यह संस्कृति इतनी अमानवीय हो गई है कि अपने प्रचार के लिए गरीब किसानों को सरे आम फांसी पर लटका दिया जाता है ,दलितों के सरे आम कपड़े उतार कर उसका वीडियो बना कर सरे संचार माध्यम अपने आप को धन्य समझते हैं।
आज भी समाज जातिगत ,धर्मगत,एवं सम्प्रदायगत संकीर्ण मानसिकता में जी रहा है। आज आतंकवाद ,नक्सलवाद ,तालिवान ,आईसिस एवं अनेक सम्प्रदायवादों की तांडव लीला में मनुष्य का जीवन कीड़े मकोड़ों जैसा बन गया है। कमजोर,असहाय ,अभावग्रस्त व्यक्ति की यह नियति है की वह ताकतवर के सामने नतमस्तक हो। सामंती एवं पूंजीवादी मूल्यों से ग्रसित शोषित एवं असंघटित समाज व्यवस्था ने मनुष्य को विवेक हीं एवं चेतना शून्य बना दिया है। आज की उपभोक्ता संस्कृति वास्तव में सामाजिक मूल्यों एवं मानवीय संवेदनाओं के प्रति असहिष्णु है।


आज व्यक्ति सच का बयान नहीं कर सकता है वह अन्याय का प्रतिकार नहीं कर सकता है। आज व्यक्ति सामाजिक एवं मानवीय संवेदनाओं के लिए अपने भौतिक सुख त्यागने के लिए तैयार नहीं है। दलित अभी भी दलित बना हुआ है। दलित उद्धार के नाम पर वोट हथयाने वाले जब शासन में आते हैं तब दलितों से उनका सरोकार ख़त्म हो जाता है।
स्त्री विमर्श समकालीन एक मर्मान्तक विषय है समाज में एक और जहाँ  स्त्री समानता ,नारी स्वतंत्रता ,नारी जाग्रति,नारी चेतना उनके अधिकार एवं शिक्षा पर बड़ी बड़ी बातें होती हैं वहीं दूसरी ओर निर्भया जैसे हज़ारों बलात्कार ,हत्याएँ ,स्त्री प्रताड़ना की घटनाएँ थम नहीं रहीं हैं। यह सिद्ध करती हैं कि मानवीय संवेदनाओं का क्षरण तेजी से हो रहा है।


किसी देश ,जाति या समाज की संस्कृति का मूल आधार उसके मानवीय मूल्य एवं परम्परायें होतीं हैं जो कॉल के घात  प्रतिघात सहते हुए भी अपनी विशिष्ट पहचान नहीं खोते हैं। ये जीवन मूल्य हमारे सामाजिक एवं आध्यात्मिक चिंतन से बने होते हैं। अनादि वर्षों के सांस्कृतिक एवं सामाजिक सरोकारों को अपने में समेटे हुए ये मानवीय संवेदनाओं के संवाहक होतें हैं। ये हमारी सांस्कृतिक चेतना की पहचान होते हैं। आधुनिक पाश्चात्य चिंतन हमारी संस्कृति और समाज के मूल्यों पर स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है। हर देश की संस्कृति एवं सभ्यता उस देश केसमाज एवं समय के लिए अनुकूल होती है लेकिन अगर कोई दुषरे देश या समाज इस की नक़ल करता है तो इसके परिणाम हमेशा गंभीर एवं पतनोन्मुखी होते हैं। टूटते परिवार,विखरते दाम्पत्य जीवन ,बच्चों के भविष्य की असुरक्षा ,नारियों के प्रति असंवेदनशीलता ,पर्यावरण के प्रति उदासीनता ,पूंजीवादी मानसिकता ,शीघ्र सफल होने की प्रवृत्ति आज हमारी संवेदनाओं को विकृति की और प्रेरित कर रही है।


आज हर रिश्ता तनाव के दौर से गुजर रहा है। माता पिता ,भाई बहिन ,पति पत्नी ,दोस्ती ,अधिकारी कर्मचारी एवं पारिवारिक व सामुदायिक रिश्ते यांत्रिक होते जा रहे हैं। रिश्तों में निजता की ऊष्मा ख़त्म होती जा रही है। पीढ़ियों की ये रिक्तता ,संवादहीनता ,युवाओं में मूल्यों का ह्रास ,संस्कारों की कमी एवं पारिवारिक रिश्तों में गहनता का खो जाना मानवीय संवेदनाओं के लुप्त होने के कारण ही है।
सामुदायिक रिश्तों के पर्याय हमारे गांव सबसे ज्यादा विकृति की और बढ़ चले हैं। पिछले वर्षों में जमीनों के ऊपर से  एवं घरेलु झगड़ों में सर्वाधिक मौतें गांवों में ही हुई हैं। आज मशीनों एवं मानव के बीच संघर्ष चल रहा है। आज चारों ओर पूँजी,प्रॉपर्टी ,धन,बाजार एवं व्यवसायिकता का ही बोलवाला है इनके सामने मानवीय मूल्य ,चरित्र एवं संस्कार सब बौने नजर आने लगे हैं।


मनुष्य को पशुओं से अलग करने वाले संस्कार ,सम्वेदनायें एवं जीवन मूल्य आज उसे पशुता की ओर ले जा रहे हैं। आज आवश्यकता है नई पीढ़ी को यह सबक देने की कि प्रगति यदि मानवीय मूल्यों के आधार पर होती है तो वह शाश्वत ,सृजनशील एवं सबका कल्याण करने वाली होती है।
और अंत में मानवीय संवेदनाओं के क्षरण को गहरे अर्थों  में उजागर करती सर्वेश्वर दयाल सक्सेनाजी की एक कविता।


यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में लाश पड़ी हो
तो क्या तुम दूसरे कमरे में गा  सकते हो।
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रही हो,
तो क्या तुम दूसरे कमरे में बैठ कर प्रार्थना कर सकते हो।
यदि हाँ तो मुझे तुमसे कुछ नहीं कहना

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बढती आधुनिकता के इस दौर में संवेदनाओं का ह्रास निश्चित ही चिंतनीय है।

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