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शबनम शर्मा की 3 नई लघुकथाएँ

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पढ़ाई

आज दिव्या दोपहर में अपने कमरे में गई, लेकिन अभी शाम के 8 बजने को आये, बाहर नहीं निकली। ये बच्ची हमारे पड़ोस में ही रहती है। मैं अपना काम निबटाकर बाहर निकली, तो उसकी मम्मी से राम सलाम हुई। वो मुझे आज कुछ खिन्न सी नज़र आई। मैंने कारण पूछा तो उसने बताया कि उसकी बेटी का रिज़ल्ट आया है, वो अपनी कक्षा में प्रथम आई है। उसने आगे पढ़ने की इच्छा प्रकट की है। लेकिन उनकी जाति में ज़्यादा पढ़े-लिखे लड़के नहीं मिलते। वो मुझसे पूछने लगी, ‘‘बताओ, बहनजी, अब ऐसे हालात में अगर मैं उसे पढ़ा दूँ, तो ये सारी उमर इस घर पर ही बैठी रहेगी, आज दोपहर से कमरा बंद करके बैठी है, रोये जा रही है। न कुछ खाया, न नीचे आई है।’’ उसकी बात सुनकर मुझे एक झटका लगा। मैं अपनी पड़ोसिन को अपने घर ले आई। वह बहुत दुविधा में थी। घर वालों का दबाव, बच्चे का प्यास, उसका भविष्य सब कुछ उनके चेहरे पर स्पष्ट झलक रहा था। मैंने कुछ देर इधर-उधर की बातचीत करके उन्हें सहज करने की कोशिश की, फिर कहा, ‘‘देखो दिव्या की मम्मी, हम और आप बरसों से अपनी गृहस्थी चला रहे हैं, कितने उतार-चढ़ाव इसमें देखने पड़ते हैं। आप मुझे बताओ कौन सा रिश्तेदार मदद करने या हमारी समस्या को सुलझाने आया? और हाँ, हम किसकी गृहस्थी में कुछ निपटाने गये? सबको अपनी-अपनी ज़िन्दगी खुद ही निपटानी होती है। दिव्या आपकी बेटी है और आजकल बेटा-बेटी में क्या फर्क? उसे पढ़ाओ और एक अच्छा अफ़सर बनाओ, बिन जाति-पाति देखे अनगिनत रिश्ते आएँगे। एक अच्छा लड़का देखकर शादी कर देना। अगर आपकी जाति में लड़के नहीं पढ़ते, तो इसमें दिव्या का क्या कसूर? वो लाखों में एक है। आगे आपकी मर्जी।’’ वो एकटक मेरी ओर देखती रही और मेरा हाथ थामकर तेज़ी से अपने घर की ओर ले गई व भरी आँखों से दिव्या के कमरे तक। दरवाज़ा खटखटाया, दिव्या ने दरवाज़ा खोला। आँखें सूजी, चेहरा पीला हुआ पड़ा था। माँ ने उसे बाँहों में भरा और बोली, ‘‘बेटी, पोंछ दे अपने आँसू, मैं तुझे पढ़ाई कराऊँगी, भले ही लोग कुछ भी कहें। तेरी आंटी ने मेरी आँखें खोल दी।’’ दिव्या खुशी से और भी ज़ोर से रोने लगी और बोली, ‘‘सच माँ, थैंक यू आँटी, थैंक यू।’’

 

 

दान

सिद्धू वकील शहर के जाने-माने वकीलों में गिने जाते हैं। बड़ा बंगला, भले बच्चे, सुशील बीवी, क्या नहीं है उनके पास। उनके घर में नाती हुआ। मैं भी नन्हें मेहमान को देखने चली गई। घर में चारों ओर रौनक ही रौनक। उसके ननिहाल से भी लोग आए हुए थे। अन्दर वाले कमरे में भीड़ थी। सिद्धू जी बाहर वाले बड़े कमरे में बैठे किताबें पलट रहे थे। मुझे देखकर उन्होंने अपने कमरे में बैठने को कहा। चारों ओर किताबें ही किताबें। बड़ा सोफा, कुछ कुर्सियाँ, मेज़ सब कुछ था वहाँ। औपचारिकता ही बातचीत खत्म हुई। मैंने उन्हें बधाई दी और बात आगे बढ़ाने लगी। पूछ ही बैठी, ‘‘सिद्धू साहब, आपके पिताजी का भी यही व्यवसाय रहा?’’ ‘‘नहीं, वो एक जुलाहे हैं, उन्होंने कड़ी मेहनत करके मुझे पढ़ाया। मैं बचपन से पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन घर की परिस्थितियाँ अनुकूल न थीं। मेरी 2 बहनें, दादा-दादी और एक बुआ भी हमारे साथ थी। पिताजी अकेले कमाने वाले थे। रात-दिन काम करते। मैं भी समय मिलते ही उनकी मदद करता। साथ-साथ मैंने पढ़ाई भी की। वकालत की पढ़ाई के लिये पैसे न थे। पिताजी ने अपनी दुकान बेच दी, माँ ने अपने इक्के-दुक्के गहने। मैं वकील बन गया, मेरा काम भी अच्छा चल निकला। मैंने प्रण किया कि मुझे जो भी कुछ आयेगा उसमें से 10ः मैं उन बच्चों के लिए रखूँगा जो पैसे की कमी के कारण पढ़ नहीं पाते। भगवान का शुक्र है मैं आज कुछ कर पाया। मैंने ट्रस्ट बनाया है, मेरे साथ और लोग भी जुड़े हैं। मैंने कक्षा 1 से 8 तक का स्कूल खोला है। किताबें, खाना, वर्दी सब फ्री हैं। करीब 700 बच्चे हो गये हैं और मुझे सुकून है। कहते-कहते उनकी आँखें भर आईं।’’ उनके इस निर्णय पर मुझे बहुत खुशी हुई।

 

 

परीक्षा

लाजवंती की शादी को मात्र 6 बरस ही हुए थे कि उसके पति सुरेश की तबीयत खराब हो गई। सुरेश को पता चला कि उसे कैंसर है, उसकी चिन्ता बहुत बढ़ गई। सोचले लगा, उसके बाद उसके परिवार की परवरिश, उसकी दो बहनों की शादी, उसकी माँ की देखभाल, सब सोचकर वह काँप उठा। पत्नि को पता चला तो वह उसे सांत्वना देने लगी कि सब परमात्मा पर छोड़ दो, जो होगा वह उसकी मर्ज़ी से ही होगा। लाजवंती हर काम में बहुत ही सुलझी औरत थी, परन्तु पढ़ी-लिखी न थी, इस बात की चिन्ता सुरेश को खाये जा रही थी। घर की पूरी ज़िम्मेदारी लाजवंती पर आने वाली थी। उसके मेहनती स्वभाव को देखकर सुरेश ने उससे बात करने की सोची। उसे बुलाकर कहने लगा, ‘‘लाजवंती, तुम एक बुद्धिमान, कुशल स्त्री हो, समय अच्छा नहीं है, सोचता हूँ, क्या अच्छा हो कि तुम दसवीं की परीक्षा दो और कोई नौकरी करो, मेरे बाद तुम्हें सबको संभालना है।’’ सुनकर लाजवंती फफक़ पड़ी, ‘‘मैं अनपढ़ गंवार जिसे अ नहीं आता वो दसवीं करेगी, आपने सोच भी कैसे लिया?’’ उसकी पूरी रात सुरेश की बात सोचते-सोचते निकल गई। काले दिन व लम्बी रातें नज़र आने लगी। सुबह उठकर उसने अपनी छोटी बेटी जो नर्सरी में जाती थी, की किताब उठाई, पन्ने पलटने लगी कि आँखों से आँसू रुक ही न रहे थे। सुरेश ने उसे देखा व पास आकर बोला, ‘‘अरे वाह, ये आज से ही शुरु कराता हूँ।’’ उसने किताब के चित्र व अक्षर उसे पढ़ाये। सलेट पर अ-आ, 1-2-3 लिखकर दिया। 2-3 दिन में उसने मेहनत व लगन से अच्छे परिणाम दिय। वह किताबों को पढ़ने व समझने लगी। मात्र 3 सालों में उसने दसवीं की परीक्षा दे डाली व उर्त्तीण हुई। इसके बाद जे.बी.टी. की। इस दौरान सुरेश भी बहुत बीमार रहने लगे और उनका निधन हो गया। लाजवंती पर ज़िम्मेदारियों का पहाड़ टूट पड़ा। उसे सरकारी स्कूल में नौकरी मिल गई। जैसे-तैसे अपना फ़र्ज निभाया। आज उसके बच्चे अपनी-अपनी ज़िन्दगी जी रहे हैं। परन्तु उसका जीवन हमें हमेशा एक अलग सी सीख देता रहेगा कि इन्सान ग़र कुछ चाहे तो क्या नहीं हो सकता।

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शबनम शर्मा

अनमोल कंुज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र. - १७३०२१

मोब. – ०९८१६८३८९०९, ०९६३८५६९२३

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