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विश्व पुस्तक दिवस विशेष : कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर का संदेश

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विश्व पुस्तक दिवस के दिन हमारे अनुभव :पुस्तकालय

कविगुरु रवीद्रनाथ ठाकुर, विचित्र प्रबंध, पौष 1291 (के बंगला भाषा के सन्देश का अनुवाद)

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अनुवाद - बिनय कुमार शुक्ल

शहस्त्राब्दियों से कल्लोल करते हुए महासागर को निश्चल सोते हुए नवजात की तरह प्रशांत रूप में बांधने में यदि सफलता मिल सके तो, उस प्रशांत महासागर की तुलना इस पुस्तकालय से की जा सकती है जहां भाषा चुप है, प्रवाह स्थिर है और मानव मन के उदगार रोशनाई से पिरोये हुए शब्दों के आकार में कागज के सीने में कैद है | जैसे हिमालय के शिखर पर कैद अनगिनत हिमप्रवाह यदि विद्रोह कर उठें तो जो जलजला आ सकता है, यदि इन शब्दों ने भी सहसा विद्रोह कर दिया और अक्षरों की श्रृंखला प्रस्फुटित होकर इस नीरवता को भंग करते हुए बाहर आने लगे तो जो हाहाकार मच सकता है उसकी कल्पना मात्र ही जाने कैसे सिहरन पैदा कर देती है | ऐसे ही पुस्तकालय में मानव मन के उदगार कैद हैं ।

बिजली को तो मनुष्य ने लोहे के तार में बांध रखा है पर किसे पता था कि शब्दों को निःशब्द कर उसे बांधा जा सकता है | किसे पता था कि संगीत को, मन के शोक-विकार को, जीवित आत्मा के आनंदध्वनि को आकाश की देववाणी को कागजों में पिरोकर रखा जा सकता है । किसे पता था कि मानव अतीत को वर्तमान में कैद कर सकता है ! अचल-अटल समुद्र पर सिर्फ एक पुस्तक की सहायता से बांध कर रखा जा सकता है !

पुस्तकालय के माध्यम से हम सहस्त्र राह वाले चौरस्ते पर खड़े हैं । कोई राह अनंत सागर की तरफ जा रही है, तो कोई मानव मन की असीमित गहराइयों की ओर ले जा रही है । जो जिस राह पर जाना चाहे उसके लिए वही राह खुली है, कहीं किसी प्रकार कि बंदिश नहीं है । पर मानव ने अपने उत्थान के माध्यम को एक ही स्थान पर बांध दिया है ।

शंख से जिस प्रकार समुद्र कि ध्वनि सुनाई देती है, उसी प्रकार इस पुस्तकालय से हृदय के उत्थान-पतन के शब्द सुनाई देते हैं । यहाँ जीवित और मृत व्यक्ति के हृदय पास-पास, एक ही मुहल्ले में बसते हैं । वाद-विवाद यहाँ दो भाइयों के तरह रहते हैं, संशय और विश्वास, खोज एवं आविष्कार यहाँ एक दूसरे के समीप ही निवास करते हैं । यहाँ दीर्घप्राण स्वल्पप्राण परम धैर्य और शांति के साथ जीवनयात्रा निवास करती है, कोई किसी कि उपेक्षा नहीं करता ।

जाने कितने नदी,समुद्र पर्वतों को पार करते हुए मानवा मन के उदगार यहाँ तक पहुंचे हैं । जाने कितने सदियों से यह आवाज आ रही है । आओ, मेरे पास आओ, यहाँ प्रकाश का जन्मगीत चल रहा है ।

अमृतलोक का प्रथम आविष्कार कर जिन महापुरुषों ने हमारे चारों ओर यह बात कही की ‘तुम सब इस दिव्या धाम के निवासी अमृतपुत्र हो’ उन महापुरुषों की वाणी असंख्य भाषाओं में अनुदित हो वर्षों से इस पुस्तकालय में गुंजायमान हैं ।

इस बंग भूमि से क्या हमें कुछ कहना नहीं है । मानव समाज को क्या हम कोई संदेश नहीं दे सकते । जगत के एक सूत्रीय संगीत के बीच क्या अकेली बंग भूमि में ही निःशब्दता रहेगी ।

क्या हमारे आँगन में स्थित समुद्र हमें कुछ कह नहीं रहा है । क्या हमारी गंगा कैलाश के शिखर से होते हुए कोई संगीत नहीं लेकर नहीं रही है । क्या हमारे सिर के ऊपर अनंतकोटि आकाश नहीं है । या वहां से होकर आने वाली ज्योतिर्मय किरणों को किसी ने सदा के लिए मिटा दिया है ।

देश-विदेश से, अतीत-वर्तमान से होकर प्रतिदिन हमारे पास मानव जाति के पत्र आ रहे हैं; क्या उनके उत्तर में हम दो-चार, छोटे-छोटे वाक्य अंग्रेजी के अखबारों में लिखने तक ही सीमित रहेंगे । समस्त देश अनंतकाल से इतिहास के पन्नों पर अपना नाम लिख रहे हैं । बंगालियों का नाम क्या सिर्फ आवेदनों के दूसरे पन्नों तक ही सीमित होकर रह जाएगा । जड़-चेतन के साथ सदा से ही मानव जीवन का संग्राम चल रहा है । विश्व के हर हिस्से में सैनिकों का आह्वान कर युद्ध की गूंज उठ रही है, हम क्या अपने घरों के मचानों पर बैठ लताओं में फल रही सब्जियों की देखरेख करते हुए बस मुक़दमेबाज़ी में ही व्यस्त रहना चाहते हैं ।

सदियों से मूक बैठे बंगदेश की नीरवता अब भंग हो उठी है । उसे मेरी भाषा के माध्यम से सिर्फ एक बार तो अपनी बात कहने दो । बंगाली संस्कृति से मिलकर विश्वसंगीत और सुमधुर हो उठेगा ।

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