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प्रश्न अभी शेष है / कहानी संग्रह / राकेश भ्रमर

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प्रश्न अभी शेष है

(कहानी संग्रह)

राकेश भ्रमर

जन्मः एक जनवरी उन्नीस सौ छप्पन जन्म स्थानः रायबरेली (उ.प्र.)

शिक्षाः एम.ए. (1978) प्राचीन इतिहास (संस्कृति एवं पुरातत्व) इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद

कहानियां, उपन्यास, गीत गजल, व्यंग्य आदि सभी विधाओं में लेखन. अब तक तीन गजल संग्रह, तीन कहानी संग्रह तथा तीन उपन्यास प्रकाशित

संप्रतिः केन्द्र सरकार में अधिकारी

संपर्क : मूल स्थानः ग्राम- कहिंजर, पोस्ट- देवपुर,

जिला- रायबरेली -229212 (उ.प्र.)

र्तमान : - 7, श्री होम्स, कंचन विहार, बचपन स्कूल के पास, विजय नगर,

जबलपुर-482002

मोबाइल-09968020930

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प्रज्ञा प्रकाशन

24, जगदीशपुरम्, लखनऊ मार्ग, निकट त्रिपुला चौराहा, रायबरेली-229001

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प्रश्न अभी शेष है

(कहानी संग्रह)

प्रथम संस्करणः 2013

सर्वाधिकार सुरक्षित @ राकेश भ्रमर

(लेखक की लिखित अनुमति के बिना इस पुस्तक को पूरी तरह या आंशिक रूप से किसी भी मुद्रण, ध्वनि, अंकन या अन्य प्रणाली द्वारा प्रेक्षित, प्रस्तुत तथा पुनरुत्पादित न किया जाये)

प्रकाशक-

प्रज्ञा प्रकाशन

24, जगदीशपुरम्, लखनऊ मार्ग, निकट त्रिपुला चौराहा, रायबरेली-229001 (उ.प्र.)

शाखा कार्यालय

7, श्री होम्स, कंचन विहार, लामटी गांव, विजय नगर, जबलपुर-2 (म.प्र.)

आवरण : विकास पटेल एवं राकेश भ्रमर मूल्य : रु 100

मुद्रकः ग्रेनेडियर्स एसोसियेशन प्रिटिंग प्रेस, डिफेन्स सिनेमा के पास, कैन्ट, जबलपुर (म.प्र.)

 

अनुक्रमणिका पृष्ठ संख्या

1. कन्यादान 9

2. कोल्हू का बैल 18

3. चूडिय़ां 33

4. जड़ी-बूटी 41

5. ठूंठ में कोंपल 62

6. पटाक्षेप 78

7. प्रितघात 91

8. प्रश्न अभी शेष है 105

9. बलदेव काका 123

10. मां-बेटी 135

11. मेघ-मल्हार 144

 

लेखकीय

यह मेरा तीसरा कहानी संग्रह है. इसके पहले दो कहानी संग्रह ‘अब और नहीं’ (2000) और ‘सांप तथा अन्य कहानियां’ (2012) पाठकों के समक्ष आ चुके हैं. एक कहानी संग्रह ‘मरी हुई मछली’ समय प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशनाधीन है, परन्तु वह कब पाठकों के समक्ष आएगा, कह नहीं सकता. इस संग्रह में सन् 2009-10 में लिखित कहानियों को स्थान दिया गया है. प्रस्तुत संग्रह की कहानियां सन् 2011 में लिखी गई कहानियां है अर्थात यह एक साल के अन्दर लिखी कहानियां हैं, परन्तु इनके कथानक, स्थान और पात्रों के परिवेश में कई दशकों का समय है. यह मेरे संपूर्ण जीवन में संचित किए गए अनुभवों का निचोड़ है, जो पूरे एक वर्ष में सिमटकर स्याही, कलम और कागज के माध्यम से आप तक पहुंचा है. संग्रह की कहानियों ‘कन्यादान’, ‘पटाक्षेप’ और ‘जड़ी-बूटी’ में मेरे व्यक्तिगत जीवन के अनुभवों के कुछ अंशों का समावेश है, परन्तु कहानी पूरी तरह से वास्तविक घटनाओं पर आधारित नहीं है. शेष कहानियां पूर्ण रूप से काल्पनिक हैं, परन्तु यथार्थ से परे नहीं हैं. कहानियों में वर्णित घटनाएं जीवन के किसी न किसी क्षेत्र में घटित होती रहती हैं.

‘कन्यादान’ द्वैमासिक पत्रिका अक्षरा, भोपाल, ‘ठूंठ में कोंपल’ और ‘मेघ-मल्हार’ सरिता, नई दिल्ली में प्रकाशित हो चुकी हैं. ‘बलदेव काका’ साहित्य अमृत, नई दिल्ली के कहानी विशेषांक, मार्च 2012 में प्रकाशित हुई थी. ‘प्रतिघात’ कहानी को रचनाकार. आर्ग, भोपाल द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता, 2012 में प्रथम पुरस्कार प्राप्त हो चुका है. अन्य कहानियां या तो प्राची में प्रकाशित की गयी हैं, या अभी तक अप्रकाशित हैं. अप्रकाशित होना किसी कहानी के कमजोर होने का प्रमाण नहीं है. इस संग्रह के माध्यम से जब ये कहानियां पाठकों तक पहुंचेगी, तभी इनका सही मूल्यांकन हो सकेगा. अपनी कहानियों के बारे में लेखक का कुछ कहना तर्कसंगत नहीं लगता, अतः मैं इनकी कोई समीक्षा यहां प्रस्तुत नहीं कर रहा. आप पढ़कर स्वयं इनके बारे में कोई राय कायम करें और मुझे निम्न पते पर लिख भेंजें.

राकेश भ्रमर

7, श्री होम्स, कंचन विहार, लामटी गांव, विजय नगर, जबलपुर-2

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लेखक और उसकी कहानियां

राकेश भ्रमर की रचनाओं के बारे में कोई एक राय देना, बहुत ही मुश्किल काम है. वह एक संवेदनशील गजलकार हैं, कटु यथार्थ के व्यंग्यकार हैं, वस्तुपरक कहानियों और अनेक उपन्यासों के लेखक हैं तो एक मंझे हुए संपादक हैं. गीत और कविताओं के द्वारा भी उन्होंने अपनी कलम का लोहा मनवाया है. इनके आलेखों और व्यंग्य-लेखों में जीवन की सच्चाइयों को बिना किसी झिझक के बयान किया गया है. इनकी रचनाओं में जीवन के कटु यथार्थ के साथ-साथ, संवेदनाओं और जीवन-मूल्यों का आधार है, तो वह असंगत परम्पराओं, अनावश्यक धार्मिक अनुष्ठानों, झूठी शान और मर्यादा का विरोध भी मुखर होकर करते हैं. उनकी कहानियों के पात्र संघर्षशील हैं और जिजीविषा के प्रति जागरूक हैं. वह जीवन के संघर्ष में हारते हुए नहीं दिखाई देते, बल्कि हारकर भी और आगे बढ़ने का हौसला बनाए रखते हैं.

इनकी भाषा मंझी हुई, सरल और सहज है. इसको पढ़ते हुए आपको ऐसा लगेगा, जैसे आप नदी की धारा के साथ बिना किसी प्रयास के आगे बढ़ते जा रहे हैं. शैली में ऐसा प्रवाह है कि पाठक अक्षरों के बीच में स्वयं को उड़ता सा महसूस करता है. राकेश भ्रमर चूंकि यथार्थवादी लेखक हैं, अतएव उनकी कहानियों का अंत सुखद हो, ऐसा नहीं है. उन्होंने जीवन की सच्चाइयों को बेबाकी और बिना किसी लाग-लपेट के बयान किया है, इसीलिए उनकी अधिकांश कहानियों का अंत दुःखद होता है, परन्तु इस तरह के अंत भी पाठकों को कुछ सोचने और करने के लिए मजबूर कर देते हैं. आपको कहानियां पढ़ते हुए स्वयं एहसास होगा कि इनमें भाव हैं, रोचक कथानक हैं, भिन्न-भिन्न पात्र हैं, मनोरंजक संवाद आदि सभी कुछ हैं, जो एक अच्छी कहानी में होने चाहिए. मानव-जीवन के सभी रंग आप इनकी कहानियों में पाएंगे. इनकी कहानियों के पात्रों में लोभ-लालच, ईर्ष्या-द्वैष, प्रेम, समर्पण, वासना, व्यभिचार, धोखा, छल-कपट और त्याग सभी कुछ है. राकेश भ्रमर ने अपने लेखकीय जीवन का लंबा सफर तय किया है और अभी भी उसी ऊर्जा, लगन, निष्ठा और ईमानदारी से लेखन कार्य में रत हैं. मैं उनके दीर्घ जीवन की कामना करता हूं.

डा. गिरिजाशंकर त्रिवेदी

डी-206, सिद्धेश दीप, बापू पाठेराव मार्ग, मुंबई-400008

 

समर्पण

उन सभी व्यक्तियों को जिनके सम्पर्क में आने के बाद,

उनके अनुभवों के द्वारा इस संग्रह की कहानियों का जन्म हुआ

और

उन सभी परिवार जनों को जिनके सहयोग से मेरे लेखन कार्य में कभी कोई

बाधा उत्पन्न नहीं हुई

आरै अंत में

और अंत में मेरे प्रिय पुत्री मिनी, पोती निक्की और पोता आशु (चिन्टू) का जिनके लाड़ प्यार और दुलार से मुझ में अतिरिक्त ऊर्जा का संचार होता है

 

कहानी - 1

कन्यादान

शाम को घर पहुंचा तो पत्नी ने बताया कि गांव से कोई सज्जन मुझसे मिलने आए हैं. मुझे हैरानी हुई, गांव से कौन आ सकता था. फिलहाल गांव में मेरा कोई करीबी नहीं रहता था. गांव से संपर्क बहुत पहले छूट चुका था. परिवार के लोग मेरे साथ रहते थे. खानदान के लोग भी विभिन्न शहरों में जाकर बस गए थे. उनसे केवल किसी शादी-ब्याह या अन्य ऐसे ही मौकों पर मुलाकात हो पाती थी. बहुत दिनों से मेरा गांव भी जाना नहीं हुआ था कि मेरा शहर का पता किसी के पास हो और वह मुझसे मिलने के लिए आया हो.

‘‘कौन है वह?’’ मैंने कुर्सी पर बैठते हुए कहा.

‘‘मैं भी नहीं पहचानती. बस इतना बताया कि आप दोनों लोग साथ-साथ पढ़ते थे. आप ही की उमर के हैं, परन्तु मेहनत का काम करने के कारण ज्यादा बूढ़े लगते हैं. दुबले-पतले हैं. धूप में काम करने के कारण रंग काफी दब सा गया है. जवानी में कभी गोरे रहे होंगे.’’ मेरे दिमाग में घंटी सी बजी. जोर से पूछा, ‘‘कहीं गोपाल तो नहीं? कहां है  वो?’’

पत्नी मेरी हड़बड़ाहट और बेचैनी देखकर मुस्कराई और किचन की तरफ बढ़ती हुई बोली, ‘‘मैं तो पहले ही समझ गई थी कि ये वहीं गोपाल हैं, जो कभी आपके साथ पढ़ते थे. जैसे ही उन्होंने अपना नाम बताया और कहा कि वह आपके गांव से आए हैं, मैं समझ गई वो आपके गांव वाले परम मित्र ही हैं.’’

‘‘तुम्हें मेरे मित्र का नाम याद था?’’

‘‘कैसे न याद रहता. आप जो कृष्ण भगवान की तरह जब-तब उनका नाम रटते रहते थे. अच्छा अब आप फ्रेश हो जाएं, मैं चाय बनाती हूं.’’

‘‘लेकिन गोपाल कहां है?’’ मैंने बेचैनी से पूछा.

‘‘नीचे सड़क तक गए हैं. अभी आ जाएंगे. मैंने उन्हें बताया कि आप सात बजे तक आएंगे, तो बोले कि तब तक वह नीचे टहलकर आते हैं.’’

‘‘कुछ नाश्ता-वगैरह कराया था या नहीं? कितने बजे आए थे?’’ मैंने शर्ट के बटन खोलते हुए पूछा.

‘‘हां, बाबा. आप इतनी चिन्ता क्यों कर रहे हैं? आपके गांव से आएं हैं, चाहे मेरे लिए अपरिचित ही थे. लेकिन क्या अपनी ससुराल से आए व्यक्ति की आवभगत न करती. इतने संस्कार तो मां-बाप ने मुझे दिए ही हैं. आप क्या मुझे बेवकूफ समझते हैं?’’ पत्नी के चेहरे पर स्निग्ध मुस्कराहट तैर रही थी‘‘कभी-कभी...’’ मैंने झटके में कह दिया.

‘‘क्या मतलब... क्या मैं बेवकूफ हूं?’’ उसके चेहरे पर नाराजगी के भाव आ गए. वह मुड़कर खड़ी हो गई, जैसे मुझसे मुकाबला करने के लिए कमर कस रही हो.

‘‘अरे नहीं, मुझे क्या रात में भूख हड़ताल करनी है, वो भी अपने दोस्त के सामने...मैं तो तुम्हारी तारीफ कर रहा था.’’

‘‘मुझे मालूम है आप किस तरह मेरी तारीफ करते हैं. अच्छा, अब बिना किसी चूं-चपड़ के तैयार हो जाइए. आपके प्यारे दोस्त आते ही होंगे.’’ मैं तैयार हो गया, परन्तु पत्नी से कहा कि गोपाल के आने के बाद ही चाय लेकर आए. उसी के साथ चाय पीते हुए बातें करेंगे. मैं मन ही मन बहुत खुश हो रहा था. मुझे याद नहीं पड़ता, कितने साल बाद गोपाल से मुलाकात हो रही थी. मुझे आश्चर्य था कि उसे मेरा पता कैसे चला था, जबकि मेरी उसके साथ कोई खतो-किताबत नहीं थी. वैसे तो यह मोबाइल फोन का जमाना था, दुनिया सिमटकर सबकी मुट्ठी में आ गयी थी. पलक झपकते दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने में बैठे व्यक्ति से बात हो जाती थी, परन्तु 100 किलोमीटर की दूरी पर रहते हुए भी गोपाल से मेरा कोई संपर्क नहीं था. वस्तुतः गांव के किसी व्यक्ति से मेरा कोई संपर्क नहीं था. मां-बापू के गुजरने के बाद तो गांव से नाता बिलकुल ही टूट गया था. भाई कोई था नहीं. बहनें भी शहर में ब्याही थीं, इसलिए गांव आना-जाना बिलकुल नहीं हो पाता था. तैयार होकर ड्राइंगरूम में बैठकर टी.वी. का बटन आन ही किया था कि दरवाजे पर किसी के कदमों की आहट सुनाई दी. मैं स्वयं उठकर दरवाजे तक गया और दरवाजा खोला. मरे सामने एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति खड़ा था, जिसे देखकर मैं तुरन्त पहचान नहीं पाया. कुर्ता-पायजामा और गले में एक मफलर डाले सफेद बालों और पिचके गालों वाला व्यक्ति पहली नजर में मेरे लिए अपरिचित लगा, परन्तु उसके चेहरे पर पहचान वाली मुस्कराहट थी. वही मुस्कराहट उसकी पहचान थी, जिसने मुझे बता दिया कि वह गोपाल ही था. मेरे होंठों पर भी एक पहचान भरी मुस्कान उभरी और अपनी बांहों को फैलाते हुए मैंने कहा, ‘‘ओह्, गोपाल तुम! आओ भाई आओ, इतने सालों बाद मेरी याद कैसे आ गई?’’ वह झ्रिझकता हुआ मेरी बांहों में समा गया. मेरे कलेजे को जैसे ठंडक मिल गई. बहुत दिनों का बिछड़ा कोई आत्मीय मिलता है तो हृदय को ऐसी ही ठंडक पहुंचती हैवह मेरा खुलापन देखकर गद्गद् हो गया. शायद उसे विश्वास नहीं था कि मैं इस तरह खुलकर उससे मिलूंगा. बहुत से लोग परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को बदल लेते हैं. हम दोनों ने साथ-साथ पढ़ाई जरूर की थी, परन्तु जवानी के पहले ही उससे मेरा नाता टूट गया था. बचपन में उसने यदा-कदा मेरी मदद भी की थी, परन्तु मेरे अफसर बनने और गांव से दूर हो जाने के कारण हम दोनों के बीच दूरियां बढ़ गई थीं. समय का अन्तराल बहुत सारी चीजों को भुला भी देता है, परन्तु उसके मेरे ऊपर जो एहसान थे, वह कभी भुलाए नहीं जा सकते थे. साथ-साथ बैठे तो चाय पीने के बाद खाना खाने तक हम दोनों न जाने यादों की कितनी गलियों से गुजर गये. बचपन से लेकर जवानी और शादी-ब्याह से लेकर बाल-बच्चों तक की बातें की, बचपन के दोस्तों को याद किया, गांव के लोगों के बारे में जानकारी प्राप्त की. कितने लोग जो हमारे बचपन में जवान थे, बूढ़े होकर स्वर्ग सिधार चुके थे. कितने लोग बूढ़े होकर कब्र की तरफ अपने पैर बढ़ा रहे थे और न जाने कितने बच्चे पैदा होकर बड़े हो गये थे. गांव बहुत बदल चुका था. बातों के दौरान मैंने पूछा, ‘‘अचानक कैसे याद आ गई?’’ बड़ा बेमानी सा प्रश्न था, परन्तु बातचीत के दौरान ऐसे बेमकसद प्रश्न मुंह से निकल ही जाते हैं. मन में जिज्ञासा अवश्य थी कि पूछूं कि वह किसी काम से आया था यों ही इतनी दूर से एक किसान व्यक्ति अपने घर का काम-काज छोड़कर केवल शहर देखने या मुझसे मिलने तो नहीं आ सकता था. मन में प्रश्न कुलबुला रहे थे, परन्तु सीधे-सीधे पूछने का साहस नहीं कर पा रहा था. पता नहीं वह किस काम से यहां आया हो. पूछता तो उसके मन को ठेस पहुंचती. कोई काम होगा तो अवश्य बताएगा. यही सोचकर मन की जिज्ञासा को दबाए हुए था, परन्तु फिर भी मन की छटपटाहट बाहर आने के लिए व्याकुल हो रही थी.

खाना खाकर हम दोनों बाहर टहलने के लिए निकले थे. पान खाने के बाद धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए वापस आ रहे थे, तभी मैंने अपने मन में दबा सवाल पूछ लिया था. वह नीचे सिर किए हुए बोला- ‘‘पिछले दिनों तुम्हारे जीजा से एक गांव में मुलाकात हो गई थी. बातों-बातों में उनसे तुम्हारा पता लिया. फोन नम्बर भी दिया था उन्होंने, परन्तु सोचा चलकर एक बार मिल लेता हूं. तुम तो गांव आने से रहे.’’ कोई न कोई खास कारण अवश्य था, तभी गोपाल मेरे जीजा जी से मेरा पता लेकर शहर आया था. मैंने पूछा, ‘‘शहर में कोई काम है? बताओ, अगर मेरे बस में है तो पूरी कोशिश करूंगा कि काम हो जाए.’’ वह थोड़ा गंभीर हो गया. दो कदम चलने के बाद बोला, ‘‘काम तो था, परन्तु शहर में नहीं...’’

‘‘तो फिर...?’’ मेरी जिज्ञासा बढ़ गई.

‘‘काम तो तुमसे ही है. परन्तु कहने में संकोच हो रहा है.’’ उसने दबी आवाज में कहा.

क्या काम हो सकता है? मेरा दिमाग तेजी से चलने लगा. बहुत सारे खयाल दिमाग में बिजली की तरह चमक गये. गोपाल ने बताया था कि खेती-किसानी से उसे ठीक-ठाक आमदनी हो जाती थी. उपजाऊ जमीन थी. गन्ने और आलू की अच्छी पैदावार होती थी. पैसे की कोई समस्या उसे नहीं थीहम दोनों में दोस्ती कब हुई थी, यह तो अब याद नहीं, परन्तु हम दोनों जब जूनियर हाई स्कूल में थे, तो साथ-साथ स्कूल जाते थे. स्कूल से वापस आने के बाद भी हम लोग साथ-साथ खेलते थे और गांव में घूमते-फिरते थे. गोपाल एक संपन्न किसान का बेटा था और उसके घर में अभाव नाम की चीज नहीं थी. मेरे बापू एक खेतिहर मजदूर थे और घर में कभी-कभी फाकों की नौबत आ जाती थी. मेरी पढ़ाई में बहुत सारी अड़चनें आती थीं. कभी कापी नहीं, तो कभी कोई किताब नहीं. कभी पेंसिल के लिए पैसे नहीं, तो कभी पेन के लिए...बड़ी मुश्किल से पढ़ाई चल रही थी. परन्तु गोपाल से दोस्ती होने के बाद मुझे इन मुश्किलों से छुटकारा मिलने लगा था. वह जब भी देखता कि मेरे पास कोई चीज नहीं है, तो झट से दस-बीस रुपये मुझे थमा देता या मेरे साथ चलकर मेरी जरूरत की चीज खरीदवा देता. मैंने कई बार मना किया तो वह हंसकर कहता, ‘‘कोई बात नहीं यार, तुम पढ़ने में तेज होतुम्हारी वजह से मुझे भी थोड़ी-बहुत मदद मिल जाती है.’’

‘‘परन्तु तुम जो पैसे खर्च करते हो, वह मैं कहां से चुका पाऊंगा. तुम तो मेरी हैसियत जानते हो.’’

‘‘अभी न सही, जब तुम अफसर बन जाओगे, तब चुका देना.’’ वह टालने वाले भाव से कहता और मैं चुप रह जाता. इस तरह उसने सैकड़ों रुपयों से मेरी मदद की होगी. इसका कोई हिसाब न तो मेरे पास था, न गोपाल के पास...यह उसकी मदद के कारण ही संभव हुआ था कि हाई स्कूल तक मेरी पढ़ाई में कोई बाधा नहीं आई थी. बाद में उसने अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी और पुश्तैनी खेती संभाल ली थी. मैं अपनी पढ़ाई के लिए पास के कस्बे चला गया था. आज की महंगाई को देखते हुए भले ही उन दिनों की गोपाल द्वारा मेरे लिए की गई मदद नगण्य थी, परन्तु उन दिनों उस पैसे की कीमत थी और उसके द्वारा की गई मदद मेरे लिए अमूल्य थी. बाद में जब बी.ए. करने के बाद मुझे नौकरी मिल गई, तो सबसे पहले वही आया था मुझे बधाई देने फिर मैं शहर चला आया. गांव जब-तब जाता था. अच्छी नौकरी मिली तो मेरे लिए शादी के रिश्ते भी आने लगे. पिताजी ने सब कुछ मेरे ऊपर छोड़ दिया था. चूंकि पढ़-लिखकर मैं माडर्न हो गया था. नौकरी भी हैसियत वाली थी, इसलिए मैंने अपने लिए शहर की लड़की पसंद की. फिर मैं पूरी तरह से शहर का होकर रह गया. प्रारंभ में कुछ दिनों तक गांव-घर जाना होता रहा. पिताजी-माताजी जब तक जिन्दा रहे, साल-छः महीने में एक बार अवश्य जाता. मेरे कारण उनको कोई तकलीफ न हो, इस बात का मैंने हमेशा ख्याल रखा. बीवी भी अच्छी समझ और सोच रखती थी. मेरे साथ महीनों तक गांव में रही, परन्तु कभी भी बिजली पानी की शिकायत नहीं की. जिस भी परिस्थिति में रहना पड़ा हो, खुशी-खुशी मेरे साथ गांव में रही जब पिताजी नहीं रहे, तो गांव से नाता पूरी तरह से टूट गया. खेती की जमीन थी नहीं कि उसकी देखभाल के लिए जाना पड़ता. एक बार गांव से नाता टूटा तो सभी पराए होकर रह गये. गोपाल के एहसानों का मुझे एहसास था. बीवी से इस बात का कभी-कभार जिक्र भी करता था. मन में एक संकोच था कि मैंने उसके एहसानों के बदले उसे कुछ नहीं दिया. कभी कोई कपड़ा-लत्ता ही खरीदकर दे देता. या उसके बच्चों के लिए कोई चीज लेकर दे आता. परन्तु यह सब मेरे मन में ही रह जाता था. मन में संकोच भी होता कि मैं कुछ उसे दूंगा तो पता नहीं वह क्या समझे कि मैं उसे छोटा समझकर उसके एहसानों का बदला चुका रहा था. मैं उसे छोटा नहीं करना चाहता था.

आज उसकी बात सुनकर मन में हर्ष हुआ कि शायद उसके एहसानों का कर्ज चुकाने का अवसर मिल रहा था. उसे मुझसे काम था, जैसा भी होगा, मैं उसे निराश नहीं करूंगा. समाज में रहते हुए मनुष्य कभी न कभी एक दूसरे के काम आता है. कभी वह निस्वार्थ भाव से दूसरे के काम आता है, तो कभी स्वार्थवश दूसरे का काम करता है. जब हम निस्वार्थ भाव से किसी के काम आते हैं तो कभी भी हमारे मन में यह भावना नहीं रहती है कि हमें इस सेवा का प्रतिफल चाहिए, लेकिन जिस मनुष्य का काम हो जाता है, उसके मन में यह अवश्य रहता है कि दूसरे की सेवा का कर्ज अपने सिर से उतार दे. गोपाल ने बचपन में जो कुछ मेरे लिए किया था, वह अमूल्य था. उसने भी निस्वार्थ भाव से गरीबी में मेरी सहायता की थी. आज अगर वह मेरे पास किसी काम से आया था तो उसके मन में यह नहीं होगा कि वह बचपन में की गई अपनी मदद का प्रतिफल चाहता था. वह एक दोस्त से मदद मांगने आया था यह सोचकर कि उसका दोस्त सक्षम था और उसकी मदद कर सकता था‘‘काम क्या है?’’ मैंने उत्सुकता से पूछा.

‘‘मैं बहुत संकोच के साथ तुम्हारे पास आया हूं. अगर मेरा काम गांव में हो जाता तो मैं कभी तुम्हारे पास नहीं आता.’’ गोपाल अभी भी खुलकर नहीं बता रहा था कि उसे क्या काम था.

‘‘ऐसी क्या बात है जो तुम मेरे पास आने में संकोच कर रहे थे. क्या तुम्हारे मन में शंका है कि मैं तुम्हारा काम करूंगा.’’

‘‘नहीं, मैं यह सोच रहा हूं कि कहीं तुम यह न समझ बैठो कि मैं तुम्हारा फायदा उठाना चाहता हूं.’’

‘‘बड़ी अजीब सी बात है,’’ मैंने हंसते हुए कहा, ‘‘जब हम दोनों छोटे थे तो तुम मेरी जबरदस्ती मदद करते थे और आज जब हम बड़े हो गए हैं, समझदार हैं, तब तुम्हें मेरी सहायता लेने में संकोच हो रहा है. क्या तुम मुझे अपना दोस्त नहीं समझते?’’

‘‘समझता हूं, तभी तो आया हूं. बस मन में डर है कि तुम मना न कर दो.

या कहीं तुमसे मदद न हो सकी, तो मेरी नैया कैसे पार लगेगी?’’ पता नहीं क्या बात थी जो गोपाल इस तरह की हताशा भरी बातें कर रहा था. मैंने थोड़ा झुंझलाते हुए कहा, ‘‘गोपाल, तुम अब पहेलियां बुझाना बंद करो और सीधे-सीधे बताओ कि मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं. तुम अपना काम बताओ, मैं पूरी कोशिश करूंगा कि उसे पूरा करूं. अगर मेरे वश में नहीं भी हुआ, तब भी मैं उसे किसी न किसी प्रकार पूरा करूंगा.’’ मेरी बात से गोपाल की हिम्मत बंधी और उसने धीरे-धीरे बताना शुरू किया, ‘‘तुमसे न कहूंगा तो और किससे कहूंगा. अब तुम्हीं मेरे तारनहार हो. और कहीं मुझे उम्मीद की किरण नजर नहीं आती. पता नहीं तुम मेरे परिवार के बारे में कितना जानते हो. मेरी एक बड़ी बेटी है. उसकी शादी मैंने तय कर दी है... इसी साल. अच्छा लड़का मिल गया है. आर्मी में सिपाही है. अब तुम तो जानते हो कि आजकल बेटी की शादी में कितना खर्च करना पड़ता ह. जो लड़के बेरोजगार घूम रहे हैं, उनके

मां-बाप भी आठ-दस लाख से नीचे बात नहीं करते.’’

‘‘हां, ये बात तो है.’’ मैंने उससे सहमति जताई.

‘‘अब तक जो जोड़कर रखा था, वह सब शादी में लगा रहा हूं. फिर भी हिसाब करने पर एक लाख के करीब कम पड़ रहे हैं. चारों तरफ नजर दौड़ाई, कई जगह बात की, परन्तु इतना पैसा देने को कोई तैयार नहीं है. खेती रेहन रखूं, तब भी इतना नहीं मिल सकता था. एकाध बीघा बेच देता तो बात बन सकती थी, परन्तु दो छोटे बेटे हैं. उनकी पढ़ाई-लिखाई और भविष्य का सवाल था. खेती बेचना मैंने उचित नहीं समझा. इसी बीच संयोग से तुम्हारा पता मिल गया. डूबते को तिनके का सहारा...बस एक उम्मीद की किरण दिख गई.’’

‘‘बस इतनी सी बात और तुम शर्म-संकोच में मरे जा रहे हो. बहुत बड़े अहमक हो तुम...चलो खैर, अब अपने मन से सारी शंका-कुशंका मिटा दो और समझो कि तुम्हारा काम हो गया.’’ मैंने उसके कंधे पर हाथ मारते हुए कहा . उसने मेरी आंखों में इस तरह झांककर देखा जैसे उसे मेरी बात पर विश्वास

न हो रहा हो.

‘‘ऐसे क्यों देख रहे हो? क्या तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा है कि मैं तुम्हें इतने पैसे दे सकता हूं?’’

‘‘हां, क्योंकि यह बहुत बड़ी रकम है और फिर तुमने भाभी से तो पूछा ही नहीं.’’ मैं जोर से हंसा. उसे हैरानी हुई. मैंने कहा, ‘‘पहली बात तो ये कि दोस्ती के सामने यह कोई बड़ी रकम नहीं है. दूसरी बात ये है कि मेरे ऊपर तुम्हारे कुछ एहसान हैं. कुछ सोचकर मैंने कभी उन एहसानों का बदला चुकाने के बारे में नहीं सोचा. आज मौका मिला है, तो मैं पीछे क्यों रहूं. रही बात तुम्हारी भाभी से पूछने की तो मेरे किसी काम में वह टांग नहीं अड़ाती, बशर्ते कि काम शुभ हो और किसी की भलाई के लिए हो. तुम्हारी बेटी की शादी है, तो क्या तुम्हारी बेटी मेरी कुछ नहीं लगती? मेरी बीवी तुम्हारी बेटी की शादी के लिए कुछ मदद करने के लिए कभी मना नहीं करेगी. वैसे भी उसे पता है कि तुमने बचपन में मेरे ऊपर कितने एहसान किए हैं, कितनी बार मुझे मुसीबत से उबारा है. तुमने ऐसा कैसे सोच लिया कि मेरे रहते तुम मजबूर और असहाय हो.’’ उसकी आंखें कृतज्ञता से डबडबा आईं. होंठ लरजने लगे और वह कुछ बोल न सका.

रात में पत्नी के साथ लेटा तो मैंने पूरी बात बताने के बाद पूछा, ‘‘मैंने कुछ

गलत तो नहीं किया?’’

‘‘गलत...!’’ पत्नी ने हैरानी से कहा, ‘‘आप तो पुण्य कमा रहे हैं.’’

‘‘अच्छा, वो कैसे?’’ मुझे उसकी बात पर हैरानी हुई कि दोस्त की मदद करके मैं कौन सा पुण्य कमा रहा था.

‘‘देखिए,’’ उसने शांत भाव से कहा, ‘‘अपने बचपन के दोस्त के एहसानों का बदला चुकाने के साथ-साथ आप एक कन्या की शादी भी तो कर रहे हैं, समझे? हमारी कोई बेटी नहीं है. क्या इस तरह एक कन्या की शादी में आर्थिक मदद करके हम कन्यादान का पुण्य नहीं कमा रहे हैं?’’

‘‘हां, तुम ठीक कह रही हो.’’ मैं पत्नी की समझदारी का कायल हो गया.

‘‘परन्तु हमारा काम यहीं समाप्त नहीं हो जाता. गोपाल जी से पूछ लीजिए कि शादी में बेटी का नया घर बसाने के लिए क्या-क्या सामान दे रहे हैं. जो कमी होगी, वह हम पूरी कर देंगे. परन्तु अभी उनसे कुछ मत कहिएगा कि पैसे के अलावा हम और क्या करने वाले हैं.’’ मैंने पत्नी की बात पर अमल किया. दूसरे दिन सुबह नाश्ते के दौरान मैंने गोपाल से शादी की तैयारियों के बारे में विस्तृत जानकारी ली. फिर उसे पैसे देकर और संभलकर गांव जाने की हिदायत के साथ स्वयं बस अडडे ले जाकर बस में बिठाया और गांव के लिए विदा किया. गोपाल को विदा करने के बाद मैं अपने दफ्तर आ गया. गांव पहुंचकर गोपाल ने कृतज्ञता जताने के लिए फोन किया. मेरी पत्नी ने उसकी पत्नी से बात की और शादी की तैयारियों के बारे में बहुत सी जानकारियां लीं.

धीरे-धीरे शादी की तिथि भी आ पहुंची. हम लोगों ने बहुत सारी खरीदारी कर रखी थी.

शादी के एक दिन पहले ही मैं अपनी पत्नी और दोनों बेटों के साथ दो कारों में सामान से लदा-फंदा गांव पहुंच गया. गोपाल और उसकी पत्नी हमें देखकर ही धन्य हो गये. सारे नाते रिश्तेदारों के बीच भी खुशी की एक लहर दौड़ गई कि इतना बड़ा अफसर गोपाल की बेटी की शादी में भाग लेने के लिए सपरिवार गांव पहुंचा था. परन्तु मैं अपने गांव में एक अफसर की हैसियत से नहीं गया था. वहां मैं गोपाल का दोस्त था और उसकी बेटी का चाचा था. इस नाते वह मेरी भी बेटी थी. मैंने और मेरी पत्नी ने घर-बाहर का सारा काम संभाल लिया और शादी का सारा इंतजाम. मंडप से लेकर जनवासा और हलवाई से लेकर अन्य छोटी-मोटी तैयारियों को अपनी निगरानी में ले लिया. मेरे दोनों बेटे भी भाग-दौड़कर सारा काम देख रहे थे. कहना न होगा कि शादी भव्य तरीके से सम्पन्न हो गई. कहीं किसी चीज की कमी न रही. किसी को शिकायत का मौका न मिला. दूसरे दिन विदाई के समय जब सामान लादा जाने लगा तो उसमें हमारे द्वारा दिया गया सामान भी शामिल था. इतना सामान गांव की किसी बेटी की शादी में नहीं दिया गया था. वर पक्ष के साथ-साथ कन्या पक्ष के लोग भी आश्चर्यचकित और अभिभूत थे. मेरी कोई बेटी नहीं थी, परन्तु गोपाल की बेटी की शादी में अपनी तरफ से तुच्छ भेंट देकर जितना खुश मैं नहीं था, उससे ज्यादा मेरी पत्नी खुश और संतुष्ट थी. बेटियां जब विदा होती हैं तो पशुओं की आंखों में भी आंसू आ जाते हैं. जब गोपाल की बेटी विदा हो रही थी तो बड़ा ही गमगीन माहौल था. औरतों के रोने की आवाज के बीच दुलहन की करुण रुलाई बिलकुल ऐसी लग रही थी जैसे किसी मासूम बच्चे को उसके मां-बाप से अलग किया जा रहा था.

सभी की आंखों में आंसू थे. गोपाल को चुप कराते-कराते मेरी आंखों में भी आंसू आ गये. एक हूक सी मेरे दिल में उठ रही थी. लगा जैसे मेरी ही बेटी विदा हो रही थी.

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(क्रमशः अगले अंक में जारी…)

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