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लघुकथा / साइकिल / डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा,

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तिवारी जी के मकान की ऊपरी मंजिल बन रही थी। नीचे के दो कमरों में वे किसी तरह अपनी गृहस्थी समेटे थे। मुन्ना इनके यहाँ पिछले चार महीने से मजदूरी कर रहा था। मुन्ना बीस बाइस साल का इकहरे बदन का स्वस्थ व चुस्त नौजवान था। वह दिन भर डटकर काम करता, शाम को रगड़-रगड़ कर हाथ पैर धोता, बालों और हाथ-पैरों में तेल चुपड़ता, झोले से साफ पैंट कमीज निकाल कर पहनता, बाल काढ़ता और नई घड़ी, अंगूठी, गले में चाँदी की चेन व जेब में मोबाइल से सजा-धजा बाबू जैसा घर पहुँचता। मुन्ना साइट पर भी अपने शौक मे कमी न करता। वह मोबाइल पर गाना सुनता हुआ ही काम करता और अपने सामान को खूब सम्भाल कर रखता। उसकी साइकिल नई थी जिसे वह चमाचम साफ और फूलों व टल्ली से सजा कर रखता। वह आते ही सबसे पहले अपनी साइकिल को सुरक्षित जगह खड़ी करता, धूप-घाम से बचाकर रखता, घर और साइट से चलने से पहले रोज झाड़ता। साथी हँसते – “ससुराल से पाया है इसी से इत्ता ख्याल से रखे है।” मुन्ना केवल मुस्कुरा देता। किसी का भी हँसी मजाक या व्यंग उसके साइकिल मोह में रूकावट न बनता।

घर की मालकिन को अपने सामान की चिंता थी। वे उसके लिये जगह खाली कराती लेकिन लेबर अपनी साइकिल व सामान अड़ा देते। एक दिन तो हद ही हो गई। सामान अधिक था सबकी साइकिलें बाहर रखवा दी गई थी। दोपहर बाद मालकिन बाहर आई तो मुन्ना की साइकिल को सामान के साथ खड़ी देखकर नाराज हो गई। ऊँची आवाज में बोली- “अरे भई तेरी साइकिल न हुई कोई हैलीकाप्टर हुआ। सबकी साइकिल बाहर खड़ी हैं। खुद हमारा स्कूटर बाहर है और तूने मना करने पर भी साइकिल यहीं खड़ी कर दी। जैसे चोर सबसे पहले इसे ही उठाने वाला हो।”

मुन्ना शांत रहा। पर मालकिन का गुस्सा अभी ठण्डा नहीं हुआ था। वे बोली- “हटा इसे अभी यहाँ से।”

मुन्ना आहिस्ता से बोला- “रहीं दें मलकिन।”

मालकिन बोली- “क्यों भई। तू इतना क्यों डरता है। बाहर हमारी भी तो सवारियाँ खड़ी हैं। वह धीरे से बोला- “साहब आपका स्कूटर जाई तो कार आई-जाई। हमार साइकिल गई तो समझो बस गई। सालों साल भी नसीब न हो पाई साहब।” मालकिन कुछ मिनट उसकी शक्ल देखती रह गई। इस छोटे से वाक्य में किना गूढ़ अर्थ छिपा था। एक बड़े अंतर को उसने कितनी सरलता और सहजता से कह दिया था। मालकिन के पास बात बढ़ाने का कोई मुद्दा शेष न था। वे घर में चली गई।

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लेखिका

डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा ने मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ से एम.फिल. की उपाधि 1984 में, तत्पश्चात् पी-एच.डी. की उपाधि 1991 में प्राप्त की। आप निरंतर लेखन कार्य में रत् हैं। डॉ. शर्मा की एक शोध पुस्तक - भारतीय संवतों का इतिहास (1994), एक कहानी संग्रह खो गया गाँव (2010), एक कविता संग्रह जल धारा बहती रहे (2014), एक बाल उपन्यास चतुर राजकुमार (2014), तीन बाल कविता संग्रह, एक बाल लोक कथा संग्रह आदि दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही इनके शोध पत्र, पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं, कहानियाँ, लोक कथाएं एवं समसामयिक विषयों पर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपकी बाल कविताओं, परिचर्चाओं एवं वार्ताओं का प्रसारण आकाशवाणी, इलाहाबाद एवं इलाहाबाद दूरदर्शन से हुआ है। साथ ही कवि सम्मेलनों व काव्यगोष्ठियों में भागेदारी बनी रही है।

शिक्षा - एम. ए. (प्राचीन इतिहास व हिंदी), बी. एड., एम. फिल., (इतिहास), पी-एच. डी. (इतिहास)

प्रकाशित रचनाएं - भारतीय संवतो का इतिहास (शोध ग्रंथ), एस. एस. पब्लिशर्स, दिल्ली, 1994

खो गया गाँव (कहानी संग्रह), माउण्ट बुक्स, दिल्ली, 2010

पढो-बढो (नवसाक्षरों के लिए), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2012

सरोज ने सम्भाला घर (नवसाक्षरों के लिए), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2012

जल धारा बहती रहे (कविता संग्रह), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2014

चतुर राजकुमार (बाल उपन्यास), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

विरासत में मिली कहानियाँ (कहानी संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

मैं किशोर हूँ (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

नीड़ सभी का प्यारा है (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

जागो बच्चो (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेख पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं एवं कहानियाँ प्रकाशित । लगभग 100 बाल कविताएं भी प्रकाशित । दूरदर्शन, आकाशवाणी एवं काव्यगोष्ठियों में भागीदार।

सम्पर्क -

डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा, “विश्रुत”, 5, एम. आई .जी., गोविंदपुर, निकट अपट्रान चौराहा, इलाहाबाद (उ. प्र.), पिनः 211004, दूरभाषः + 91-0532-2542514 दूरध्वनिः + 91-08005313626 ई-मेलः <draparna85@gmail.com>

(अपर्णा शर्मा)

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